Articles, Workers | कर्मचारी

27 लाख आँगनबाड़ी कार्यकर्ता सहायिका, 8 करोड़ बच्चों और 2 करोड़ महिलाओं के निवाले छीनने की तैयारी

Admin

Admin

ऑगनवाड़ी कार्यकर्ता सहायिका

आई सी डी एस बचाओ : आई सी डी एस को मजबूत करो
— आई सी डी एस में पोषण आहार के बदले नकद राशि देने का विरोध करो
— आंगनवाड़ी केन्द्रों में पका हुआ गर्म खाना बंद करने का विरोध करो
— आंगनवाड़ी की जगह नर्सरी स्कूल खोलने का विरोध करो
— आई सी डी एस में केन्द्र सरकार के बजट का हिस्सा 60 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत करने का विरोध करो
पूरे देश में लाखों आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं यह मांगे उठा रहे हैं। एकीकृत बाल विकास सेवाओं ( आईसीडीएस ) को बचाना और मजबूत करने की मांग आज सबसे मुख्य मांग बन चुकी है, क्योंकि मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार इसे कमजोर करने व समाप्त करने की कोशिश कर रही है। अगर इन कोशिशों को रोका न गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। 6 साल से कम उम्र के लगभग आठ करोड़ बच्चे और 2 करोड़ महिलाओं को आई सी डी एस की मूलभूत सेवाओं से वंचित रह जायेंगे- जैसे पूरक पोषाहार, स्वास्थ्य सेवाएं और स्कूल के पहले की पढ़ाई आदि। इसके अलावा 27 लाख आंगनवाड़ी वर्कर्स और हैल्पर्स की नौकरियों के ऊपर खतरा मंडरायेगा।
आई सी डी एस का कार्यक्रम एक समग्र कार्यक्रम के रूप में शुरू किया गया था जिसका मकसद बच्चों की ऊंची मृत्युदर, माताओं की ऊंची मृत्युदर, जो कि बच्चों और औरतों में कुपोषण और खून की कमी के कारण होता है इसके खिलाफ लडऩा, और निरक्षरता की ऊँची दर और स्कूल ड्राप आऊट के खिलाफ लडऩा भी इसका उद्देश्य था।

