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श्रम कानूनों में परिवर्तन, नौजवानों का वर्तमान और भविष्य दोनों बर्बाद

Admin

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श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी संशोधन बन्द करो!
बिना किसी अपवाद या छूट के सभी बुनियादी श्रम कानूनों को सख्ती से लागू करना सुनिश्चित करो!
नियोक्ता श्रम कानूनों को टालते क्यों हैं? एकदम सरल है! अपने मुनाफे में वृद्धि करने के लिए!

लेकिन सरकार श्रम कानूनों से बचने की छूट क्यों देती है? आमतौर पर देश के कानूनों का उल्लंघन करने वाले किसी भी आम नागरिक पर कानून लागू करने वाली मशीनरी द्वारा कार्यवाही की जाती है। लेकिन श्रम कानून उल्लंघन के मामले में ऐसा नहीं! आश्चर्यजनक रूप से यह मजदूर ही हैं, जिन्हें श्रम कानूनों के कार्यान्वयन की माँग करने पर झूठे मामलों में दंडित, पीडि़त और फंसाया जा रहा है, जबकि किसी भी श्रम कानून के उल्लंघन के मामले में नियोक्ता को दंडित किया गया हो, देश में कहीं भी खोजना दुर्लभ है।
इससे भी बदतर है कि सरकार मजदूरों के हितों के खिलाफ श्रम कानूनों में संशोधन कर रही है और उन्हें नियोक्ताओं के लिए अनुकूल बना रही है। आखिर क्यूँ ?
यह एक गंभीर मामला है जिस पर विचार किया जाना चाहिए।
मजदूरों को आज जो भी वैधानिक लाभ हासिल हैं- आठ घंटे का कार्य दिवस, न्यूनतम वेतन, समान पारिश्रमिक, मातृत्व लाभ, बोनस, भविष्य निधि और ईएसआई सहित सामाजिक सुरक्षा लाभ, ट्रेड यूनियनों के गठन का अधिकार आदि -कड़े संघर्षोंऔर मजदूर वर्ग के भारी त्याग के माध्यम से हासिल किए गए हैं। उन्हें किसी नियोक्ता या किसी भी सरकार द्वारा उदारता या दान स्वरूप नहीं दिया गया था।
पूंजीवादी वर्ग श्रम कानूनों को कमजोर करने के लिए सरकारों पर दबाव डाल रहा है। केंद्र की सरकारें लगातार, पूँजीपतियों के दबाव में झुककर, इन कानूनों को हजारों किस्म की चालों और कमियों के माध्यम से कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं। मजदूरों को संगठित होने से रोकने के लिए ट्रेड यूनियनों के पंजीकरण को और अधिक कठिन बनाने के लिए कानूनों में बदलाव करने के लिए पिछली काँग्रेस सरकार को मजबूर किया गया था। लेकिन मजदूरों ने देशव्यापी हड़तालों सहित भारी संघर्ष किए और इन प्रयासों में से कई को पराजित किया था।
लेकिन वर्तमान भाजपा सरकार, जो अपने बहुमत पर सत्ता पर काबिज हुई है, निश्चित रूप से सत्ता के नशे में है। वह ऐसा सोचती है कि यह मजदूरों के विरोध को पूरी तरह से अनदेखा करके कुछ भी कर सकती है। इसने आगे बढ़कर वह सब कुछ करने का फैसला लिया है जो अतीत में कई सरकारें करने में सक्षम नहीं थीं। श्रम कानूनों में बड़े पैमाने पर परिवर्तन लाने के लिए वो दृढ़ संकल्पित है जो उन्हें दन्तहीन और अप्रासंगिक बना देगा। देशी-विदेशी पूँजीपतियों को शोषण बढ़ाने की सुविधा प्रदान करते हुए मजदूरों पर दास प्रथा की स्थितियों को लागू करना चाहती है।
सरकार ने 44 श्रम कानूनों को 4 श्रम संहिताओं (लेबर कोड्स) में विलय करने का फैसला किया है। न्यूनतम वेतन अधिनियम, वेतन भुगतान अधिनियम, बोनस अधिनियम और समान पारिश्रमिक अधिनियम को वेतन पर श्रम संहिता में विलय कर दिया गया है। औद्योगिक विवाद अधिनियम, ट्रेड यूनियन अधिनियम और औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम को औद्योगिक संबंधों की संहिता में विलय कर दिया गया है। श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा से संबंधित भविष्य निधि अधिनियम, ईएसआई अधिनियम, मातृत्व लाभ अधिनियम, कर्मचारी कम्पेन्सेशन अधिनियम, असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, भवन और अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण उपकर अधिनियम, बीड़ी श्रमिक कल्याण उपकर अधिनियम समेत 15 श्रम कानूनों को सोशल सिक्योरिटी पर कोड में विलय कर दिया गया है।
