राजनीति भाग – 03, पूँजीवादी राजसत्ता और उसके अभिन्न अंग, फ्री इकोनमी क्या है ।

 

पूँजीवादी राजसत्ता सत्ता कैसे बनती है हमें इस तथ्य को समझना है, पूँजीवादी व्यवस्था में कुछ पिलर होते हैं, जिनको क्रमवार लिख रहे है ।
पूंजीपति जिसके पास पूंजी है ।
शासक, जो पूँजीवादी राजसत्ता चलाते हैं ।
धर्म, जो पूँजीवादी व्यवस्था में जनता को दिमागी रूप से कन्ट्रोल करते हैं ।
सेना, जिससे वो अपने सुरक्षा करते हैं और आम जनता को कन्ट्रोल करते हैं ।
धनी समूह, ये पूँजीपति है और छोटे पूंजीपति, उच्च मध्यम वर्गीय लोग हैं ।
सबसे नीचे आम जनता जो दबी कुचली, शोषित पीड़ित बेहाल है ।

ये तंत्र है, पूँजीवादी राजनैतिक व्यवस्था का, ये एक नक्सा है । जो इस व्यवस्था को दिखाता है । इसमे एक बात ध्यान से समझना है कि इन पूँजीपतियो की संख्या केवल एक प्रतिशत है ।
सब मध्यम वर्गीय जनता को भी जोड़ ले तो, पूरी दुनिया में केवल 20 प्रतिशत लोगों के पास 80 प्रतिशत सम्पति है । 80 प्रतिशत लोगों के पास केवल 20 प्रतिशत सम्पति है, यही है पूँजीवादी व्यवस्था का परिणाम, समाज में आर्थिक असमानता बहुत तेजी से बढ़ती है ।
असमानता के ऑकड़े ही पूँजीवादी व्यवस्था के असल रूप को प्रदर्शित करते हैं । जितनी तेजी से असमानता बढ़ती है, उतनी ही अच्छे ऑकड़े पूँजीवादी व्यवस्था के माने जाते हैं ये ऑकड़े आम जनता के हित में नहीं होते, ये शोषण दमन अत्याचार की गति को भी दर्शाते है मगर पूँजीवादी व्यवस्था के लिए शुभ संकेत होते हैं ।

भ्रष्टाचार भी पूँजीवादी व्यवस्था का अभिन्न अंग है, जिससे पूँजीवादी राजसत्ता सारे गलत काम कराती है, हर जगह पैसे से खरीद कर कब्जा करते हैं, क्योंकि पैसा इनके पास बहुत होता है, आज जो हमारे देश में सब कुछ बिकाऊ है ये पूँजीवादी राजनैतिक व्यवस्था का एक हथियार है, इसी सोच का परिणाम है कि चारो तरफ भ्रष्टाचार है और ये भ्रष्टाचार पूँजीवादी राजसत्ता में कभी खत्म नहीं होगा, न इसको खत्म करने के लिए पूँजीवादी राजसत्ता कोई सकक्षम कानून ला सकती है । क्योंकि ये इनकी राजनीति का हिस्सा हैं । आज चुनावो में क्या कर रहे हैं, खुलेआम भाजपा कांग्रेस दोनों पैसा, शराब, मुर्गा पार्टी करते हैं, ये सब बॉटते है, क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है, यदि ईमानदारी देश में आ जाए तो भाजपा और कांग्रेस को कोई वोट नहीं देगा, यदि शराब और पैसा बंद करा दिजिए जाए तो ये चुनाव नहीं जीत सकते, सब कुछ पैसे की दम पर खरीदते है ।

धर्म अभिन्न अंग है, सबसे बड़ा हथियार है जो आम जनता को दिमागी रूप से गुलाम बनाने का काम करता है और आपस में बटवारा करता है, जाति व्यवस्था समाज में आर्थिक और सामाजिक बिभाजन करती है, समाज के सैकड़ों टुकड़े कर देते हैं । इनको भी समझना है ।

