About Us | हमारे विषय में

PURPOSE OF WEBSITE | वेबसाइट बनाने का उद्देश

यह वेबसाइट बनाने का उद्देश आप सभी को वामपंथी विचारधारा से परिचित करना है | हम आपको बताना चाहते है की, वामपंथी विचारधारा क्या है ? वामपंथी क्या चाहते हैं ? वामपंथी विचारधारा की विभिन्न क्षेत्रो में क्या समझ है ? राजनैतिक समझ क्या है ? राजनीती में किन नीतियों पर चलना चाहते हैं ? कैसे भारत का निर्माण करना चाहते हैं ? इनकी भ्रष्टाचार के बारे में क्या समझ है ? जातिवाद, धर्म, रीती-रिवाज, सामाजिक बुराइयाँ, कूटनीतियाँ, अंध-विश्वास जैसे सवालों पर हम क्या सोचते हैं | इस विचार धारा का बुनियादी नियम क्या है, इस प्रकार न जाने कितने अन समझे और सन सुलझे सवाल वामपंथ के बारे में नौजवान के मन में हैं |

हम कोशिश करेगें कि इस वेबसाइट में इन सभी सवालों के जबाव और वामपंथी विचारधारा की समझ बहुत ही कम शब्दों में और सरल भाषा में मिलेगी | जिससे जो भी व्यक्ति इस विचारधारा को समझना चाहता है, उसे एक ही स्थान पर सारी जानकारी उपलब्ध हो जायेगी | इसके साथ ही यदि अन्य सवाल निकलेंगे तोह उसके जबाब के लिए भी चर्चा का मंच होगा |

इसके साथ ही हमारे twitter और facebook पेज से जुड़ कर आप हमारी गतिविधियों की जानकारी पा सकते हैं और हमारे साथ जुड़ सकते हैं |

POLITICAL VIEW | राजनैतिक समझ

हमारे देश के प्रत्येक नागरिक को राजनैतिक समझ को जानना, समझना और राजनैतिक समझ रखना, उस पर चर्चा करना और उसके अच्छे बुरे तर्कों को समझना, हम सभी क लिए अवश्यक है | इसके बाद उसको स्वयं अपनी समझ बनाना कि वह किस राजनैतिक विचार के साथ जाएगा, अपने जीवन में किस राजनैतिक धरा को स्वीकार करेगा, क्योकि पूरे देश में जो भी घटनाएँ घटती है, उसके पीछे एक सोची समझी राजनैतिक चेतना होती है, जो हमारे जीवन की पूरी दशा तय करती है | राजनैतिक सत्ता ही देश बनाती है, और यह निर्भर करता है आम जनता कि समझ पर |

सत्ता के लिए यह जरुरी है की वह अपनी राजनीती क लिए जनता को तैयार करे, ताकि आम जनता उनके पक्ष की राजनीती को समझे और उनको समर्थन करे | इसके लिए राज सत्ताये अपपनी राजनैतिक विचार के लिए पीछे से विचारो को पैदा कराती है, जिनको वो हमारे जीवन के दिनचर्या के साथ जोड़ने कि कोशिश करती है, हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक के कार्यो को जोड़ते है | इस प्रकार के कई तथ्यों को मिलाकर एक राजनैतिक विचार पैदा होता है | इस घुमाव-दार प्रक्रिया को अच्छे से अच्छे लोग समझने में गलती कर देते है, क्योकि कुछ ऐसे विचार है जिनको राजनैतिक सत्ताओ ने सदियों से उपयोग किया और वो सब विचार हमारे जीवन की प्रक्रिया बन गये है, यह उस विचार धरा के द्वारा पैदा किया गया राजनैतिक विचार है जो आपको दिमागी रूप से अपने विचार के साथ रखना चाहते है |

यही सत्य है विचारधाराओं का, यह सब अपने बर्गीय चरित्र को जीवित रखने का संघर्ष है | इसी संघर्ष को समझना है जिससे राजनैतिक विचार धराये निकलती हैं |

वामपंथी विचारधारा क्या है ?

नौजवानो को इस विचारधारा को समझना अत्यंत आवश्यक है, किसी भी देश में नौजवान देश के विकास की धुरी होते है, उनकी समझ, लगन, विचार ही राष्ट्र बनाते हैं, देख में अभी खूब लेफ्ट राइट चल रहा है, चाहे केरला, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, बिहार, पूरे देश में, एक तरफ वामपंथी विचारधारा प्रखर हो रही है, वहीं दूसरी पूंजीवादी व्यवस्था को कुचलने की कोशिश में लगी है, आज देश की नई पीढ़ी बहुत ही कम शब्दो में इसको समझना चाहती है, अब हम इसके मुख्य विषय पर बात करते है । वामपंथी विचारधारा क्या है ।

नौजवान साथियों, पूरी दुनिया में दो प्रकार की व्यवस्थाऐ है, जिसमें एक पूंजीवादी व्यवस्था है और दूसरी समाजवादी व्यवस्था, यही व्यवस्थाऐ समाज चलाती है, इसी यही समाज अपनी एक राजसत्ता बनाती है, जिसको हम सरकार कहते है, हर सरकार एक राजनैतिक पार्टी बनाती है, जिसकी अपनी एक विचारधारा धारा होती है। विचारधारा वर्ग से पैदा होती है, वर्ग का आशय, धन से जुड़ा होता है, ये धन वर्ग बनाता है, इसलिए मुख्य रूप से दुनियां में दो वर्ग है, एक पूँजीपति वर्ग, दूसरा मेहनत कश वर्ग, जिसमें मजदूर किसान, दुकानदार, आम जनता, जो बहु संख्यक होती है ।

इन दोनों वर्गो में अलग अलग प्रकार की ताकते होती है, पूँजीपति वर्ग के पास धन होता है, समाजवादी वर्ग के पास जन होता है मगर धन नही होता, इसलिए इन दोनों वर्गो में कभी भी, वर्ग संघर्ष खत्म नही होते, पूँजीपति वर्ग और ज्यादा धन पर काबिज होना चाहता है, वही समाज अपने जीवन को खुशहाल बनाने के लिए, अपने श्रम के दाम को बढ़ा कर खुशहाल रहना चाहता है । साथियों, यहाँ ये समझने की बात है कि दोनों वर्ग मिलकर ही समाज चलाते है, पूँजीवादी विचारधारा, कहती है कि देश को पूँजीपति वर्ग ही चलायेगा, समाजवादी समाज कहता है कि पूँजीपति वर्ग की जरूरत ही नहीं है । समाज ही देश चलायेगा, खुद कमायेगे, सब मिलकर खायेगे । पूंजीवादी समाज कहता है कि जो हमारे पास काम करेंगे, उसको हम वेतन देगे, बाकी जो हम धन कमायेगे, वो हमारा है ।

वर्गीय समझ को समझने के लिए इतने उदाहरण काफ़ी है, जिसमें ये साफ हो जाता है कि समाज में दो वर्ग है, दो विचारधारा है, दो तरीके की व्यवस्थाऐ है । सब कुछ दो वर्ग में बटा है । आज हमने इतना समझ लिया कि ये पूरी दुनिया, दो वर्गीय समाज है । दोनों वर्ग अपने अपने हितों को कायम रखने के लिये, दूसरे को कमजोर करने, और अपने वश में रखने की अनगिनत प्रयास सदियों से करते आये हैं, आगे भी होगें । इसलिए यह सुनिश्चित है कि वर्ग संघर्ष कभी खत्म नही होगा, कमजोर हो सकता है ।

अमीर और गरीब की परिभाषा ।

आज इस समझ को स्पष्ट करने की ज़रुरत है कि हम अमीर किसको कहते है और गरीब किसको कहते है, इसमें बहुत कन्फ्यूज हमारे दिमाग में है । हम इसको स्पष्ट करते है ।

पहले, अमीर, पूँजीपति, कोर्परेट घराने, इनका अर्थ एक ही है, जब भी हम इन शब्दो को लिखते है, तो उसका मतलब होता है कि जिनकी सम्पति लगभग, एक हजार करोड़ से ज्यादा है, कई हजार करोड़ है । इन्हें पूँजीपति कहते है । जिनकी संपत्ति 100 करोड़ से लेकर 1000 करोड़ तक है उनको मध्यम वर्गीय पूंजीपति कहते हैं, जिनकी संपत्ति 100 करोड़ से कम है और लगभग 50 करोड़ तक है, उनको निम्नवर्गीय पूंजीपति कहते हैं, इससे कम जिसके पास भी संपत्ति है, उनको व्यापारी या दुकानदार कहते हैं। हम जब पूँजीपति या अमीर शब्द का उपयोग करते हैं, तब हमारे वो साथी जिनकी मासिक आय, तीस हजार महीना से एक लाख, दो लाख होती है, वो भी अपने आप को पूँजीपति मान लेते हैं, और वो बड़े पूँजीपति के वर्ग में अपने आप को जोड़ लेते हैं, जो वर्गीय समझ के हिसाब से सही नही है। हमारे समाज में आज ऐसी स्थिति हो गई है, कि हर एक व्यक्ति की समझ में, ऐसा सेट हो गया है कि मेरे से जो छोटा है वह गरीब है, जो गड्ढे खोदता है, खेत मजदूर है, ठेका मजदूर है, बस यही गरीब है, यही आम आदमी है, मध्यम वर्गीय परिवार जिनकी आय लगभग 100000 रुपए महीना हैं, वह अपने आप को आम आदमी भी नहीं मानते, वह पूंजीपति समझते हैं जो समझ गलत है । हम बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहते हैं पूंजीपति का मतलब उच्च पूंजीपति है जिस की संपत्ति 1000 करोड़ से ज्यादा है हम जहां पर भी पूंजीपति बोलते हैं उसका मतलब होता है कि हम इन पूंजीपतियों की बात कर रहे हैं ।