बच्चों में मृत्युदर कम करने, मातृत्व मृत्युदर कम करने और स्कूल में बच्चों के दाखिले में बढ़ोत्तरी आदि में आई सी डी एस के कार्य को बहुत सराहा गया है यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में भी इसके योगदान को प्रशंसा मिली है। इस सफलता को पाने के लिए आंगनवाड़ी वर्कर्स और हैल्पर्स जो कि खुद गरीब परिवारों से हैं, की भूमिका को भी सराहा गया है।
इसी के मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को निर्देश दिया कि इस योजना को सार्वभौमिक बनाया जाए ताकि देश के सभी बच्चों को यह सेवाएं उपलब्ध हों।
इस योजना को अनमने मन से लागू करने और बहुत ही अपर्याप्त धन आंवटन करने के कारण आज भी हमारे देश के आधे बच्चे कुपोषण के शिकार है और वे बौने हंै। आज भी भारत की 74 प्रतिशत महिलाएं और बच्चे खून की कमी से ग्रस्त हैं। महिला और बाल विकास मंत्रालय के अनुसार, 1.75 करोड़ बच्चे जो हर साल पैदा होते है, उनमें से 75 लाख अपने पहले जन्म दिन से पहले ही मर जाते हैं। यह उस देश में हो रहा है, जो अपनी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की शेखी बघारता है।
कोई भी सरकार जो अपने नागरिकों की भलाई के लिए काम करे तो, इसे देश का भविष्य यानि बच्चों और उन बच्चों को पालने पोसने वाली महिलाएं, जो बच्चों को पालती पोसती हैं, के सुख सुविधा का ध्यान रखना चाहिए। हमारे देश में 1991 से नवउदारवादी नीतियों के आगमन से इन उद्देश्यों को नकार दिया है। इसके बाद सरकार ने आहार, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि कल्याणकारी कामों में आवंटित राशि में कटौती करनी शुरू की है। बहुत से हथकंडों को अपनाकर आई सी डी एस योजना की जिम्मेदारी से हटने की कोशिशें भी की गई जैसा कि आई सी डी एस को एनजीओ के सुपुर्द करना, मदर्स ग्रुप को देना, सेल्फ हेल्प ग्रुप या पंचायतों के हवाले करना।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं व उनके संगठन के भारी विरोध, लाभार्थियों का सहयोग, आम जनता तथा कई अन्य संगठनों के सहयोग से ही अब तक सरकार के कदमों को पीछे हटाया जा सका है। केन्द्र स्तर पर और कई राज्यों में भी सरकारों को इन कदमों को वापिस करने पर मजबूर किया है। लेकिन सरकार कई तरीकों को अपनाकर अपने मंसूबों को लागू करने के प्रयास करती रहती है। जब तक नवउदारवादी नीतियों को पलटा नहीं जाता, तब तक सरकार के आई सी डी एस को खत्म करने तथा गरीब बच्चों और महिलाओं को इसकी सेवाओं से वंचित रखने के जघन्य इरादों पर पूरी तरह से रोका नहीं लगाई जा सकती।
कांग्रेस की यूपीए सरकार ने विश्व बैंक के निर्देशों पर आई सी डी एस को खत्म करने के प्रयास किए, और आज की बीजेपी सरकार जो नवउदारवादी नीतियों के लिए प्रतिबद्ध है, आईसीडीएस को खत्म करने को प्रयासों को और भी तेजी से लागू कर रही है। यह सरकार ‘व्यवसाय करने में आसानीÓ के नाम पर देशी और विदेशी कारपोरेट को लाभ पहुँचाने की नीतियां बना रही है। लेकिन यह सरकार मानव विकास सूचकांक में भारत के गिरते स्तर के मुद्दे पर लापरवाही बरत रही है।
योजनाओं को समाप्त करने की पहल सत्ता संभालते ही मोदी नीत बीजेपी सरकार ने योजना आयोग को समाप्त कर दिया, जो आई सी डी एस को लागू करने और फंड को आवंटित करने संबंधित मुद्दे तय करता था। योजना आयोग की जगह नीति आयोग ने ली, जिसने नवउदारवाद के एजेंडे के अनुरूप केन्द्र द्वारा चलाई गई योजनाओं को बंद करने का ऐलान किया। आई सी डी एस को ”कोर योजनाÓÓ की श्रेणी में रखा गया, जिसे लागू करना अनिवार्य नहीं है, जबकि इसे ”कोर टू कोरÓ योजनाओं में रखा जाना चाहिए था जिन्हें लागू करना अनिवार्य है। शुरूआती दौर में आई सी डी एस योजना केन्द्र की योजना थी। यूपीए सरकार ने धीरे-धीरे अपना हिस्सा कम करना शुरू किया आज की बीजेपी सरकार ने अनिवार्य योजनाओं के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों में (उत्तर-पूर्वी राज्यों और तीन हिमालय राज्यों) को छोड़कर बाकियों में 60 प्रतिशत 40 प्रतिशत हिस्सा बांटने का फैसला किया। अब भारत सरकार केवल अग्रणी खर्चा वहन करेगी जैसे भवनों को निर्माण, वाहनों पर खर्च आदि और राज्य सरकारें राजस्व खर्चे उठाएंगी जैसे पूरक पोषाहार, कर्मचारियों का वेतन इत्यादि। इस वर्ष, केन्द्र सरकार ने आईसीडीएस की छतरी तले केंद्र की हिस्सेदारी को बहुत मदों में 60 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया, जिससे पहले ही वित्तीय संकट झेल रही राज्य सरकारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ गया। अगर इसे आंगनवाड़ी कर्मचारियों के मासिक वेतन पर लागू किया तो, कार्यकर्ता और सहायिकाओं के मानदेय में केन्द्र सरकार का हिस्सा मात्र 750 रुपये और 375 रुपये ही होगा। इसका अर्थ है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं व सहायिकाओं को आज से 15 साल पहले केंद्र सरकार से जो मानदेय राशि मिल रही थी, वो आज उस राशि से भी कम है। चुनाव से पहले आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं की हालत में सुधार का वादा केवल जुमला ही निकला। यह योजना केंद्र सरकार द्वारा संचालित की गई थी लेकिन राज्य सरकारों पर अतिरिक्त बोझ डालने का मतलब है कि वे इन योजनाओं को जारी रखने में हतोत्साहित होगें। यह आई सी डी एस को समाप्त करने के कदम के अलावा कुछ और नहीं है।
