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फिक्स टर्म कर्मचारी, नौजवान का वर्तमान और भविष्य दोनों बर्बाद

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फिक्स टर्म कर्मचारी 
मोदी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ने निश्चित अवधि के रोजगार (फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट) को सभी क्षेत्रों में विस्तारित करने वाली गजट अधिसूचना जारी की है। यह औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) केंद्रीय नियमों में संशोधन कर किया गया है।
इसका मतलब है कि किसी भी क्षेत्र में, नियोक्ता एक कामगार को निश्चित अवधि के लिए नियोजित कर सकते हैं जिसके बाद नौकरी स्वत: समाप्त हो जाएगी। किसी भी प्रकार के नोटिस देने या किसी मुआवजे का भुगतान करने की कोई आवश्यकता नहीं है। किसी भी मध्यस्थ या ठेकेदार की कोई आवश्यकता नहीं है। नियोक्ता सीधे एक निश्चित अवधि के लिए एक कर्मचारी को रख सकता है जिसके बाद उसकी सेवाएं स्वत: समाप्त हो जाती हैं। बेशक, यदि नियोक्ता ऐसा चाहे, तो वह उसी कामगार को एक और निश्चित अवधि के लिए भी नियोजित कर सकता है। यह कितनी भी अवधियों के लिए जारी रह सकता है।
नियोक्ता निर्धारित तिथि से पहले ही कुछ आधारों, जैसे, काम न करने, धोखाधड़ी इत्यादि पर अनुबंध को समाप्त भी कर सकता है। यह स्पष्ट है कि एक कर्मचारी, जो कुछ ही महीनों या एक वर्ष के लिए व्यक्तिगत अनुबंध के साथ रखा गया है, नियोक्ता द्वारा लगाए काम न करने के आरोपों का प्रभावी ढंग से सामना नहीं कर सकता। इसका मतलब वास्तव में यही है कि केंद्रीय स्तर पर औद्योगिक विवाद अधिनियम में संशोधन किए बिना नियोक्ताओं के हाथों में ‘लगाओ और भगाओ(हायर एंड फायर) की व्यवस्था सौंप दी गई है।
इस प्रकार, यह अधिसूचना श्रमिकों को नियोजित करने में नियोक्ता को ‘लचीलापन देती है। दूसरा, कामगार हमेशा अपने अनुबंधों के नवीनीकरण के लिए नियोक्ता की दया पर होंगे; इसलिए वे संगठित होने और अपने अधिकारों के लिए लडऩे से डरेंगे। इसी के साथ, यह नियोक्ताओं को खुले तौर पर श्रमिकों के लिए लागू श्रम कानूनों के कार्यान्वयन से बचने में सक्षम बनाएगा।
इस प्रकार, निश्चित अवधि के रोजगार पर यह अधिसूचना रोजग़ार संबंधों में वह ‘लचीलापन  प्रदान करती है जिसकी नियोक्ता हमेशा से मांग कर रहे थे। यह उस ‘लचीलापन का हिस्सा है जिसके लिए नवउदारवादी शासन के तहत श्रम कानूनों में ‘सुधार किया जा रहा है। यह श्रमिकों की कीमत पर देशी और विदेशी बड़े कार्पोरेटों को लाभ पहुंचाने के लिए देश को ‘व्यवसाय करने की आसानी की सीढ़ी पर चढ़ाने की कोशिशों का हिस्सा है।
दरअसल, बीजेपी का हमेशा से यही दावा रहा है कि नवउदारवादी नीतियों की शुरुआत करने वाली कांग्रेस की तुलना में, वह नवउदारवाद के प्रति अधिक प्रतिबद्ध है। स्थायी रोजगार को कम करने और इसे लचीले रोजगार से बदलने के लिए बीजेपी का उत्साह वाजपेयी शासन के दौरान ही दिख गया था। सम्पूर्ण श्रमिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले ट्रेड यूनियनों के विचारों को दरकिनार करने की प्रवृत्ति उस समय भी दिखाई दे रही थी। 2003 में, तत्कालीन बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के विरोध के बावजूद निश्चित अवधि के रोजगार को शुरू करने वाली गजट अधिसूचना जारी की। ट्रेड यूनियन आंदोलन के व्यापक विरोध के चलते, इसे एक अन्य गजट अधिसूचना के माध्यम से यूपीए-1 सरकार, जो अपने अस्तित्व के लिए वामपंथी दलों के समर्थन पर निर्भर थी, द्वारा वापस ले लिया गया था।