दूसरा, गरीब, आम आदमी, आम जनता, इसमें मुख्य रूप से " मजदूर किसान " का बड़ा हिस्सा आता है, जिनकी आय वर्तमान में, 250000 तक है । इसके साथ ही फुटकर व्यापारी, दुकानदार, भी इसी श्रेणी में आते हैं । इससे ऊपर मध्यम वर्गीय परिवार है, जिनकी आय 15 लाख तक होती है, इनको भी हम अपने वर्गीय चरित्र के साथ जोड़ते है । 15 लाख 50 लाख वाले उच्च मध्यम वर्गीय परिवार है, जो अपने आप को अमीर, पूँजीपति मानते है, मगर वो पूँजीपति नही है । कर्मचारीयो को एक बात अच्छी तरह से समझना है कि वो कितना भी वेतन पाते है, वो मजदूर है, श्रमिक है, मेहनत कश है, वो पूँजीपति नही है, वो अमीर नही है, इस दिखावे कि दुनिया में हमारे कर्मचारी बड़ी संख्या में इस बीमारी के शिकार हो चुके हैं, इन साथियों को अपनी समझ को सही करना है । वो मेहनत कश वर्ग का की हिस्सा हैं ।

दोनों वर्ग की अलग अलग परिभाषाएं भी है, पूँजीपति पति उसको कहते है कि जो कुछ न करता हो, और उसकी आमदनी, मुनाफा आता हो, उसको कुछ करने की जरूरत नहीं है । इनको पता नहीं होता, हमारी कि, हमारे पास कितनी संपत्ति है । इनको पूँजीपति कहते है ।

जो मेहनत करके अपना परिवार चलाता है, वो मेहनत कश है, वो मजदूर के रूप में हो, किसान के रूप में हो, वो दुकानदार के रूप में हो, कर्मचारी, सरकारी या प्राईवेट के रूप में हो, स्टाफ, मैनेजर के रूप में हो, सब मेहनत कश वर्ग है । जिसको आम आदमी, आम जनता, गरीब, कहते है ।

इस वर्गीय बटवारे को अच्छी तरह से समझना है और आप किस वर्ग में हो, इसको सुनिश्चित करना है । आगे जहाँ भी पूँजीपति लिखा होगा, उसका अर्थ आप इस परिभाषा से निकालेंगे, और जहाँ भी, आम आदमी, आम जनता, गरीब लिखा है, उसका अर्थ भी उपरोक्त परिभाषा से निकालेंगे । यदि आपकी वर्गीय समझ सही हो गई तो आप सही राजनैतिक विचारधारा के साथ खड़े होगें, जिससे आपके हित सुनिश्चित होगें ।

विचारधाराओ का वर्गीय चरित्र

हमने पहले देखा कि समाज दो वर्गो में बटा है, जिसमें एक धन वाले यानि पूँजीपति, मतलब , पूँजीवादी व्यवस्था । दूसरा गरीब, मजदूर, किसान, कर्मचारी, आम जनता, मतलब, जन यानि जनता, जनता मतलब समाज, समाज मतलब समाजवादी व्यवस्था, समाजवादी व्यवस्था, मतलब वामपंथी विचारधारा, वामपंथी विचारधारा मतलब, वामपंथी राजसत्ता । यही दो वर्गीय दुनिया है, तीसरा कोई नहीं है ।

यह समझना बहुत जरूरी है कि दोनों वर्ग अपने वर्ग हित को नहीं छोड़ते, जब पूँजीवादी व्यवस्था होती है, तब पूँजीपतियो को फायदा पहुचाया जाता है, उनकी सुरक्षा की जाती है, दूसरे वर्ग को लूटने, शोषण करने, निचोड़ने की सारी छूटे दी जाती है, जैसा हमारे देश में हो रहा है, एक तरफ पूँजीपतियो की बेताहासा सम्पति बढ़ रही है, अम्बानी बन्धु, अडानी, जैसे सारे पूँजीपतियो की सम्पति बढ़ रही है, दूसरी तरफ देश में गरीबी, बेरोजगारी, भूमिहीनो, खेत मजदूरों, बेरोजगार नौजवान, बच्चे बच्चियो की संख्या बेताहासा बढ़ रही है, इसका दूसरा रूप भी देखिए देश की सरकारे पूँजीपतियो को मुफ्त में जमीन, करो में छूट, बैक से हजारों करोड़ का कर्ज, चुकाने की जरूरत नहीं है, बाद में सरकार उसको सरकारी खजाने से चुका देगी, ऐसा करके लाखों लाख हजारों करोड़ की संपत्ति इनको मुफ्त में दे देते है । तीसरा रूप देखिए बेरोजगार नौजवान, बच्चों, बच्चियो, का शोषण करके, कम दामो में काम कराके, पूँजीपतियो का मुनाफा बढ़ाना पक्का करवाते है, चौथा रूप देखिए पूँजीपति इस धन को हमारे देश से लूट कर दुनियां के दूसरे देशों में ले जाकर, अपना साम्राज्य बनाते है, ये पूँजीवादी राजसत्ताऐ दुनियां स्तर पर सहयोग करते । ऐसे न जाने कितने रूप है, जिनसे ये अपने वर्ग के हित को सुरक्षित करते है, उसको और ज्यादा मजबूत करते है ।

इसी प्रकार समाजवादी व्यवस्था दुनिया में जहाँ भी है, और जहाँ भी रही है, इन्हौने आम जनता के लिए, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जीने के सभी संसाधन सबसे पहले जुटाए, जो भी धन पैदा हो, वो समाज की सरकार के पास हो, और वो सरकार समाज की बुनियादी जरुरतो पर पहले खर्च करे । ऐसी पॉलिसी बनाते की अमीरी, गरीबी की खाई कम हो, पूँजीपति कम हो, आम जनता के पास आय ज्यादा हो, उनके पास धन ज्यादा हो । इसी कारण ये जमीन बटवारा, स्थाई नौकरी, अच्छा वेतन, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य मुफ्त करने की मॉग करते है और जहाँ वामपंथी राजसत्ता है, वहाँ ये सब है । हमारे देश में भी, जहाँ भी वामपंथी सरकारे है, वहाँ पर बहुत सारी योजनाएं, पूँजीवादी व्यवस्था के राज्यो से अलग होगी, और अलग है । ये वर्गीय हित है, राजसत्ताओ की विचारधाराओ से ही वर्गीय हित निकलते है, इससे ये तो समझ में आया होगा कि नरेंद्र मोदी जी की पूँजीवादी व्यवस्था की सरकार आगे किस दिशा में जाएगी । अपने वर्ग हित के लिए और अधिक शोषण, अत्याचार करने की छूट देगी, आम जनता पर टेक्स लगायेगी, इसी का एक रूप जी एस टी है, आम जनता की पूंजी को एकत्रित करके, बैको के माध्यम से पूँजीपतियो को देगी, इसका उदाहरण नोटबंदी है, जिसके नाम पर आम जनता का सारा पैसा बेंको में जबरदस्ती जमा करवा लिया और पूरी व्यवस्था के संसाधनों पर मुनाफा कमाने के लिए पूँजीपतियो के हवाले करेंगी, जिसका उदाहरण ये प्राईवेट स्कूल और प्राईवेट अस्पताल है । ये सुनिश्चित है कि आगे नरेंद्र मोदी जी भी यही करेगे, यही कांग्रेस भी कर रही थी । उम्मीद है कि आप ये वर्गीय हित समझ गए होगें, यदि आप ये समझ गए तो पूँजीवादी, राजसत्ता, सरकार, क्या करेगी, क्या क्या नीतियाँ बनायेगी, आप स्वयं बड़ी आसानी से समझ लेगे, आप खुद सारे ऑकलन कर सकते है ।

हमारे देश में केवल वामपंथी मोर्चा ही नीतियों को बदलने की आवाज़ उठाते है, निजीकरण करने का विरोध करते है, शिक्षा स्वास्थ्य, को निजीकरण करने, सरकारी कंपनियों को पूँजीपतियो को बेचने का विरोध करते है, नौजवान के लिए रोजगार पैदा करने की वाली योजनाओं को लाने की मॉग करते है, बेरोजगारी को रोकने की, अच्छी वेतन वृद्धि करने, स्थाई नौकरी देने, की मॉग करते है, ऐसे न जाने कितनी सारी मॉगो के लिए पूरे देश में संघर्ष करते है, धरने प्रदर्शन, हड़ताले करते है । यही वर्गीय चरित्र है ।

एक उदाहरण और प्रस्तुत करते है, कि कांग्रेस और भाजपा की आर्थिक नीतियों में कोई फर्क है, कोई फर्क नहीं है, सिर्फ देश की जनता को मूर्ख बनाने के लिए, जो भी विपक्ष में रहता है, वह विरोध करेगा, सत्ता में आते ही वही करेगा, जो पूँजीवादी व्यवस्था के लिए जरूरी है, नरेंद्र मोदी सरकार इसका सबसे बड़ा सबूत है, इन्हौने चुनाव जीतने के बाद वही किया जो कांग्रेस कर रही थी, FDI सबसे बड़ा उदाहरण हैं, बाकी कुछ योजनाओं के नाम बदल दिए, जब तक पूँजीवादी विचारधारा की राजसत्ता की पार्टी, सत्ता में रहेगी, तब तक कुछ नहीं बदल सकता, नतीजा एक ही निकलेगा, इन अमीरो की संख्या बढ़ेगी, और देश में गरीबो और बेरोज़गार नौजवानो की संख्या बढ़ेगी । यही परिणाम निकलेगा, यह परिणाम क्यों निकलेगा, क्योंकि वर्गीय चरित्र ही उसका वही है, इसलिए वह अपने वर्ग हित में ही काम करेगे । उसके वर्ग हित के लिए देश प्राकृतिक संसाधनों, संपदा पर कब्जा, देश के आम जनता के धन पर कब्जा, सस्ता मजदूर, कर्मचारी, अधिकारी, जिसके लिए बेरोजगारो की फौज, नौकरी से भगाने की छूट, जैसे कोड़े, चाबुक चाहिए, ये वर्गीय चरित्र है, शायद इस चरित्र को, जो भी इस आर्टिकल को पड़ेगा, समझ जायेगा । ये विचारधारा का अगला चेहरा है, जिसको हम कहते है, वर्गीय चरित्र, वर्गीय हित है ।