बजट में भारी कटौती :
मोदी सरकार ने अपने पहले ही बजट में आई सी डी एस के लिए रुपये 18108 करोड़ से घटाकर 8425 करोड़ करके, आवंटन में भारी भरकम कटौती कर दी। बाकी अन्य योजनाओं का हाल भी कुछ ऐसा ही था। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं के जबरदस्त आन्दोलन के फलस्वरूप सरकार को इसे अतिरिक्त बजट द्वारा रुपये 15000 करोड़ करना पड़ा। लेकिन बाकी योजनाओं के लिए अगले बजटों में भी आवंटन को बढ़ाया नहीं गया। इस कटौती से आईसीडीएस की बुनियादी सेवाओं और पोषाहार में कमी हुई है। बहुत सारे राज्यों में आंगनवाड़ी केन्द्रों में पूरक पोषाहार 4 से 6 महीने तक नहीं दिया जाता। कई राज्यों में आंगनवाड़ी कर्मचारियों के वेतन कई महीनों तक नहीं दिए जाते।
क्या यही है बीजेपी सरकार की कुपोषण के खिलाफ लड़ाई और महिलाओं का सशक्तिकरण?
पोषाहार के बदले प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण विश्व बैंक और नीति आयोग केन्द्र की योजनाओं के लिए सीधा नगद हस्तांतरण करने की वकालत करते है। कहा जाता है कि इससे रिसाव/घोटाला रूक जाएगा। बिहार जैसे राज्यों में इसे लागू कर दिया गया हैै। बहुत से अन्य राज्यों ने इसे लागू करने के इरादों को सपष्ट किया है।
नगद हस्तांतरण के गंभीर परिणाम होंगे। केवल 156 रुपये मासिक लाभार्थी के खाते में डालकर उनसे यह उम्मीद करना कि इससे वो पोषित खाना खरीद सकेंगे, यह एक भद्दा मजाक ही है। इससे ऐसे हालात पैदा होंगे कि खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों के कारण आदिवासी और दूसरे कमजोर तबकों में भूख से मरने वालों की संख्या में बढ़ोतरी होगी। दूसरे, यह नगद हस्तांतरण भी इस शर्त से जुड़ा है कि इसको जन-धन खाते से जोड़ा जाएगा। आपको यह जानकारी होगी कि अगर जनधन खाते में 50,000 रुपये है तो इसमें एक भी रुपया नहीं डाला जा सकता। अगर कोई परिवार बच्चों की पढ़ाई व इलाज इत्यादि के लिए कुछ पैसा जोड़ लेता है तो उसे यह 156 रुपये नहीं मिलेंगें।
पके हुए गर्म खाने की जगह डिब्बा बंद खाना :
पोषण के विशेषज्ञ, विश्व स्वास्थ्य संगठन और पोषण संबंधी सुझाव वाली सरकारी कमेटी ने आंगनवाड़ी केन्द्रों में बच्चों को ताजा पका हुआ भोजन देने की सिफारिशें की हैं। इसके बावजूद सरकार घर ले जाने वाले राशन देने पर जोर दे रही है। हमारा अनुभव यह दर्शाता है कि घर ले जाने वाला राशन गर्भवती दूध पिलाने वाली माता या बच्चों को नहीं मिल पाता। हमारे समाज में गरीबी, सामाजिक परिस्थिति, लिंग आधारित भेदभाव के कारणों से, घर ले जाने वाला राशन देने से इस योजना के उद्देश्यों को पूरा नहीं किया जा सकता। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने प्राथमिक आधार पर लाभार्थियों को ताज़ा पकाए हुए भोजन के स्थान पर डिब्बा बंद भोजन देने की कवायद शुरू कर दी है। लाभार्थियों को यह डिब्बाबंद खाना डाकखाने के माध्यम से पहुँचाया जाएगा। महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने कहा है कि अंागनवाड़ी केन्द्र वह भूमिका अदा नहीं कर रहे हंै जो 20 साल पहले अदा करते थे। इस कथन में सरकार की मंशा का पता चलता है। यह कथन बहुत से अध्ययनों की रिपोर्ट के बिल्कुल विपरीत है। जैसे कि नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ पब्लिक को-आर्डिनेशन, सेंटर ऑफ चाईल्ड डिवलपमेंट, विमेन डिवलपमेंट, एन एस एस ओ के हाल के सर्वे के मुताबिक आई सी डी एस के सार्वभौमिक होने पर बच्चे के पोषण की हालात में बहुत सुधार आया है।
आम जनता के हितों को ताक पर रख कर, डिब्बे बंद पका हुआ खाना देना बीजेपी सरकार नवउदारवाद के एजेंडे को लागू करके बहुकाय खाद्य कारपोरेट को आई सी डी एस के काम को सौंपकर, देशी और विदेशी कारपोरेट को उन्हें लाभ पहुंचाने के अलावा कुछ नहीं। वाणिज्य मंत्री ने पेप्सी को कंपनी को खाना सप्लाई करने और हॉरलिक्स कंपनी को कुपोषण से लडऩे के लिए आंमत्रित किया।
स्कूल के पहले की शिक्षा :