लोकसभा में वेतन विधेयक पर कोड पेश किया गया है और औद्योगिक संबंधी विधेयक संहिता संसद में पेश करने के लिए तैयार है। सामाजिक सुरक्षा पर मसौदा संहिता को सार्वजनिक किया गया है।
मजदूरों पर उनके क्या प्रभाव होंगे? एक शब्द में बोलें तो, वे विनाशकारी ही होगें। वे मजदूरों के कड़े संघर्षों से जीते अधिकारों को छीन लेना चाहते हैं।
सीटू ने प्रस्तावित संशोधनों पर आलोचनात्मक एक पुस्तिका प्रकाशित की है। संक्षेप में, वे हैं :
— वेतन पर कोड न्यूनतम वेतन तय करने के फॉर्मूला पर पूरी तरह से चुप है जो कि 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन द्वारा रेप्टाकोस एण्ड ब्रेट मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के साथ सर्वसम्मति से सिफारिश की है, जिसे 44वें और 46वें भारतीय श्रम सम्मेलनों में बार-बार दोहराया गया था; यह मजदूरों को नकद में या अन्य तरीकों से वेतन भुगतान के तरीके पर मजदूरों को विकल्प नहीं देता है। निरीक्षण प्रणाली सहित प्रवर्तन प्रावधान नियोक्ताओं के पक्ष में पूरी तरह से ढीला किया गया है; विधेयक में कर्मचारियों और मजदूरों की परिभाषा को इस तरह से तैयार किया गया है कि मजदूरों और उनके अधिकारों को निचोडऩे के लिए, नियोक्ता गलत तरीके से व्याख्या कर सके।
— औद्योगिक संबंधों पर संहिता मजदूरों के हितों के लिए अत्यधिक हानिकारक है; वास्तव में यह मजदूरों पर गुलामी की स्थितियों को थोपना है। 300 मजदूरों को रोजगार देने वाले प्रतिष्ठानों में नियोक्ता उन्हें अपनी मर्जी से छंटनी कर सकते हैं, उन्हें सरकार से औपचारिक अनुमति लेने की जरूरत नहीं है; वे अपनी जरूरतों के हिसाब से ‘हायर एण्ड फायर कर सकते हैं। कोड मजदूरों द्वारा ट्रेड यूनियनों का गठन करने को असंभव बनाता है; और अपनी वास्तविक मांगों के लिए संघर्ष और हड़ताल पर जाना लगभग असंभव है। हड़ताल में शामिल होने और आयोजन के लिए भारी जुर्माने के साथ, हड़ताल के अधिकार पर एक वास्तविक प्रतिबंध लगाया गया है। विधेयक नियोक्ताओं को एकतरफा तरीके से मजदूरों की सेवा शर्तों को बदलने की ताकत देता है; मजदूरों के विरोध करने या विवाद खड़ा करने का अधिकार गंभीर रूप से कम किया गया है। एक शब्द में कहें तो, यह मजदूरों पर गुलामों जैसी स्थितियों को लागू करना चाहता है और वस्तुत: ट्रेड यूनियन अधिकारों को छीन लेना है। यहाँ तक कि मजदूरों के संघर्ष का समर्थन करने वाले लोग भी बड़े जुर्माने और कारावास के सहित दंडित होंगे। साथ ही नियोक्ता को उनके द्वारा किसी भी उल्लंघन के लिए कोई सजा नहीं या बहुत हल्का दंड है।
— सामाजिक सुरक्षा संहिता के माध्यम से ‘सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा संरक्षण का सरकार का दावा बेहद भ्रामक और धोखाधड़ी है। प्रस्तावित संहिता में मजदूरों के लिए एक भी विशिष्ट सामाजिक सुरक्षा उपाय नहीं है। यह निर्दिष्ट करता है कि ईपीएफओ, ईएसआई, बिल्डिंग और अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण उपकर आदि के सभी फंडों को एक साथ विलय करके और प्रधान मंत्री की अध्यक्षता में स्थापित एक राष्ट्रीय सलाहकार बोर्ड के नियंत्रण में लाया जाएगा। स्पष्ट रूप से यह विशाल फंड शेयर बाजार में उपलब्ध कराया जाएगा।
यह केवल अजीब ही नहीं बल्कि हास्यास्पद भी है कि बी.एम.एस. ने सोशल सिक्योरिटी पर कोड की ‘ऐतिहासिक और क्रांतिकारी रचना के रूप में प्रशंसा की है। क्या कोई ऐसा ट्रेड यूनियन वास्तव में मजदूरों के हितों के लिए प्रतिबद्ध हो सकता है, जो इस तरह के इस तरह के एक प्रतिकूल और हानिकारक प्रस्ताव की प्रशंसा करे?