भारत के छात्र आन्दोलन, का वर्गीय चेहरा

हमारे देश में छात्र आन्दोलन हमेशा मुखर रहा है, आजादी के आन्दोलन में छात्र आन्दोलन की प्रमुख भूमिका रही, इन्ही आन्दोलन ने नौजवानो को देश के लिए अपनी जान तक देने के लिए प्रेरित किया, आज देश में कई बड़े छात्र संगठन है, अभी हमने जे एन यू, बी एच यू, हैदराबाद यूनिवसिर्टी, के आन्दोलनो को देखा है ।

इन संगठनो में भी दो वर्गीय संगठन है, एक वामपंथी विचारधारा, दूसरे पूँजीवादी विचारधारा । यह समझना बहुत जरूरी है कि ये वर्गीय समाज है, इसमें वर्ग होना सुनिश्चित है। वामपंथी विचारधारा के छात्र संगठन, एस एफ आई ( स्टूडेंट फैडरेशन ऑफ इंडिया ) ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोशिएशन (ए आई एस ए ) है, इसी प्रकार से पूँजीवादी विचारधारा के छात्र संगठन, ए बी वी पी (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ),एन एस यू आई ( नेशनल स्टूडेंट युनियन ऑफ इंडिया ) हैं, और भी कुछ छोटे छोटे छात्र संगठन है, जिसमें कुछ दलित छात्र संगठन भी है, जो अलग अलग राजनैतिक विचारों का समर्थन करते है ।

अब मुद्दों पर आते हैं, कि ये संगठन क्या मुद्दे उठाते है, सभी छात्र संगठन शिक्षा का व्यावसायिक बंद करो, फीस कम करो, सबको शिक्षा दो, शिक्षा बजट बढ़ाओ, जैसी, कुछ मॉगे एक जैसी है, मगर कुछ अंदर जायेगे तो पायेगे कि छात्र संगठनो की मांगे वर्गीय चरित्र के हिसाब से अलग अलग है ।

जैसे एक पूँजीवादी विचारधारा के छात्र संगठन, सरकारो के खिलाफ, निजीकरण बंद करो का कभी कभार नारा देते है, मगर सरकारो पर दबाव नही बनाते, क्यों नहीं बनाते, क्योंकि उनके वर्गीय चरित्र की राजसत्ता के लिए निजीकरण करके पूँजीपतियो को मुनाफा कमाने के लिए देना, उनका राजनैतिक वर्गीय हित है, इसलिए वो उसके खिलाफ सिर्फ दिखावा करते है ।

दूसरा, शिक्षा मुफ्त करो, ये नारा भी अधिकतर पूँजीवादी छात्र संगठन, नही दे पाते, क्योंकि इसमें भी इनके वर्गीय हित में, शिक्षा को व्यवसाय बनाकर, उस पर मुनाफा कमाना, इनका वर्गीय हित है ।

तीसरा, सबको रोजगार दो, स्थाई नौकरी दो, अच्छा वेतन दो, ये मॉग तो पूँजीवादी विचारधारा के वर्गीय हित के विरुद्ध है, इसलिए ये नारे पूँजीवादी छात्र संगठन लगाते नही है, लगाते है तो सिर्फ छात्रों को बेबकूफ बनाने के लिए ।

चौथा, शिक्षा में क्या पढ़ाया जाना चाहिए, इसमें बहुत ही ज्यादा कन्फ्यूजन है, ये छात्र संगठन वैज्ञानिक विचारधारा, से तर्क समझ, पढ़ाई होनी चाहिए, इसकी मॉग भी नहीं करते, क्योंकि ये इनके वर्गीय हित के लिए खतरा है, और इनके हितों के विरुद्ध है । दूसरा इनके अंदर भी अलग अलग इतिहास है, कोई गॉधी को पढ़ाना चाहता है, कोई सावरकर को पढ़ाना चाहता है, मगर क्रांतिकारी विचारों के इतिहास को दोनों नही पढ़ना चाहते, सरदार भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद सुभाष चंद्र बोस लक्ष्मी सहगल भीमराव अंबेडकर , जैसे विचारको के आदर्श विचारों को नहीं पढ़ाना चाहते हैं, यहां तक की रानी लक्ष्मीबाई बहादुर शाह जफर जैसे सैकड़ों क्रांतिकारियों के इतिहास को भी नहीं पढ़ाना चाहते हैं ।

पॉचवॉ, अभी हमारे देश में पूंजीवादी विचारधारा के विचारक केवल महात्मा गांधी बच्चे हैं उनके अलावा अभी कोई नहीं है, इसीलिए आज भाजापा हो या कांग्रेस दोनों ने अपना आइकॉन महात्मा गांधी जी को बना रखा है यह इसलिए कर रहे हैं कि ये उनकी विचारधारा की मजबूरी है । क्योंकि वह सरदार भगत सिंह सुभाष चंद्र बोस चंद्रशेखर आजाद लक्ष्मी सहगल बाबा अंबेडकर को अपना आइकॉन नहीं बना सकते, क्योंकि इन महान क्रांतिकारियों का मत इस पूंजीवादी शोषण कारी व्यवस्था के खिलाफ था, इसीलिए इन क्रांतिकारियों ने इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया । इसलिए पूँजीवादी विचारधारा के छात्र संगठन, इंकलाब जिंदाबाद, के नारे नहीं लगाते । जिसका अर्थ होता है कि हम इस व्यवस्था को बदलना चाहते हैं ।

अब हम वामपंथी विचारधारा के छात्र संगठनों की चर्चा करते हैं :- एक, इनका पहला नारा है कि सबको शिक्षा सबको काम, हर हाथ को काम दो काम का वाजिब दाम दो, इन दोनों नारों में विचारधारा का संपूर्ण मैसेज है, जो समाजवादी, समाज के वर्गीय चरित्र के हित में है ।

दूसरा, इन छात्र संगठनों का सबसे प्रमुख नारा, पूरे देश में उच्च शिक्षा तक शिक्षा मुक्त करो, सरकार के बजट में शिक्षा का बजट बढ़ाओ, यह भी समाजवादी समाज के वर्गीय चरित्र के हित में है ।

तीसरा, यह छात्र संगठन, शोषणकारी आर्थिक नीतियों का विरोध करते हैं, यह वैश्वीकरण निजीकरण भूमंडलीकरण की नीतियां बंद करो, रोजगार पैदा करने वाली आर्थिक नीतियां बनाओ, हर हाथ को काम दो काम का वाजिब दाम दो, बेरोजगार नौजवानों को स्थाई रोजगार दो, यह मांगे पूंजीवादी विचारधारा के छात्र संगठन नहीं उठाते, इन मॉगो को वामपंथी विचारधारा के छात्र संगठन उठाते हैं, क्योंकि यही समाजवादी समाज के वर्गीय हित में है ।

चौथा, वामपंथी छात्र संगठनों की मांग रहती है कि शिक्षा में अंधविश्वास फैलाने वाले, सभी सामग्री को हटाया जाए, वैज्ञानिक तर्क के आधार पर, प्रकृति के नियम से, चलने वाले विकास चक्र को, छात्रों को पढ़ाया जाना चाहिए, इतिहास में क्रांतिकारियों के इतिहास को, विस्तार पूर्वक पढ़ाना चाहिए, आजादी के इतिहास में, रानी लक्ष्मी बाई से लेकर, सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस, जैसे अनगिनत क्रांतिकारियों के इतिहास को, आज की नौजवान पीढ़ी को पढ़ाया जाना चाहिए । बिना वैज्ञानिक चेतना के, हमारे देश में वैज्ञानिक विकास नहीं हो सकता, बिना वैज्ञानिक विकास किए हम महाशक्ति कभी नहीं बन सकते।

यह हमारे देश के छात्र आंदोलन का वर्गीय चरित्र है, जिसको हर नौजवान को, छात्र को, समाज के हर वर्ग को, अच्छी तरह से समझना पड़ेगा, तभी हमारे देश में, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन आएगा, तभी हम महाशक्ति बन पाएंगे, यह काम केवल देश की नौजवान पीढ़ी कर सकती है, जिस में छात्रों की अहम भूमिका होगी ।

महिलाओं की स्थिति पर, वामपंथ की समझ

महिलाओं पर सदियों से तरह तरह से अत्याचार हुए, किसी भी सदी में, कोई भी आपदा आई, कोई भी सामाजिक उत्पीड़न हुआ, उसकी शुरुआत महिलाओं से शुरू हुई, महिलाए भी इस वर्गीय चक्र में सबसे ज्यादा घिसी गई, आज इसी समझ पर एक नजर डालते है ।

जैसा कि हमने देखा कि पूरा समाज दो वर्गोय है, जिसमें एक पूँजीवादी विचारधारा की व्यवस्था और दूसरी समाजवादी विचारधारा की व्यवस्था, ये पूरी दुनिया का वर्गीय चरित्र है, अभी हम भारत देश की बात करेगे । इस वर्गीय व्यवस्था का असर दिखाता है कि सामाजिक व्यवस्थाऐ किस प्रकार से खुले रूप से भिन्न भिन्न है । इसमें एक समझ और जोड़ देते है कि समाज में दो वर्गीय विचारधारा है, जिसमें एक को भाववादी और दूसरी को भौतिकवादी, इन विचारों से ही पूरी समाज की संरचना है, इस पर चर्चा अलग से करेगे । अब हम पूँजीवादी विचारधारा व्यवस्था और भाववादी विचारों में महिलाओं की स्थिति को समझते है ।

