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1 मई मजदूर दिवस अमर रहे (कविता)

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1 मई मजदूर दिवस अमर रहे ।

जब मेहनतकश मेहनत करता है तब रूपया पैदा होता है ।

रूपया पैदा करता है, मगर वह हमेशा निर्धन, बिन रूपया, रहता है ।

ये कैसा खेल है जो समझ नहीं आता है ।
जो पैदा करता है रुपया, उस रूपया का मालिक कोई दूसरा होता है ।

रहता है झोपड़ी में, गंदगी की भरमार होती है।
नहीं मिलती है सुविधाएं क्योंकि वो जगह हमेशा उनकी नहीं होती है ।

देखो, राजनीति का खेल, हम मेहनतकश है ।
हम बहुमत में है, पर हमारी आवाज़ नहीं होती है ।

जब भी कराये जाते हैं, जाति धर्म के नाम पर दंगे, तब मेहनतकश की ही लाश गिरती है ।

जब होते हैं महिलाओं, बच्चियो से बलात्कार, तब मेहनतकश की ही महिला बच्ची होती है ।

जब दंगो में जलते है घर, तब भी मेहनतकश की ही झुग्गी, घर से आग की लपटे निकलती है ।

देखो, राजनीति का खेल, मारने वाले और मरने वाले, मेहनतकश ही होते हैं ।

पूछो, अपने उन बच्चों से, जो तलवार उठाते है, क्यों मार रहे हो अपनो को, क्यों अपने घरों को जलाते हो ।

सोचा, कभी कौन है, इस राजनीति के पीछे, जो मेहनतकश को मेहनतकश से कटवाते है ।

जिस दिन मेहनतकश, इस गंदी राजनीति को समझेगा, उस दिन से न हिंसा होगी, न किसी मेहनतकश का घर जलेगा ।

समझो, मेरे मेहनतकश भाइयों, मजदूर दिवस का नारा हैं, दुनियां के मेहनत करने वालों एक हो, ये जग केवल हमारा है ।

जाति धर्म के जहर से बाहर निकलो, ये संकल्प जरूरी है, क्योंकि इस शोषण कारी व्यवस्था को खत्म करने के लिए, हमारी एकता की शर्त जरूरी है ।

जिस दिन हम सब एक होंगे, उस दिन ये जहॉ हमारा होगा, हम ही इसके मालिक होगे, ये सब कुछ हमारा होगा ।

इंकलाब जिंदाबाद, मजदूर दिवस अमर रहे ।

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