लेकिन, 2014 में सत्ता प्राप्त करने के बाद, बीजेपी सरकार ने ‘श्रम कानून सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के प्रयासों को तुरंत फिर से शुरु कर दिया। इसने नियोक्ताओं की मांगों के अनुरूप श्रम कानूनों में संशोधन की प्रक्रिया तेज कर दी। 2015 में, इसने एक मसौदा अधिसूचना पेश किया; 2016 में, इसने वस्त्र क्षेत्र में निश्चित अवधि के रोजगार को अधिसूचित किया; 2017 में, इसे ‘निर्मितÓ क्षेत्र, यानी वस्त्र के अलावा बिस्तर की चादरें, तौलिए आदि तक बढ़ाया गया था; 2018 में, निश्चित अवधि के रोजगार को सभी क्षेत्रों में विस्तारित कर दिया गया है। सीआईटीयू और अन्य केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने हर स्तर पर इसका कड़ा विरोध किया। लेकिन बीजेपी सरकार बेअसर है। बड़े कारपोरेटों के प्रति इसकी इस हद तक प्रतिबद्धता है।
प्रारंभ में, सरकार ने अपने कॉर्पोरेट आकाओं की सेवा करने के अपने वास्तविक इरादे को ढांकने की कोशिश करते हुए यह झूठा और हास्यास्पद तर्क आगे बढ़ाया कि वस्त्र क्षेत्र ‘मौसमीÓ होता है। लेकिन, निश्चित अवधि के रोजगार को सभी क्षेत्रों में विस्तारित कर, भाजपा सरकार श्रमिकों के सामने बेशर्मी के साथ नग्न खडी है। मुनाफे के लालची कॉर्पोरेटों की सेवा करने के लिए इसका असली इरादा स्पष्ट रूप से खुल गया है।
सरकार का तर्क है कि निश्चित अवधि के रोजगार पर लगे श्रमिकों को कार्यकाल, मजदूरी, भत्ते और अन्य लाभों के मामले में भेदभाव नहीं किया जा रहा है। वह कहती है कि यह श्रमिक सेवा की अवधि के अनुसार स्थायी श्रमिकों के लिए उपलब्ध सभी वैधानिक लाभों के लिए पात्र हैं। लेकिन, हम जानते हैं कि यह पूरी तरह से भ्रामक हैं। हमारा अनुभव क्या है? हमारे लिए वास्तविकता क्या है?
वास्तविकता यह है कि संगठित क्षेत्र तक में भी, श्रमिकों के विशाल बहुमत के लिए न्यूनतम मजदूरी, पीएफ, ईएसआई, प्रसूति लाभ आदि सहित सांविधिक लाभ लागू नहीं किए गए हैं। ऐसा विशेष रूप से वहाँ होता है, जहां श्रमिक ट्रेड यूनियनों में संगठित नहीं है। फिर, हमारे देश में तो कुल श्रमिकों में से 10 प्रतिशत से भी कम ही ट्रेड यूनियन में संगठित होते हैं। यहां तक कि बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों समेत अधिकांश निजी प्रतिष्ठानों में भी स्थायी श्रमिकों को यूनियन बनाने की कोशिश करते समय धमकी दी जाती है और पीडि़त किया जाता हैं।
ऐसी स्थिति में, क्या हम उम्मीद कर सकते हैं, कि कुछ महीनों या यहां तक कि 1 या 2 साल के लिए व्यक्तिगत निश्चित अवधि के रोजगार वाले श्रमिक, यूनियन बनाने और इन लाभों को लागू करवाने के लिए लडऩे को एकजुट हो भी सकते हैं?