01. इस व्यवस्था महिलाओं पर बंदिशे बहुत सारी है, उनके लिए नियम बहुत सारे है, ये हर धर्मो में महिलाओं की स्थिति लगभग एक जैसी है, ये नियम सदियों से लगे है, जिसमें कुछ को धर्म के नाम पर थोपा गया, कुछ को सम्मान और इज्जत के नाम पर, जातिय व्यवस्था ने महिलाओं के शोषण, अत्याचार की बड़ी कड़ी जोड़ दी, इसी प्रकार छूआछूत, बराबरी, दहेज प्रथा, शिक्षा में बराबरी, सेक्चुअल शोषण, पूर्व में सती प्रथा, तलाक प्रथा, इस्लाम का तीन तलाक, कुछ लोगों ने बच्चे पैदा करने की मशीन समझा, तो किसी ने पर्दे के अंदर रखने का सामान, किसी ने उसको अपनी इज्जत बना दिया, पति भगवान, महिला सामान, वो कुछ भी करें, पीटे, करोड़े, सड़क पर पीटे, भूखा रखे, पति परमेश्वर है, कुछ भी हो, महिला उस पुरुष के अत्याचार की आत्मरक्षा भी नहीं कर सकती, यदि कोई उसको बचाने पहुंच गया, तो ये समाज के लोग, उसका पति उसको तुरंत बदचलन घोषित कर देते, पति और बच्चों की रक्षा के लिए भूखे रहना, मंदिरो मस्जिदो चर्चो में जाकर, भगवान, अल्लाह, ईसू के सामने परिवार के लिए गिड़ गिड़ाना, उनकी सलामती की दुआ मॉगना, जाति और धर्म की बेड़ियो ने ऐसा जकड़ रखा है कि महिलाओं की अपने हिसाब से जीने की आजादी ही खत्म कर दी, हर धर्म में महिलाओं के लिए स्पेशल नियम है, जिसमें तरह तरह के प्रतिबंध है, बड़ी संख्या में जिसको महिलाओं ने स्वीकार कर लिया और अपने जीवन का हिस्सा बना लिया ।

02. शिक्षा में सदियों से महिलाओं को पीछे रखा गया, मगर आज कुछ स्तर बदल रहा है, और तेजी से बदलने की जरुरत है, मनुस्मृति सोच के लोगों में अभी भी वही भरी हुई है, वही हाल इस्लाम मानने वालों का है ।

03. दहेज प्रथा इस समाज का सबसे बड़ा कलंक है, जिसमें समाज पूरी तरह से लिप्त हो गया है, आज की शान शौकत और दिखावे ने, इसको और बड़ा दिया है, इसको समाज के धनाड्ड लोग नहीं बदलने दे रहे है । इसकी शिकार बच्चियो की दर्दनाक पीढ़ा की अनगिनत कहानियॉ है, अनगिनत दर्द दफन हो गए हैं । पूँजीवादी समाज में इसका कोई वह दिखाई नहीं दे रहा है, न कोई इसकी पहल करने को तैयार है ।

04. अंधविश्वास, जिसकी सबसे ज्यादा शिकार, महिलाए होती है, इसमें हर धर्म में, इन दिमागी बेड़ियां डाली जाती है, दिमाग को शून्य करके, शारीरिक शोषण भी किया जाता है । इसका कोई इलाज इस विचारधारा के अंदर नही है, और ये विचारधारा इसको ऐसे ही रखना चाहती है ।

05. धर्म के आधार पर पहनावा, महिलाओं पर पहचान के रूप में कुछ जेबर पहनना, कुछ अलग पहनावा पहनना, महिलाओं की पहचान है, जिसको और मजबूत किया जा रहा है, दूसरी तरफ जबरजस्ती मनवाया जा रहा है । शादियो में जाति, धर्म का प्रतिबंध सुनिश्चित है, जिसके बारे में न जाने कितनी हत्याए हो चुकी हैं ।

इतना काफी है, अब हम समाजवादी विचारधारा की व्यवस्था में, हम महिलाओं की स्थिति को देखते हैं :-

01. समाजवादी वैज्ञानिक विचारधारा के समाज में, जाति और धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नही होता, इसलिए जाति धर्म के नाम पर लगाए गए सारे प्रतिबंध खत्म हो जाते है । 02. दहेज प्रथा नाम का कोई शब्द भी नहीं है, शादियो 501 रुपये में हो जाती है, कोई दिखावा नही किया जाता । 03. महिलाओं के साथ समानता का भाव है, ऐसा कोई भी काम नहीं है, जिसको ये कहा जाए कि ये सिर्फ महिला का है, सब में, सब कुछ बराबर है । 04. वैज्ञानिक विचारधारा है, इसलिए, पढाई लिखाई के साथ किसी भी स्तर पर लड़का, लड़की में कोई भेदभाव नही है । इसलिए, महिलाओं की स्थिति में समाजवादी विचारधारा की समाज व्यवस्था से सही कोई व्यवस्था नहीं है । यह अंतर क्यों है, क्योंकि व्यवस्था विचारधारा से ही बनती है, विचारधारा से ही बदलाव आते है, इसलिए महिलाओं की इस दुर्दशा का कारण, नसीब, किस्मत, या पुराने जन्मो का पाप नही है, इसका कारण पूँजीवादी विचारधारा समाज व्यवस्था है, जिसको उखाड़ फैकने की जरूरत है, तभी हम दुनिया में महाशक्ति बनने की तरफ बढ़ पायेगे, ये अंधविश्वासी व्यवस्था, महाशक्ति कभी नहीं हो सकती है । इस व्यवस्था में महिलाओं को बराबरी के अधिकार कभी नहीं मिल सकते ।

बेरोजगारी क्यों है, समाधान क्या है ।

ऐसे समझे की बाजार में किसी भी वस्तु की मंहगाई कब बढ़ती है, जब उस वस्तु की बाजार में ज्यादा संख्या हो, और उसको खरीदने वाले कम हो, तो वह वस्तु सस्ती हो जाएगी, बेचने वाले को डर लगा रहेगा कि कही मेरी लागत न डूब जाए । दूसरा ऐसे समझे जैसे टमाटर बाजार में, 100 रुपये किलो बिकता है और 5 रुपये किलो भी बिकता है, इसमें एक कमी होती है कि थोड़े समय बाद सड़ने लगता है, तब उसको बहुत कम दामो में बेचना पड़ता है, नही तो वो सड़ जाएगा ।

ऐसी ही हालत बेरोजगारी की है, थोड़ी समय के लिए, एक नौजवान श्रमिक को वस्तु समझ लेते हैं, वो बाजार में अपना श्रम बेचने के लिए खड़ा है, उसके श्रम की कीमत कैसे तय होगी, यदि बाजार में श्रमिकों की मॉग ज्यादा है, और संख्या कम है तो, उसके श्रम की कीमत ज्यादा मिलेगी, वह मॉग कर पायेगा, यदि मॉग कम है, श्रमिक ज्यादा है, तो उनके श्रम की कीमत कम होगी और चुपचाप गुलामो की तरह काम करेगा ।

ये समझने के बाद यह तो समझ आ गया कि श्रम सस्ता करने के लिए, रोजगार कम करना होगें, कुछ रोजगार खत्म करना होगें, ज्यादा नौजवानो को पढ़ा लिखा कर तैयार करना होगा । इससे क्या होगा "श्रमिक" मॉग से ज्यादा हो जाएगे, इसका परिणाम होगा कि श्रम सस्ता हो जाएगा ।

अब हम नरेंद्र मोदी जी की पूँजीवादी विचारधारा की राजसत्ता की नीतियों का आकलन करते है । इन्हौने क्या किया, एक सरकारी विभागो के लाखों पदो को समाप्त कर दिया, कुछ खाली पद है जिन पर भर्ती नही कर रहे है, श्रम कानूनो को खत्म किया, जिससे श्रमिक नौकरी से हटाने के डर से गुलाम बन गया । क्योंकि उसको दूसरा रोजगार नही मिलने का डर है । ग्रामीण क्षेत्रों की रोजगार पैदा करने वाली सरकारी योजना कम की, या खत्म की, नरेगा जैसी कई योजनाएं है, किसानों की खाद बीज की सब्सिटी खत्म की, कीटनाशक, बीज के दाम बढ़ाये, बिजली, डीजल, खेती के संसाधनों के दाम बढ़ाये, जिससे खेती में लागत, बढ़ा दी, और फसलों के कोई न्यूनतम दाम तय नहीं किये । न्यूनतम दाम का मतलब है कि सब लागत जोड़ कर, जो दाम लगता है, उसमें 40 प्रतिशत किसान का मेहनताना जोड़ कर जो दाम बने, उसको न्यूनतम दाम कहा जाए । ऐसा इन्होंने नहीं किया । जिसका परिणाम यह निकला कि खेती भी फायदे का सौदा नहीं बची, इससे गॉव के किसानों के बच्चे ने खेती छोड़कर शहरों की तरफ भागना शुरू किया । इससे क्या हुआ कि शहरों में बेरोजगारो की संख्या और बढ़ गई । तीसरा काम क्या किया कि बच्चों के लिए इंजीनियरिंग कॉलेज, गली गली खुलवा दिए, गली गली आई टी आई खुलवा दी, पिछले 10 वर्षो में करोड़ो इंजीनियर बना दिए । देखिए, क्या स्तिथि बनी, बेरोजगारी बढ़ी, असुरक्षा बढ़ी, जिससे पूँजीपतियौ को क्या फायदा हुआ, कम से कम पैसे में नौजवान काम करने के लिए तैयार खड़े होने लगे, गुलामो की तरह काम करने के लिए तैयार खड़े है, कम्पटीशन है कि हम ज्यादा काम करेंगे, दूसरा कह रहा, हम ज्यादा काम करेंगे, इसी प्रकार ये दस हजार में कर रहा है, तो में आठ में करने को तैयार हूँ, ये आठ में करने को तैयार है, तो में सात में करने को तैयार हूँ, इस परिस्थिति का रिजल्ट देखें, बिना कुछ करें, गुलामो की सेना, पूँजीपतियो की सेवा के लिए खड़ी कर दी । यही राजनीति है, जिसको सबको समझना है ।