स्कूल के पहले की शिक्षा, आई सी डी एस के तहत, बच्चों के विकास के लिए एक खास अंग था। अब इसको आगनवाड़ी के कार्यक्षेत्र से हटाने के प्रयास किए जा रहे हैं। बहुत से राज्यों में निजी शिक्षा संस्थाओं को आंगनवाड़ी केन्द्रों के पास नर्सरी स्कूल खोलने की इजाज़त दी जा रही है।
नर्सरी स्कूल अधिकांशत: पढ़ाई के गैर वैज्ञानिक तौर तरीके लागू करते हैं, जिससे बच्चों के विकास पर बुरा असर पड़ता है। आंगनवाड़ी केन्द्रों के पास आधारभूत संरचना के अभाव से यह निजी संस्थाएं अभिभावकों को अपनी तरफ खींचने में कामयाब होते है। कई राज्यों में बच्चों की कम संख्या के कारण अधिकारीगण आंगनवाड़ी केन्द्र को बंद करने की धमकी देते है।
आईसीडीएस को गैर सरकारी संगठनों को सौंपने के बारे में भारत सरकार के दिशा निर्देर्शों में शामिल हैं -‘पब्लिक प्राईवेट की सहभागिता, सेवा शुल्क बहुर्राष्ट्रीय कारपोरेट को आंगनवाड़ी केन्द्रों को गोद देना, ठेकेदारों और कारपोरेटों को पूरक पोषाहार की आपूर्ति के ठेके में शामिल करना और स्कूल पूर्व शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए निजी संस्थाओं को स्कूल से पहले की शिक्षा में शामिल करना इत्यादिÓ। बहुकाय कंपनी वेदांता की तुतीकोरिन में अपनी एक प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्री का विरोध करते हुए 13 बेगुनाह लोग मारे गए। इस कम्पनी ने आईसीडीएस में रुचि दिखाई है। इसने कहा कि यह आगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की योग्यता बढ़ाने का काम करेगी।
संघर्ष को मजबूत करो :
बहुत से राज्यों में आगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं, विशेषकर ऑल इंडिया फैडरेशन ऑफ आंगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हैल्पर्स के नेतृत्व में अपनी मांगों के लगातार संघर्षों के माध्यम से अपनी कुछ मांगों को प्राप्त करने में सफल हुए है। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि वे सरकार की आई सी डी एस को खत्म करने की कोशिशों को नाकाम करने में सफल हुए है। 45वें श्रम सम्मेलन की सिफारिशों को यूपीए और आज की बीजेपी सरकार लागू करने को तैयार नहीं। जिसमें सिफारिश की थी कि आगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं को श्रमिक मानकर उन्हें न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाए।
इस तथ्य को मानना ही होगा कि जब तक नवउदारवादी नीतियां चल रही है आई सी डी एस को खत्म करने की तलवार गर्दन पर लटकी हुई है। यह नीतियां कांगे्रस ने शुरु की, बाद में सभी सरकारों ने चाहे वो बीजेपी या कांगे्रस के नेतृत्व में बनी हो, इन्हीं नीतियों पर चल रही हैं। यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि बजट कटौती का, वामपंथी पार्टियों की राज्य सरकारों ने विरोध किया। केरल की वामपंथी जनवादी सरकार ने केन्द्र का हिस्सा कम करने का भी विरोध किया। जिस कमेटी ने केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं का नीजीकरण करने की सिफारिश की, इसमेें कांग्रेस, बीजेपी, टीडीपी के मुख्यमंत्री सदस्य शामिल थे। इस कमेटी में यह सिफारिश की है कि योजना कर्मियों के वेतनमान केन्द्र सरकार को नहीं बढ़ाने चाहिए। कुछ राज्यों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं के संघर्षों के कारण और वहां होने वाले चुनावों के मद्देनजर उनके वेतनमान बढ़े हंै। आगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि यह सरकारें, इस योजना को चलाए रखेंगी।
आई सी डी एस को बचाने का संघर्ष केवल आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं का संघर्ष नहीं है। यह लाभार्थियों का भी संघर्ष है। आंगनवाड़ी केन्द्रों से गरीब किसानों, खेतीहर मजदूर व असंगठित क्षेत्र मजदूरों के परिवारों को लाभ मिलता है। इसलिए इस संघर्ष को मेहनतकश अवाम का सर्वव्यापी संघर्ष बनाना होगा, ताकि हमारे देश के भविष्य हमारे बच्चों को बेहतर शिक्षा मिले और सही विकास हो।

Tags:

2 Comments

  1. इस संघर्ष मे सोशलिस्ट पार्टी मध्य प्रदेश साथ है

  2. आंगनवाड़ी केंद्रों। को खत्म करने वालो को ईश्वर माफ नहीँ करेगा,राष्ट्र की जनता 2019 चुनाव में जनता सबक सिखा देगी।राष्ट्र के गरीब बच्चों को कुपोषण से मुक्त करा कर ही विकशित राष्ट्र बनाना संम्भव है।
    केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर वेतनमान देना है,सरकार नर्सरी स्कुल के रूप में प्राथमिक विद्यालयों के साथ जोड़ने की योजना पर कार्य कर रही है,इसी कारण 35 प्रतिशत राधि केंद्रीय शिक्षा विभाग को शायद दिया गया है,।
    यदि सरकार ने गलत किया तो ऐसा विरोध की ज्वाला उठेगी सरकार स्वाहा हो जायेगी।

Leave a Comment