कुछ कंपनियों में पहले भी इस तरह के निश्चित अवधि के अनुबंध के उदाहरण रहे हैं। यह पाया गया है कि इन श्रमिकों को उसी कंपनी के स्थायी श्रमिकों के समान भविष्य निधि और अन्य लाभ नहीं दिए जाते हैं। एयर इंडिया की सहायक कंपनी एलायंस एयर इसका एक शानदार उदाहरण है। इस कंपनी के सभी कर्मचारियों को निश्चित अवधि के लिये नियोजित किया जाता है और उनके अनुबंध समय-समय पर नवीनीकृत होते हैं। उन्हें बहुत कम वेतन का भुगतान किया जाता है और एयर इंडिया के नियमित कर्मचारियों की तुलना में काफी कम लाभ दिए जाते हैं। यद्यपि इस मुद्दे को बार-बार सीआईटीयू के महासचिव ने उठाया, पर एयर इंडिया ने जवाब भी नहीं दिया। युवाओं को आकर्षित करने के लिए, बीजेपी सरकार इस तरीके का लुभावना दावा कर रही है कि निश्चित अवधि के रोजगार से रोजग़ार पैदा होगा। यह लोगों को गुमराह करने के लिए भी बेताबी भरा प्रयास कर रही है, जैसे कि महिलाओं के लिए रोजगार पैदा कर, यह समाज को बदल देगा! क्या और इससे अधिक ऊट-पटांग कुछ हो सकता है? वैश्विक अनुभव क्या है? दुनिया भर में कई सरकारों ने,  जो नवउदारवाद के प्रति प्रतिबद्ध हैं, श्रम को ‘लचीला बनाने के लिए उनके ‘श्रम कानून सुधार के हिस्से के रूप में निश्चित अवधि के रोजगार की शुरुआत की है। ये युवा श्रमिकों के भविष्य के लिए विनाशकारी साबित हुए हैं। इसने उनसे भविष्य में एक सम्मानजनक और स्थिर रोजगार के तमाम अवसरों को छीन लिया है। 
एक अध्ययन के अनुसार, यूरोप में कई देशों में, निश्चित अवधि के अनुबंध में वृद्धि हुई है, खासतौर पर स्पेन में, जहां युवा श्रमिकों के लिए निश्चित अवधि अनुबंध का हिस्सा 50 प्रतिशत से अधिक है। सभी नए हस्ताक्षरित अनुबंधों में से 94 प्रतिशत निश्चित अवधि के है। अध्ययन से पता चला है कि युवा श्रमिकों के लिए दीर्घकालिक समय तक निश्चित अवधि अनुबंधों के चलते रोजग़ार के दिनों और मजदूरी में कमी आई है। निश्चित अवधि अनुबंधों की उपलब्धता नियोक्ता को कम उत्पादकता और कम वेतन वाली नौकरियां निर्मित करने के लिए प्रोत्साहित करती है। अध्ययन के निष्कर्ष में कहा गया है कि ‘लंबे नजरिये में देखने पर, निश्चित अवधि के अनुबंध एक सीढी नहीं हैं बल्कि अल्प कुशल युवाओं के करियर के लिए एक राह का रोड़ा हैं।निश्चित अवधि के रोजगार पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का एक दस्तावेज बताता है कि निश्चित अवधि अनुबंध वाले श्रमिकों की बेरोजगार बनने की दर ऊँची है। वे अपनी नौकरियां खोने वाले पहले व्यक्ति होते हैं। आर्थिक मंदी के दौरान लागत कम करने के लिए नियोक्ता पहले निश्चित अवधि के कर्मचारियों को निशाने पर लेते हैं। हाल के वैश्विक संकट के दौरान, कई देशों में श्रम लागत को लचीला रखने के लिए, स्थायी नियुक्तियों की जगह बहुत कम अवधि के अनुबंध पर श्रमिकों की नियुक्ति में वृद्धि हुई थी। 
वास्तविकता यह है कि निश्चित अवधि के रोजगार अभी तक श्रमिकों की नौकरी की सुरक्षा पर एक और हमला है। यह उन्हें नियोक्ताओं के हाथों और अधिक असुरक्षित करने के लिए एक तरीका है। यह श्रमिकों को सभी वैधानिक लाभों से वंचित करने की व्यवस्था है। यह नियोक्ता को लचीलेपन से उपकृत करने का एक उपाय है। एक टिप्पणी, जो किसी अन्य ने नहीं, बल्कि सीआईआई (भारतीय औद्योगिक परिसंघ) की राष्ट्रीय औद्योगिक संबंध कमेटी के चेयरमैन प्रदीप भार्गव ने निश्चित अवधि की रोजगार अधिसूचना का स्वागत करते हुए कहा, यह स्पष्ट करती है। उन्होंने कहा है : ‘यह व्यवसायिक भावनाओं को बढ़ावा देने जा रहा है… आज कंपनियां मौसमी कारणों से  हायर एण्ड फायर करती हैं। यह तो सिर्फ जो पहले से चल रहा है उसे औपचारिकता देना, वैधता देना है। जी हां, श्रम कानून सुधारों का यही अर्थ है : नियोक्ताओं द्वारा मौजूदा कानूनों के उल्लंघन को वैध बनाना, उनके लिए ‘व्यवसाय करने की आसानी को बढ़ावा देना। 5 सितंबर 2018 की ‘मजदूर किसान संघर्ष रैली नियोक्ता, बड़े कॉर्पोरेटों, घरेलू और विदेशी के अवैध कामों को वैधता देने के खिलाफ लडऩे का मौका है। यह ऐसे मजदूर विरोधी ‘श्रम कानून सुधार के खिलाफ संघर्ष है। यह संघर्ष उन नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ है, जिनका ‘श्रम कानून सुधार एक अभिन्न अंग हैं।
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2 Comments

  1. I , sri Ashit Chakraborty highly condem and oppose this Fixed Term Employment policy of this BJP Government. This policy will develope more frastration among the young generation and also will badly effect in our country’s economics and developement.

  2. हस हम गाय और गोबर करते रहेंगे तो यह सब स्वभाविक है।

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