इस पूरे ऑर्टीकल का निष्कर्ष यह है कि ये बेरोजगारी पूँजीवादी विचारधारा की व्यवस्था की बुनियादी जरूरत है, इसी से उनके मुनाफे बढ़ते है, खजाने भरते है, अभी हमारे देश की GDP कम हो रही है, और पूँजीपतियो के मुनाफा, बेताहासा बढ़ रहे है, मुकेश अंबानी की संपत्ति केवल एक वर्ष में 67 प्रतिशत बढ़ गई, हमें यह समझना है कि क्या ये पूँजीवादी राजसत्ता इस व्यवस्था को खत्म करेगी, क्या अंबानी अडानी जिनके चंदे से नरेंद्र मोदी जी चुनाव जीते है, क्या ये लोग इसको बदलने देगे, कभी नहीं साथियों ये उनकी संजीवनी है, जिससे वो जीवित है । यदि इस बेरोजगारी को खत्म करना है तो केवल एक ही रास्ता है कि पूँजीवादी विचारधारा की राजसत्ता को उखाड़ फेक कर समाजवादी विचारधारा की राजसत्ता को कायम किया जाए, जिनकी आर्थिक नीतियों इन पूँजीवादी विचारधारा की व्यवस्था से एकदम उल्टी है, तभी आम जनता के फायदे के लिए नीतियाँ बनाई जायेगी, तभी ये बेरोजगारी खत्म होगी, हमारे देश में जब तक ये पूँजीवादी राजसत्ता रहेगी, तब बेरोजगारी खत्म नही होगी, तरह तरह के रूप में, और उग्र होकर आयेगी । साथियों इसलिए 70 सालो में बेरोजगारी खत्म नही हुई, न अभी खत्म होने वाली है । इन गलत नीतियों से दरिद्रता बढ़ रही है, जिसको भगवान और नसीब किस्मत पुराने जन्मो का फल, भगवान, अल्लाह, ईसू, और न जाने कितने गुरु पैदा किए गए हैं, जो आपके दिमाग को असली जगह से भटका रहे है, ताकि आप इस पूँजीवादी राजसत्ता के उखाड़ फैकने के लिए खड़े न हो जाए । इसमें किसी धर्म का नसीब किस्मत, भगवान, अल्लाह किसी का कोई रोल नही है, यह विषय शुद्ध रूप से राजनैतिक विचारधारा की राजसत्ताओ, के विचारों से जुड़ा है । इनको बदलने से ही हमारी किस्मत, नसीब, अच्छे हो सकते है, बदल सकते है और कोई रास्ता नही है, जितना जल्दी हो सके, इसको बदलने के संघर्ष में शामिल हुआ जाए ।

भारत की राजनीति को समझे ।

राजनीति, को समझना हर आदमी को बेहद जरूरी है, क्योंकि इसी से हमारे जीवन में बदलाव आते है, राजनीति दो वर्गीय है, एक पूँजीवादी राजनीति, दूसरी समाजवादी राजनीति, दोनों राजनीति में सब कुछ बिल्कुल अलग अलग है, क्योंकि दोनों वर्ग अपने अपने वर्गो के हित में काम करते है, हमारे देश में, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, जनता दल यू, जनता दल युनाइटेड, साउथ में बहुत सारी क्षेत्रीय पार्टी है । ये सब पूँजीवादी राजनीति की पार्टी है ।

समाजवादी विचारधारा पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, (सी पी आई एम ) , भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी (सी पी आई ), कम्यूनिस्ट पार्टी (मा ले ),फॉरवर्ड ब्लॉक, एस यू सी आई, जैसे दल है, जिनको वामपंथी कहते है । ये आम जनता मजदूर कर्मचारी, किसान, दुकानदारो की पार्टी है । इसके अलावा तीसरी कोई विचारधारा नही है ।

इसलिए भाजपा और कांग्रेस में क्या फर्क है, पहले इसको समझ लेते हैं, इन दोनों पार्टियों की आर्थिक नीतियों में कोई फर्क है, कांग्रेस जिन नीतियों पर चल रही थी, आज भाजपा भी उन्हीं आर्थिक नीतियों पर चल रही हैं । इनमें एक सहमति है कि जो भी विपक्ष में होगा, उसका काम, सत्ता पक्ष की हर नीति का विरोध करना है, आखिरी में समर्थन दे देना है, ताकि देश की जनता, जब गुस्से में आयेगी, तो भाजपा गुस्सा होकर कांग्रेस को जितायेगी, और कांग्रेस से गुस्सा होकर भाजपा को जितायेगी, इसलिए इन पार्टियों में एक भाई भाजपा में है, तो एक कांग्रेस में है ताकि कोई भी जीते सत्ता हमारे हाथ में ही रहेंगी ,और ये काम दोनों पार्टी बहुत ही खूबसूरती से कर रहे है । एक फर्क और है, कि भाजपा हिन्दू धर्म पर अपनी राजनीति केन्द्रित करते है, इसी से वोट बैक बनाते हैं, धर्म पर भावनात्मक, आस्था को भड़का कर, पूरी राजनीति करते है, कांग्रेस सबको लेकर अपना वोट बैक बनाते हैं, ये सर्वधर्म पर राजनीति करते है, अंधविश्वास के मामले में दोनों एक हैं, महिजातिवाद, छूआछूत, इसमें दोनों एक हैं, मजदूरों, महिलाओं, नौजवान, मजदूरों, किसानों के बारे में दोनों एक हैं, यह दोनों शुद्व रूप से, पूँजीवादी राजनीति पार्टी है, जिनका मुख्य लक्ष्य पूँजीवादी राजनीति व्यवस्था को कायम रखना है ।

इसलिए जिस पार्टी की सरकार बनती है, उस पार्टी में बड़ी संख्या में लोग चले जाते है, इन दोनों को एक दूसरे में चले जाने में कोई अापत्ति नहीं है, अभी भाजपा में 136 सॉसद ऐसे है, जो कांग्रेसी थे, अभी बड़ी संख्या में कांग्रेसी, भाजपा में चले गए, और जा रहे है । इसी प्रकार जब कांग्रेस सत्ता में थी तब भाजपा के लोग बड़ी संख्या में कांग्रेस में गए थे । इन दोनों का चरित्र स्पष्ट हो गया है । कुछ पार्टी ऐसी है जो जाति के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर, भाषा के आधार पर, राजनीति कर रहे है मगर इनका चरित्र पूंजीवादी ही है । दूसरे समाजवादी राजनैतिक पार्टीओ में सबसे बड़ी पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी है ( सी पी आई एम ) है, इन वामपंथी दलो की समझ में भी, थोड़ा थोड़ा फर्क है, मगर बेसिक विचारधारा सबकी एक ही है । ये पार्टियॉ आजादी के आन्दोलन से निकले क्रांतिकारीयो ने इसकी विचारधारा को चलाया, आजादी के बाद बड़ी संख्या क्रांतिकारी इन राजनैतिक पार्टीयो में शामिल हुए ।

इन दोनों धाराओ की राजनीति हमारे देश में रही है, मगर देश में राजनैतिक सत्ता हमेशा पूँजीवादी राजनीति दलो की रही है । वामपंथी दलो की राज्य सरकारे कुछ राज्यों में है जहाँ पर मजदूर किसानों, आम जनता को अन्य राज्यों से बेहतर स्तिथि है, क्योंकि वो राज्य है इसलिए बड़ा बदलाव नहीं किया जा सकता ।

कुछ महत्वपूर्ण अंतर और समझते है, जो विचारधारा के कारण अलग अलग है ।

भ्रष्टाचार पर विचार

पूँजीवादी राजनीति पार्टी बिना भ्रष्टाचार के नहीं चल सकती, इनके अधिकतर नेता, सत्ता का दुरुपयोग करके, निजी संपत्ति बढ़ाते है । इसलिए चुनाव में कई करोड़ रुपये लगाते है फिर उसके कई गुना, भ्रष्टाचार करके कमाते है, इन्हौने राजनीति को एक बिजनेस जैसा बना दिया है ।

समाजवादी विचारधारा की पार्टी, इस पार्टी में, सभी नेता गण ईमानदार और कर्मठ होती है, ये क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए काम करते है, जिसमें सबसे पहले सिखाया जाता है, कि हमें समाज को बदलने के लिए कुर्बानी करना है, हमें तन मन धन तीनों ,समाज को समर्पित करना है, यही से ईमानदारी, बोई जाती है, देश में वामपंथी दलो में लाखों ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपना जीवन पार्टी को दे दिया है, बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपनी सम्पति पार्टी को दी है, सारे सॉसद, विधायक, अपना सारा वेतन पार्टी को देते है, ये केवल वामपंथी विचारधारा की पार्टियों में होता है । ऐसे सैकड़ों उदाहरण विस्तारित चर्चा अलग आर्टिकल में करेगे ।

यह पहला बड़ा अंतर है ।

दूसरा, धार्मिक अंधविश्वास यह पूँजीवादी राजनीति में कूट कूट करके भरा है, इसी अंधविश्वास से आम जनता के दिमाग को शून्य कर दिया है, उनका सम्बन्ध एक अदृश्य शक्ति से जोड़ दिया है, इसमें दो, कमजोरी को पकड़ लिया, एक "डर " और दूसरा "लालच " यही इनके इस डरावनी सोच का आधार है, जिसको लेकर इनकी पूरी राजनीति है । इस पर विस्तारित चर्चा अलग आर्टिकल में करेगे ।

समाजवादी विचारधारा, वैज्ञानिक विचारधारा पर चलते है, तर्क के आधार पर, सच और झूठ का निर्णय करते है, इसमें डर और लालच जैसे शब्दों की कोई जगह नहीं है । इसलिए इनकी राजनिति सामाजिक विषयो पर ही होती हैं, समाज सुधार पर होती है, समाज विकास पर होती है, धार्मिक और अंधविश्वास के सभी विषय निजी विवेक पर छोड़ दिए जाते है । यह बहुत बड़ा अंतर है ।

इसी कारण केरल, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा में वामपंथी विचारधारा की सरकारो के समय, भ्रष्टाचार, घोटाले, हमने कभी नहीं सुने, और जहाँ वामपंथी सरकारे है वहाँ धार्मिक दंगे कभी नहीं हुए, क्योंकि यह विचारधारा इस प्रकार के कृत्यो को आने नही देती ।