बेरोजगारी भी योजनाबद्ध तरीके से पैदा की जाती है ताकि पूँजीपतियो को सस्ता मेन पावर मिल सके, नरेंद्र मोदी जी ने सरकार का वह विभाग ही बंद कर दिया जो बेरोजगारी के ऑकड़े पेश करते थे, क्योंकि उनको पता है कि बेरोजगारी बहुत ज्यादा बढ़नी है । इन ऑकड़ो पर जबाब देना मुश्किल होगा इसलिए विभाग ही बंद कर दिया । ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो रहे हैं, सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े इन्वेस्टमेंट कम कर दिए हैं ताकि गॉव के बेरोजगार नौजवान शहरों की तरफ पलायन करे और फिर कारखाना मालिको को सस्ते से सस्ता मेन पावर मिले । यह भी पूँजीवादी व्यवस्था की एक सुनियोजित योजना है, जिस नरेंद्र मोदी जी अमल कर रहे है, इसका एक और भाग है कि किसी आदमी से कम पैसे में और ज्यादा काम कराना है तो उसको भूखा रखना होगा और उसकी नौकरी पर कोई सुरक्षा नहीं रखना है, रोजाना याद दिलाते रहना है कि हम तुम्हें कभी भी भगा सकते है तो उसको याद आयेगा की मेरा तो चुल्हा नहीं जलेगा, बच्चे क्या खायेगे, फीस कैसे दूंगा, किराया कहॉ से दुंगा, तो उस डर के मारे खूब काम करेगा यानि ज्यादा से ज्यादा काम करेगा और कम से कम पैसे में काम करता है यही है पूँजीवादी राजनैतिक व्यवस्था की गुलामी जो राजनैतिक राजसत्ता पैदा करती है, आज हमारे देश में नरेन्द्र मोदी जी यही कर रहे है ।

बैकिंग सिस्टम भी पूँजीवादी व्यवस्था का अभिन्न अंग है जिससे जनता के पैसे को पूँजीपतियो को देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, बैकिंग सिस्टम में जो भी पैसा होता है वो सरकार और बैकों के कन्ट्रोल में होता है, इसलिए नरेंद्र मोदी जी ने नोटबंदी की थी, नोटबंदी का असल लक्ष्य आम जनता के पैसे को बैकिंग सिस्टम में लाना था इसीलिए आम आदमी से जबरन बैको में पैसे जमा कराये । जिससे बड़ी राशि बैकिंग सिस्टम में आ गई, जिसके बाद पूंजीपतियो को बड़ी संख्या में लोन के रूप में पैसे दिये गए मगर उन्हौने लोन वापिस नहीं किया, जिससे बैको का एन पी ए बढ़ गया । 2014 में NPA 2.80 लाख करोड़ था, जो अभी तक 8.30 लाख करोड़ हो गया । ये पैसा आम जनता का है, और बाद में सरकार इसको अपने बजट से देते हैं, इसलिए बजट का पैसा भी आम जनता का है, आम जनता का पैसा पूंजीपति की जेब में चला गया ।
बड़े बड़े लोन सरकार इसी बैकिंग सिस्टम के पैसे से देते हैं । ये कुछ महत्वपूर्ण अंग है पूँजीवादी राजनैतिक व्यवस्था के, जिसको समझना है ।

फ्री इकोनमी क्या है

इसको भी समझना है यह अमेरिका की इकोनमी का कान्सेप्ट है, जिसमे सबकुछ बाजार पर छोड़ना है, सरकार का कोई हस्ताक्षेप नहीं रहना है, हर क्षेत्र में निजीकरण करना है, सारे संसाधन, सर्विस, जन सुविधाएं सब कुछ निजी पूँजीपतियो के हवाले करना है । बाजार ही हर वस्तु के दाम तय करेगा । सरकार के पास केवल सेना और वित्त मंत्रालय होगा, और कुछ नहीं, सब कुछ नीति पूँजीपति के पास होगा ।

इसके बारे में नई आर्थिक नीतियों के साथ विस्तार से चर्चा करेगे । इस व्यवस्था के सकारात्मक और नकारात्मक तथ्यों को भी समझेगे ।

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