अब, सरकार ऐसा क्यों कर रही है? जाहिर है, सरकार ‘व्यापार करने में आसानी के सूचकांक में सुधार करके देशी-विदेशी दोनों ही कॉरपोरेटस् की मदद करने में अधिक रूचि रखती है। कॉरपोरेट्स, नियोक्ता वर्ग का कहना है कि भारत में श्रम कानून ‘प्रतिबंधक हैं, और मांग करते हैं कि उन्हें मजदूरों को अपनी इच्छाओं के अनुसार, ‘हायर एण्ड फायर तथा अपनी जरूरत के अनुसार कारखानों को बंद करने या खुला रखने का अधिकार दिया जाना चाहिए। वे यूनियन मुक्त कार्यस्थलों की मांग करते हैं ताकि वे स्वतंत्र रूप से संगठित प्रतिरोध के बिना मजदूरों का शोषण कर सकें, अपने मुनाफे में वृद्धि कर सकें और अपनी सम्पत्तियाँ एकत्र कर सकें।
वास्तविकता यह है कि हमारे देश में 90 प्रतिशत से अधिक मजदूर श्रम कानूनों के दायरे में नहीं आते हैं। यहाँ तक कि संगठित क्षेत्र में, 50 प्रतिशत से अधिक मजदूर अब सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों में ठेका मजदूर हैं जबकि निजी क्षेत्र में उनका हिस्सा 70 प्रतिशत है। उन्हें श्रम कानूनों के दायरे से परे माना जाता है। श्रम कानूनों के कानूनी दायरे मेंआने वाले मजदूरों के छोटे अनुपात का भारी बहुमत कमजोर या गैर कार्यान्वयन के कारण लाभ नहीं उठा पाता है। बीजेपी सरकार ने पहले ही ‘श्रमेव जयते कार्यक्रम के तहत कम्प्यूटरीकृत अनियमित निरीक्षण के माध्यम से इनके कार्यान्वयन को नकारा और कमजोर कर दिया है। लेकिन नियोक्ता संतुष्ट नहीं हैं। वे चाहते हैं कि श्रमिकों को वशीभूत बऩाया जाए। उनका दिल मांगे मोर (अधिक)!
केंद्र में बीजेपी सरकार अपने कॉरपोरेट मालिकों को संतुष्ट करने के लिए बाध्य महसूस करती है। यह संसद में पहले से ही लागू अधिनियमन के लिए या लंबित बिलों से स्पष्ट है।
इसने अपरेंटिस एक्ट में संशोधन किया है ताकि प्रशिक्षुओं को वैधानिक न्यूनतम वेतन के भुगतान और सामाजिक सुरक्षा लाभों के बिना वर्षों तक काम पर रखा जा सके। इस संशोधित अपरेंटिस अधिनियम में, ठेका, कैजुअल और डेली रेटिड मजदूरों को शामिल करने के लिए ‘श्रमिकों की परिभाषा बदल दी गई है। अब नियोक्ता ऐसे ‘श्रमिकों के 30 प्रतिशत प्रशिक्षुओं के रूप में तैनात कर सकते हैं; उन्हें मामूली रकम का भुगतान करके अपने मुनाफे में वृद्धि कर सकें।
अपरेंटिस एक्ट के संशोधन के अनुपालन के रूप में, सरकार ने बड़े पैमाने पर तथाकथित ‘राष्ट्रीय रोजगार क्षमता वृद्धि मिशनÓ (एनईईएम) लॉन्च किया है, जो कि सबसे संदिग्ध रूप से नियमित मजदूरों को, धीरे-धीरे अपरेंटिसों/प्रशिक्षुओं से बदलने के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए तैयार किया गया है। एनईईएम विनियमन 2017 में किसी भी वैधानिक लाभ या वेतन वृद्धि के बिना समेकित राशि के रूप में भुगतान किए गए न्यूनतम वेतन के साथ ‘प्रशिक्षणÓ की 3 वर्ष की अवधि का प्रावधान है। यह प्रयोग पहले से ही ग्रेटर नोएडा, यूपी के मैसर्स एक्सीडी (एक ऑटो-स्पेयर निर्माता) जैसे कई एमएनसी में चलन में है, जो एनईईएम योजना के तहत 400 प्रशिक्षुओं से अपने लगभग 450 (नियमित एवं ठेका) सारे कर्मचारियों को चरणबद्ध तरीके से प्रतिस्थापित करके काम ले रहा है। मैसर्स चेम्प्लास्ट तमिलनाडु और पुडुचेरी में अपने कारखानों में वीआरएस के माध्यम से अपने नियमित मजदूरों को हटाकर और एनईईएम प्रशिक्षुओं द्वारा यही प्रयोग कर रहा है। संबंधित राज्य सरकारों (बीजेपी और उसके सहयोगी) के श्रम विभाग बेलाग रूप से ऐसे गैरकानूनी प्रयोग को संरक्षण दे रहे हैं।