यह बिल्कुल साफ है कि ईमानदारी, बेईमानी, विचारधारा से आती है, हमें गर्व होना चाहिए कि हमारे देश में आज भी बड़ी संख्या में लोग और नेता गण, इस ईमानदारी की विचारधारा में है, उसको केवल आगे लाने की जरूरत है, इस भ्रष्टाचारी विचारधारा का विकल्प, समाजवादी विचारधारा है, ये पूरे देश के लिए सोचने का विषय है कि हमको देश को किस तरफ ले जाना है । इतने उदाहरण काफी है, इन विषयों पर विस्तारित आर्टिकल अलग से लिखेगे ।

राजनीति ही, भगवान और खुदा है ।

समाज के कुछ शातिर लोगों ने, राजनीति को गंदा बना दिया, राजनीति गंदी नहीं है, मगर उसको ऐसा बनाया गया ताकी अच्छे लोग राजनीति से दूर रहें, सच में राजनीति ही भगवान है, राजनीति ही अल्लाह है, राजनीति ही ईसा मसीह है, राजनीति वह चीज है, जो हर व्यक्ति के जीवन में सब लाती है जिसके लिए हम मंदिर, मस्जिदों, चर्चो, और ना जाने कितने प्रकार के धार्मिक स्थानों पर हम जो मांगने जाते हैं, वह सिर्फ यह राजनीति ही देती है, राजनीति ही दे सकती है, सच में राजनीति ही देती है, हम जरा थोड़ी देर के लिए अपनी आस्था का चश्मा उतार देते हैं, राजनीति क्या क्या देती है क्या-क्या दे सकती है इस पर चर्चा करते हैं ।

सबसे पहले हम धन की चर्चा करते हैं, धन का मतलब रुपया से है, रुपया हमारे पास कहां से आएगा, नौकरी से, खेती से व्यापार से, मजदूरी से, इन सब में सरकार जब तक बदलाव नहीं करेगी कब तक आपकी आमदनी नहीं बढ़ सकती, परमानेन्ट नौकरी, आज हर आदमी की बुनियादी जरूरत है, जिससे उसके जीवन में खुशहाली आयेगा, परमानेन्ट नौकरी कैसे मिलेगी, कैसे मिलती थी, अब क्यों नहीं मिल रही है, इसको समझते है, राजनीति से जो सरकार बनती है, यही कानून बनाती है, कि नौकरी परमानेन्ट होगी, कि ठेकेदारी, दैनिक वेतन भोगी, संविदा, मानदेय, गुरु जी, सेवक, न जाने कितने नाम बना दिए, कैसी होगी इनके नाम पर वेतन कम कर दिया, शोषण बढ़ा दिया ये काम किसने किया, राजनीति ने किया । यदि अब इसको वापिस सही करना है कि नौकरी परमानेन्ट होगी, ठेकेदारी नही होगी, ऊपर वर्णित सभी पद खत्म करो, इसके लिए किसके पास जाना चाहिए, सोचिए, क्या मंदिर, मस्जिद में जाने से ये बदल सकता है, खूब सारी पद यात्राए कर लिजिए, घुटनो के बल चल लिजिए, चल भी रहे है, क्या कोई समाधान निकला, क्या कोई बदलाव हुआ, क्या कोई बदलाव होगा, इसका जबाब होगा कि कभी नहीं होगा, न कभी हुआ है, न कभी होगा ।

अब सवाल ये है कि कैसे होगा, अब ध्यान से समझिए, जिस तरह से हर धार्मिक स्थलो पर जाते है, उसी तरह से राजसत्ता की तरफ मुड़ जाइये, इस राजनीति की तरफ चले जाइये, जैसे ही आप सरकार से कहेगे, हमें परमानेन्ट नौकरी दो, हमें स्थाई रोजगार चाहिए ऐसा कानून बनाओ, इसका जबाब मिलेगा नहीं हो सकता, जैसे ही हमने पूछा ये क्यों नहीं हो सकता, जैसे भी हमने कहा कि हमने ये सरकार बनाई है, हम इसको बदल देगे, वैसे ही देखना, कहने लगेंगे, बहुत राजनीति करने लगे हो, नेता गिरी ज्यादा आने लगी है, भगवान बन रहे हो, अपनी औकात में रहो, ये राजनीति में न पढ़ो, ये बड़े लोगों का काम है । फिर वही बातें, ज्यादा उझल कूद मत कर जो, किस्मत में लिखा है, उससे ज्यादा नही मिलने वाला, जो मिलने वाला है उसको कोई नहीं रोक सकता । हमें दिमागी रूप से भटका दिया है, हमें राजसत्ताओ के पास जाना है, हमें राजनीति की तरफ जाना है, हमको भेज रहे है, मंदिरो मस्जिदो में, यहाँ सब कुछ मिलेगा, नौकरी मिलेगी, काम बनेगा, धन मिलेगा, यही राजनीति है, यही राजनैतिक विचारधारा है, असली रास्ते से भटका दो, घुमने दो, जब भी सही रास्ते की तरफ आने की सोचे, फिर भटका दो, ऐसे ही भटकते भटकते, हमारे न जाने कितने पुरखे मर गए, आज हम मर रहे है, आगे हमारी पीढ़िया भी इसी तरफ जा रही है ।

मेरे देश वासियों, हर आदमी राजनीति को समझो, हर आदमी राजनीति करो, क्योंकि राजनिति नीति बनाती है, नीति ही सब कुछ तय करती है, तुम सुखी रहोगे कि दुखी रहोगे, यह राजनीति तय करती है, इसको गंदी इसलिए कहा जा रहा है कि हम इससे दूर रहे, क्योंकि जिस दिन हमें ये समझ आ गया कि राजनीति ही सब कुछ तय करती है, उसी दिन हम मंदिर, मस्जिदो की तरफ नही, हम राजसत्ता की तरफ चल देगे, सरकार को उखाड़ कर फेक देगे, खुद राजसत्ता पर बैठ जायेगे और खुद ही कानून बनायेगे कि ये ठेकेदारी प्रथा बंद, सबको परमानेन्ट किया जाए, न्यूनतम वेतन 30000 महीना होगा, किसानों को खाद बीज कम दामो में मिलेंगे, तब क्या होगा, राजनीति को आम जनता से दूर हटा दिया है, जबकि असल में राजनिति ही भगवान है । राजनीति ही खुदा है क्योंकि सब कुछ राजनीति ही करती है । जो हम माथा पटक कर मॉगते है, वो सिर्फ राजनीति से ही बदलता है । समझ लो, एक राजनीति हमारी है, एक राजनीति उनकी है, वो हमारी राजनीति से हमको हटायेगे, क्योंकि राजनिति की ताकत हमारे पास है, हम आम जनता है, वो चन्द पूँजीपति है, हम लेफ्ट है, वो राइट है, उनके पास धन है, हमारे पास जन है राजनैतिक ताकत जन है, धन नहीं, मगर इस धन ने, जन को गलत रास्ते पर भटका दिया है, और खुद जन की राजनीति पर कब्जा करके, जन के धन को लूट कर, खुद धनी बन कर, धन की ताकत से, जन को लूट रहे है, जन को झूठे भ्रम जाल में फंसा कर, सदियों से मंदिरो मस्जिदो पर सर पटकवा रहे है, खुद राजनीति करके दिनों दिन, अरबपति, खरबपति शंखपति बने जा रहे है, क्योंकि वो राजनीति समझ चुके हैं, इसलिए राजनीति कर रहे है, हमको समझा दिया है, कुछ भी करना मगर राजनीति नही करना, हम समझ भी गए है, इसलिए आज लगभग 100 पूँजीपति घराने, 125 करोड़ जनता पर राज कर रहे है, हम कब राजनीति करेगे,राजनीति कब करेगे, राजनीति समझे बिना, राजनीति करें बिना, ये शोषण अत्याचार कभी समाप्त नही होगें, सोचो, सोचो, सोचो, सोचो, सोचो................

जाति का जहर, जहर का असर, मुक्ति का रास्ता

जाति व्यवस्था, समाज को दिमागी रूप से गुलाम बनाने की साजिश थी, आज भी ये साजिश है, जिसको एक शोषण अत्याचारी व्यवस्था के रूप में जाना जाता है, यह समाज को बॉटने और उनका पीढ़ी दर, पीढ़ी शोषण के करना, सामाजिक, मानसिक रूप से अत्याचार करना, इसके सहने के लिए, उनको तैयार करना, यह साजिश की गई थी, जो उस समय के पूँजीपति करना चाहते थे, उसमें वो सफल रहे, यह सदियों पुरानी व्यवस्था है, इतने सारे सामाजिक परिवर्तन हुए, मगर ये व्यवस्था नहीं बदली, उल्टी और मजबूत हुई ,जो भी लोग भारत आये, उन्होंने इस व्यवस्था को स्वीकार किया, उसको बदला नही, इसी कारण आज इस्लाम मे भी जातियां है, ईसाई धर्म, सिक्ख धर्म, सभी धर्मो में जातियां बनी, जातियो के अंदर भी उप जातियां बनी, जिसमें ऊच नीच का फर्क किया गया । हमारी व्यवस्था ने इसको इतना मजबूत कर दिया कि हमारे नाम के साथ, लिखना शुरू करवा दिया । आज हम इसको सीधे तौर पर खत्म करने की बात करना, बड़ी आबादी की आस्था को ठेस पहुचाना होगा मगर सच यही है कि ये एक साजिश थी और आज भी है । ये हमारे जन्म मरण के साथ जोड़ दिया गया है, हमारे दिमाग में भर दिया गया है, इसके विरोध के बारे में बात भी न करे, इसके लिए, इसका जहर कूट कूट के भर दिया गया है । हमें मानसिक रूप से गुलाम कर दिया, हमने इस गुलामी को स्वीकार कर लिया ।

अब इसका वर्गीय चरित्र देखते हैं ।

ये जाति व्यवस्था, जब पैदा हुई जब राजा शाही पैदा हो गई थी, जिसको कहा जाता है कि ये मनुस्मृति में है, जिसको वर्ण व्यवस्था कहते है, ये हिन्दू धर्म के वेदो में मिलती है । जिसमें मनु महाराज ने अपना दिमाग लगाकर, इस वर्गीय समाज का नक्शा तैयार किया था, जिसमें उन्होंने इस जाति व्यवस्था में, धन संपत्ति का भी बटवारा कर दिया था, इसलिए इस वर्ण व्यवस्था में केवल जातिगत बटवारा नही किया गया था, इसमें आर्थिक बटवारा भी किया गया था, जिसमें कहा गया था कि वैश्य और शूद्र को सम्पति रखने का अधिकार नही है । यदि इनके सम्पति है तो उसको छीनने का अधिकार ब्राह्मण और क्षत्रिय को है, इसमें बिल्कुल प्लानिंग से दो वर्गीय बटवारा किया गया था जिसमें, ब्राह्मण, क्षत्री एक तरफ, जो पूँजीपति थे, वैश्य और शूद्र, जो मेहनत करके आपना जीवन यापन करने वाले थे, इनमें मजदूर, किसान, दुकानदार, मुख्य रूप से थे, यानि इसके अंदर भी दो वर्ग थे, एक पूँजीपति और दूसरा मजदूर किसान । ब्राह्मण और क्षत्रिय, एक राजा और एक ग्यानी, दोनों समाज के चतुर लोग, पहले दिमाग लगाकर नियम बनाओ, राजा से कहो और इसको मनवाओ, जो न माने उसे दंड दो, इसके साथ ही उनको लगा कि इसके बाद भी विरोध हो सकता है, उसको धर्म के साथ जोड़ दिया, कहा गया कि ये ब्रम्हा जी से ये वर्ण पैदा हो गए । अब जो इसे नहीं मानेगा वो अधर्मी हो जाएगा, जिसमें नियम बनाए गए कि दलितो को, वेद सुनने का भी अधिकार नही है, यदि कोई सुन ले, उसके कान में गरम लाख भर दो, कोई वेद के श्लोक बोल दें तो जीभ काट दो, कोई इसको जबरन पढ़े और माने नही, उसका दंड था कि उसकी हत्या कर दो । ये मनुस्मृति में लिखा है, ये जरूर पड़ना चाहिए । ये हमारे भाजपा और आर एस एस के लोग इसी मनुस्मृति की आज भी पूजा करते है और उसको हिंदू राष्ट्र का संविधान कहते है । इससे इनकी मानसिक स्तिथि समझ में आती है, कि ये मनुस्मृति जैसा समाज आज बनाना चाहते हैं, यही इनकी राजनैतिक चेतना है, इसी से ये आम जनता को गुलाम बनाकर रखने में सफल रहेगें, ऐसा इन लोगों का मानना है, इसलिए ये जातिवाद और धर्म के जहर को और ज्यादा जहरीला करेगे, ताकि आम जनता अपने शोषण का एहसास न कर सकें, इस फालतू बहस में अपने को लगा कर रखें, यही आज भाजपा और आर एस एस कर रही है, इसको समझना भी बहुत जरूरी है । ये पूँजीपति वर्ग के प्रतिनिधि है ।

इसको गहराई से समझे तो ये शुद्ध रूप से एक वर्गीय व्यवस्था थी, जिसमें दो वर्ग पैदा किए गए, एक लूटने वाले, एक लुटने वाले, एक पूँजीपति (धनी लोग ), दूसरे आम जनता मजदूर किसान, (गरीब लोग, निर्धन ) इनके पास संपत्ति नही थी, मेहनत करके, उससे जो धन मिलेगा, उससे परिवार चलाना है, जैसे, पिछड़ा वर्ग के लोग हैं, यादव, कुम्हार, नाई, काछी, माली, पाल, ठीमर, जैसे बहुत सारी जातियां आज भी है, दलितो को तो कोई भी अधिकार, किसी भी रूप में नहीं थे । इसका आज से तुलना की जाए तो इसमें कोई भी परिवर्तन नही है, उस समय में पूँजीपति वर्ग को उच्च जातियो में रखा गया था, सत्ता इनके हाथ में थी, धन संपत्ति इन्ही के पास थी, आज भी पूँजीपति वर्ग, में बड़ी संख्या में उच्च जाति के लोग हैं और धन इन्ही के पास है, मगर आज कुछ ही लोगों के पास ज्यादा संपत्ति है, उच्च जातियो में आज बड़ी संख्या में मजदूर किसान हो गए है, आज ये चंद पूँजीपति लोग आज सत्ता चला रहे है । पहले की जो व्यवस्था थी, उसमें और आज की व्यवस्था में कोई फर्क नहीं है, पहले पूँजीपतियो के हाथ में सत्ता थी, आज भी पूंजीपतियो के हाथ में सत्ता है, इसी को विचारधारा कहते है, इसी को राजनीति कहते है, वर्गीय राजनैतिक हित कहते है कि सदियों से ये पूँजीवादी राजसत्ता वैसे ही चली, जैसी आज है ।

आज फिर हमको इस वर्गीय राजनीति को बहुत अच्छी तरीके से समझना होगा तभी हम इसके खिलाफ लड़ सकते हैं, पुरानी व्यवस्था में मुख्य टकराव संपत्ति और गैर संपत्ति का है, एक तरफ सारी संपत्ति पर चंद लोगों का कब्जा था, आज भी वही है, चन्द लोगों के पास देश की सारी संपत्ति है । संघर्ष दिखने में थोड़ा अलग दिखता है, मगर सीधे तौर पर संपत्ति पर काबिज रहने का ही संघर्ष है ।

वर्गीय राजनीति ही सदियों से मुख्य आधार रहा है, इस आधार को कब बदला जा सकता है, जब दूसरा वर्ग, मजदूर किसान, आम जनता की विचारधारा मजबूत हो, वो विचारधारा है, समाजवाद । इसके अंदर इस बीमारी के सभी इलाज है, इसके जीवन जीने से लेकर अंतिम यात्रा तक के सभी नियम मौजूद है, राजसत्ता से अमीरी गरीबी की खाई कम कैसे की जाएगी, उसके नियम इस व्यवस्था के अंदर है, इस विचारधारा को अपनाये बिना ये शोषणकारी व्यवस्था को कभी समाप्त नही किया जा सकता है । यह विचारधारा को, विचारधारा के रूप में कार्ल मार्क्स के पहले किसी ने संगठित रूप नही थी, इस विचारधारा को, पूरी विचारधारा के रूप में, दुनियां में जब से मार्क्स ने प्रस्तुत किया, पूरा दर्शन तैयार किया पूरी दुनिया में व्यवस्था में भारी बदलाव हुए, और पूरी दुनिया में दबे कुचले लोगों ने क्रांतियॉ की और समाजवादी विचारधारा की राजनैतिक व्यवस्था चलाकर दिखाई, इसी दबाव में, मजबूरी में दुनियां के पूँजीवादी राजसत्ता ने आम जनता को कुछ अधिकार दिए । इसके पहले भी दुनियां भर में इस व्यवस्था के खिलाफ विरोध हुए, मगर उन विरोधो को कुचल दिया गया ।

इस विचारधारा के हिसाब से जाति व्यवस्था, समाज में नहीं थी, इसको बनाया गया और जबरदस्ती लागू किया गया । यह शुद्ध रूप से शोषण कारी, आर्थिक बटवारा की बड़ी साजिश थी, आज यदि इस जाति वादी व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाए, तो एक बड़ी शोषण कारी, अत्याचारी, व्यवस्था का खात्मा हो सकता है, इसका मतलब यह हुआ कि आज हमको जातिवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिए, समाज में चेतना फैलाना होगी, इसके खिलाफ हर स्तर पर संघर्ष करने होगें, और इसको खत्म करने की मुहिम छेड़नी होगी । यह काम केवल वामपंथी विचारधारा ही कर सकती है और कोई नहीं कर सकता । इसमें एक तथ्य उच्च जाति के लोगों को भी समझना होगा कि आज इस व्यवस्था ने उच्च जाति में भी बड़ी संख्या में, मजदूर किसान पैदा कर दिए है, उनकी संपत्ति पहले की तुलना में कम हो गई है, जातिगत पूँजीपति कम हुए हैं, अब केवल कुछ ही लोग पूँजीपति बचे है, जिन्होंने देश की बड़ी संपत्ति पर कब्जा कर लिया है इसलिए आज बड़ी संख्या में मजदूर कारखानो, किसान, खेत मजदूर गॉव में उच्च जाति के लोग भी मिलेगे ।

वामपंथी विचारधारा के परिवार में कोई जातिवाद नही है, न कोई छूआछूत, न कोई ऊचनीच, न किसी भी प्रकार का भेदभाव है, अंतर जातीय विवाहो को बढ़ाना होगा, जाति धर्म की सभी हदो को तोड़ कर ,एक मानवता वादी समाज की संरचना का निर्माण करना होगा, इन जातिवादी गुलामी की जंजीरो को तोड़े बिना हम आर्थिक मोर्चे पर भी सफल नही हो सकते, क्योंकि ये दीवार हमारी एकता बनने से रोकती है, पहले इसको तोड़ना बेहद जरूरी है, इस वामपंथी विचारधारा के परिवार के साथ बड़ी संख्या में आम जनता को जोड़ना होगा, इस विचारधारा से जीवन जीने की पद्धति को अपनाना होगा ताकि इस जातिवाद के जाल से लोगों को निकाला जा सकें और साथ ही आर्थिक असमानता को रोकने और राजनैतिक बदलाव के मोर्चे पर संघर्ष किया जा सके ।

एक बात से और सावधान रहने की जरूरत है कि कुछ लोग आज जातियो पर राजनीति कर रहे हैं, जाति व्यवस्था के विरोध में नहीं है, वो केवल जातिगत शोषण के बारे में संघर्ष की बात कर रहे है, मगर उससे कोई राजनैतिक आर्थिक बदलाव नहीं होगा, बिना जातिगत व्यवस्था को खत्म किए, किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं हो सकता, इसलिए जातिगत राजनिति करने वाले दलो से भी सावधान रहना होगा ।