इस बीजेपी सरकार ने श्रम कानून (संशोधन) अधिनियम भी पारित किया है। 19-40 मजदूरों को रोजगार देने वाले किसी भी प्रतिष्ठान को छोटे प्रतिष्ठान के रूप में माना जाएगा। श्रम कानूनों को सरल बनाने के नाम पर, इन्हें रिटर्न दाखिल करने और कारखाना अधिनियम, वेतन अधिनियम, न्यूनतम वेतन अधिनियम, साप्ताहिक अवकाश अधिनियम, संविदा श्रमिक (नियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम, भवन एवं अन्य निर्माण मजदूर अधिनियम, समान पारिश्रमिक अधिनियम, बोनस अधिनियम का भुगतान, बागान श्रम अधिनियम इत्यादि सहित 16 प्रमुख श्रम कानूनों से संबंधित रजिस्टरों को बनाए रखने से छूट दी गई है। वर्तमान तकनीक के साथ बड़े पूँजीगत निवेश और भारी मुनाफा वाले ज्यादातर प्रतिष्ठानों में 40 से कम मजदूरों को रोजगार देते हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि इस देश में 72 प्रतिशत से अधिक कारखानों को इन सभी 16 श्रम कानूनों से बचने का यह और अधिक आसान लगेगा।
कारखाना(संशोधन विधेयक), जो आंशिक रूप से बीजेपी शासन के तहत संसद द्वारा पारित के अनुसार, 40 से कम श्रमिकों (बिजली के बिना परिचालन) और 20 से कम श्रमिकों (बिजली के साथ) को रोजगार देने वाली कारखानों को कारखाना अधिनियम के कवरेज से बाहर करता है। इसका मतलब है कि देश में 70 प्रतिशत कारखानों के कर्मचारियों को कारखाना अधिनियम के अधिकार क्षेत्र से बाहर फेंक दिया जाएगा। इसका मतलब है कि इन मजदूरों के लिए कामकाजी घंटों, ओवरटाइम मजदूरी, ओवरटाइम घंटे, कार्यस्थल पर सुरक्षा आदि पर कोई विनियमन नहीं होगा; वे नियोक्ता की दया पर निर्भर होंगे ।
सरकार का नवीनतम कदम स्थायी और बारहमासी नौकरियों में ठेका मजदूरों की तैनाती को वैध बनाने के लिए संविदा श्रमिक (विनियमन और उन्मूलन) अधिनियम 1970 में संशोधन के लिए कदम उठाना है जो विभिन्न प्रतिष्ठानों में अवैध रूप से चल रहा है। प्रिंसिपल नियोक्ता द्वारा आउटसोर्स किए गए काम के लिए ठेकेदार द्वारा तैनात मजदूरों को ठेका मजदूर नहीं माना जाएगा। वे अब अधिनियम के दायरे से बाहर होंगे। 50 से कम श्रमिकों को रोजगार देने वाले ठेकेदारों को लाइसेंस प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होगी और इस तरह सभी नियामक निरीक्षणों से मुक्त किया जाएगा। हकीकत में, यदि इन संशोधनों को पारित किया जाता है, ठेका कार्य पूरी तरह से नियमित रोजगार को हटा देगा। इसके बाद, चरणबद्ध तरीके से कार्यस्थलों से नियमित रोजगार की अवधारणा को समाप्त करने के लिए एक और कदम उठाते हुए सरकार ने कार्यकारी आदेश के माध्यम से औद्योगिक रोजगार स्थायी आदेश अधिनियम के तहत केंद्रीय नियमों में संशोधन किया। इसने सभी प्रतिष्ठानों में ”निश्चित अवधि के रोजगार (फिक्स टर्म एम्पालॉयमेन्ट) की अनुमति दी है। निश्चित अवधि के लिए नियोजित मजदूरों को, अवधि समाप्त होने पर बिना किसी नोटिस या मुआवजे के हटाया जा सकता है। कई पीएसयू में भी, इस प्रावधान के माध्यम से मजदूरों को नियोजित किया जा रहा है। अब यह रवैया हर जगह व्यापक रूप से नियमित मजदूरों की परिस्थितियों को भी बेहद कमजोर बनाने के लिए इस्तेमाल होने जा रहा है।