जातिवाद से, राजनैतिक षड़यंत्र

हम समझ नहीं पाते कि जातिगत पूँजीपति राजनीति हमें गुलाम कैसे बनाती है, यह समझना आम आदमी की बस की बात नहीं है, अच्छे अच्छे हमारे समझदार साथी भी, इसको नही समझ पाते और इस जातिवाद की व्यवस्था को सही कहने लगते है । यह काफी कठिन सवाल है जिस पर हम विश्लेषण करेगे । राजनीति में जैसा सामने दिखता है वैसा होता नहीं है, पीछे से कुछ दुसरा होता है, जिसको कुछ लोग तैयार करते है, उसको प्रस्तुत करने का तरीका अलग होता है, इसलिए हमें लगता है कि ये हमारे समाज के लोग तो हमारे हित की बात कर रहा है, समाज के हित की बात कर रहा है, ऐसा समझाया जाता है, हमारी भावनाओं और आस्था को खुरेचा जाता है कि हम अपने दिमाग के मैमोरी कार्ड में ऐसे सेव कर लेते हैं कि वह सदियों तक हमारे भीतर रहता है । इसके बाद से उनको ये ध्यान रखना कि कोई इसके विरोध में तो इनको नही समझा रहा है कोई इनकी वास्तविक वर्गीय स्तिथि के बारे में तो नहीं समझा रहा है ।

अब समझते है, पहला, हमको यह समझना है कि जातिवाद, पूँजीवादी राजनीति विचारधारा का अभिन्न हिस्सा हैं, ये उनके फायदे के लिए है, इससे बड़ी आबादी को मानसिक रूप से गुलाम रखने के लिये ही बनाया गया था, इसलिए इसको पूँजीपति वर्ग आगे बढ़ायेगा ।

हमारी राजनैतिक शक्ति समाजवादी विचारधारा है, तो हमारा फायदा किसके साथ होगा, जो समाजवादी विचारधारा के लिए मजबूत करें , जिससे पूँजीवादी व्यवस्था कमजोर हो, तभी हमारा हित होगा । समाजवादी विचारधारा की व्यवस्था में जातिवाद नही है, कोई ऊच नीच नही है, कोई भेदभाव नही है । इसलिए इसमें केवल एक ही वर्ग है, आम जनता । ये व्यवस्था कब आयेगी, जब समाजवादी विचारधारा राजसत्ता में आयेगी ।

दूसरा, अभी इस व्यवस्था में, हर समाज के अंदर भी, दो वर्ग है, हर जाति के अंदर भी दो वर्ग है, जातियो में भी उप जातियो में वर्ग है, जिसमें ऊच नीच भी है, एक अमीर वर्ग, दूसरा गरीब ।

इसमें समाज के जो अमीर लोग हैं, उनके कोई आर्थिक सवाल नही होते, क्योंकि उनके पास धन होता है, और ये लोग किसी न किसी पूँजीवादी व्यवस्था की राजनैतिक पार्टी से जुड़े होते है, इनको, हर पूँजीवादी राजनैतिक दल द्वारा लक्ष्य दिया जाता कि आपकी जाति के वोट इस पार्टी को दिलवाना है, इसके लिए उनको फंड भी दिया जाता है, जिसको कहा जाता है कि समाज के कल्याण के लिए फलाने, पार्टी, नेता, भैया ने, हमारे समाज के लिए इतना फंड दिया, किस काम के लिए, एक अपने समाज के गुरु का मंदिर बनवाने के लिए, समाज के कार्यक्रम के लिए धर्मशाला बनवाने के लिए, समाज के शादी के लिए धर्मशाला, इसमें यह भी है कि ये नेता लोग, एक छोटा फंड ही देते है, बाकी सब लोगों से कलेक्सन लेकर बनवाये जाते है, इनका उद्घघाटन वही लोग करते है, हमको लगता है कि ये कितने सामाजिक आदमी है, ये तो समाज के भगवान है, इन्होंने शमशान घाट पर शेड बनवा दिया, हम भगवान जैसा मानकर आदर करने लगते है ।

जबकि इनका असल लक्ष्य, राजसत्ता होती है, हर चुनाव के समय क्या होता है, फिर यही समाज के भगवान जिन पूँजीवादी व्यवस्था के राजनैतिक पार्टी से जुड़े होते है, जिन्होंने पीछे से इनको ये सब करने को कहा होता है, उनको बुलाया जाता है और ये समाज के भगवान, ये घोषणा करते है कि इस बार पूरे समाज को इस पार्टी को अपना वोट देना है, हम बिना सोचे समझे, उस पार्टी, व्यक्ति को अपना वोट देते है और वो चुनाव जीत जाते है, और फिर वही करते है, जो पूँजीवादी पार्टियॉ उनसे करवाती है ।

हमने पहले चर्चा की है राजसत्ता दो वर्गीय है, एक पूँजीवादी, दूसरी समाजवाद, दोनों के हित, अपने वर्ग के हिसाब से सुनिश्चित है, इसलिए पूँजीवादी समाज सबसे पहले पूँजीपतियो, उध्धोग पतियो के हित को देखता है । उसके फायदे के लिए नीतियाँ बनाता है, उसको फायदा देना है तो आम जनता को, लूटना ही पड़ेगा, जब ये लूटेगे, तो उसके लिए ये सरकार को दोषी न माने, या इसके सोच के आधार पर वोट डालने की बात न करने लगे । हमारी चेतना को मार देते है, यह बहुत बड़ा विषय है अभी हम केवल एक उदाहरण से समझते है ।

हमको बहुत ही अच्छी तरह से समझना है कि हमारे जीवन से जुड़े हर विषय सरकार की आर्थिक नीतियों से बदलता है, कितना वेतन मिलेगा, नौकरी परमानेन्ट होगी, या ठेकेदारी में होगी, काम कितने घंटे करना होगा, वेतन कब मिलेगा, कितना मिलेगा, शिक्षा में क्या सुविधाएं मिलेगी, अस्पतालो में क्या सुविधाएं मिलेगी, सरकार, आम जनता की आमदनी पर कितने टेक्स लगायेगी, हमारे पास कितनी संपत्ति होगी, मंहगाई कम होगी, कि ज्यादा होगी, ये सब कुछ सरकार की नीतियों से बदलता है । जिसके लिए सरकार जिम्मेदार होती है, हमारी नसीब किस्मत नही । इसको इस सच्चाई को समझने नही देते, इसके बारे में बात नहीं कर सकते, आपने इन सवालो को पूछा, तो आपको जबाब मिलेगा कि बहुत नेतागिरी करने लगे, फालतू बात करने लगे, समाज के हित की बात नहीं कर रहे हो, पहले समाज के बारे में सोचो, ये राजनीति की बातें मत करो, हमें नेतागिरी पसंद नहीं है, हम तो समाज के भले के लिए खड़े है, आप देखेगे, कि इन सवालो के कोई जबाब नही मिलेंगे, और सवाल ही नहीं कर पाओगे, आपको जलील कर देंगे ।

अगर आपने कहा कि समाज की तरफ से सरकार से, ये सवाल उठाओ कि कारखाने में, परमानेन्ट नौकरी हमारे बच्चों को मिले, ये ठेकेदारी बंद करवाओ, किसानों की फसल के सही दाम मिले, शिक्षा स्वास्थ्य, कम दामो में मिले, इन सभी के सवालो का जबाब मिलता है कि ये काम समाज का नहीं है, ये हमारी जिम्मेदारी नही है । यही करके हमारे राजनैतिक लक्ष्य को, बदल देते है, असली विषयो से भटका देते है, हमारे वोट की ताकत को खत्म कर देते है, असल जीवन के मुद्दों पर सोचने, बदलने, सुधारने, जैसे सभी तरफ से ध्यान हटा देते है और फिर समझाते है कि आपके नसीब में जो लिखा है, वही मिलना है, किस्मत में होगा, तो उसको कोई ले नही पायेगा, जो किस्मत में नहीं होगा वो तुम्हें कभी मिलेगा नही, अपने फलाने बाबा पर यकीन करो, भगवान, खुदा पर यकीन करो, वो सब कुछ देगा, बरकत आयेगी, न जाने किस किस के पास भेज देगे । केवल एक जगह नहीं भेजेगे, वो है सरकार, वो राजसत्ता जिसके पास सब कुछ है, जिसके हाथ में सब कुछ है, जिससे बरकत आयेगी, जिससे किस्मत बदलेगी, जिससे खुशहाली आयेगी, यह सब जब होगा, जब हमारे वर्ग के विचारधारा, समाजवाद की राजसत्ता आयेगी, इस पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फैकेगें । ये दिमाग को गुलाम बनाने का केवल एक नमूना है, न जाने कितने सारे हथकंडे है जो मनुस्मृति में लिखें है । मेहनत कश वर्ग को सब जगह से दूर रखा गया था, जबरजस्ती, और दिमागी रूप से गुलाम करके, राजसत्ता से दूर रखा गया, यह सदियों से समझाने की कोशिश की गई, कि ये सारा कुछ किसी तीसरी शक्ति के हाथ में है, सरकार का कोई हाथ नही है । छूआछूत,अशिक्षा, से दूर रखना, भी दिमागी रूप से गुलामी से बाहर न निकल पाये, इसके लिए ये कहा गया , आज की सरकारे इसलिए निजीकरण करके शिक्षा मंहगी कर रही है, ताकि अच्छी शिक्षा आम आदमी की पहुंच से बाहर निकल जाए, यही हो रहा है । एक बड़ा पक्ष आर्थिक है, इसके बारे में विस्तार से, अलग से लिखेगे । ये दिमागी गुलामी की साजिश है, हमको राजसत्ता किस वर्ग की है वही देखना है और अपने वर्ग हित की विचारधारा को मजबूत करना है ।