श्रम कानूनों में बड़े पैमाने पर बदलावों की पृष्ठभूमि में, अपरेंटिस अधिनियम, संविदा श्रमिक अधिनियम और निश्चित अवधि के रोजगार में संशोधन को सरकार के इन कदमों को, मजदूरों के बहुमत को सभी श्रम कानूनों के दायरे से बाहर रखने के रूप में समझा जाना चाहिए। सभी कार्यस्थलों पर रोजगार संबंधों को अस्थायी और असुरक्षित स्थितियों में बदलने का बीजेपी सरकार का एक व्यापक मकसद है। इस प्रक्रिया के माध्यम से वह मजदूरों के ट्रेड यूनियन अधिकारों को छीनने की कोशिश में है। यह उन कॉरपोरेट्स के लिए ”व्यवसाय करने में आसानी सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक युक्ति है, जिनके साथ वर्तमान सरकार पूरी तरह से गठबंधन में है। मजदूरों को अपने वास्तविक दुश्मनों की पहचान करनी चाहिए जो स्पष्ट शर्तों के साथ पूरी तरह से राष्ट्र के लिए दुश्मन हैं।
भारत सरकार ने सभी राज्य सरकारों को बीजेपी के नेतृत्व वाली राजस्थान राज्य सरकार के पैटर्न पर अपने राज्यों में श्रम कानूनों में संशोधन करने का निर्देश दिया है। मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, हरियाणा आदि सहित कई अन्य राज्य सरकारों ने राजस्थान सरकार के कदमों का पालन किया है और खुशी से भारत सरकार की सिफारिशों को लागू किया है। हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश इत्यादि सहित कई अन्य राज्य सरकारों ने ऐसा करने के अपने इरादे की घोषणा की है।
यह स्पष्ट है कि बीजेपी के लिए यह उधारी की वापसी का समय है -देशी-विदेशी दोनों तरह के कॉरपोरेशनों उधारी चुकता करने के लिए विवश कर रहे है, जिन्होंने सत्तारूढ़ दल को चुनाव के दौरान बड़ी तादाद में धन देकर मदद की है और मीडिया के माध्यम से इसको समर्थन जारी रखा है।
श्रम कानूनों में संशोधन के बारे में सभी तर्क कि निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजन आदि कोरा पाखण्ड है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने उन अध्ययनों के बारे में रिपोर्ट दी है, जिसमें स्पष्ट रूप से स्थापित किया है कि ऐसा नहीं है।
5 सितंबर को संसद के समक्ष ‘मजदूर किसान संघर्ष रैली मजदूरों के मूल अधिकारों पर ऐसे हिंसक हमलों तथा उन पर दासता थोपने की घृणित युक्ति के खिलाफ है। यह हमारे अधिकारों पर इस तरह के हमले के खिलाफ हमारे क्रोध को प्रतिबिंबित करना चाहिए। बीजेपी सरकार को चेतावनी देना है कि ऐसी मजदूर-विरोधी नीतियों को और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा; यह दासता थोंपने की कोशिश नहीं चलेेगी!
आओ हम एकजुट हों, एकजुट होकर लड़ें।

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