राजनीति, भाग -01, भारतीय दर्शन और उसका वर्गीय चरित्र Indian Philosophy and Class Division

 

साथियों, राजनीति पर एक नई सीरीज शुरू कर रहे है, जिसमे कई भाग होगे, आज हम पहले भाग से शुरुआत करते हैं ।

भारतीय दर्शन और उसका वर्गीय चरित्र

यह बहुत ही कठिन विषय है मगर राजनैतिक समझ की शुरुआत यही से होती है, राजनीति को समझने के लिए हम पहले दर्शन को समझेगे । हम इसमे तीन हिस्सों में बात करेगे ।
01. इतिहास
02. धर्म से सम्बन्ध
03. दोनों दर्शन का वर्गीय चरित्र

हमको इन तीनों विषयों को अच्छी तरह से समझना होगा, हम पहले भाग पर बात करते हैं ।

01. इतिहास

दर्शन का इतिहास बहुत बड़ा है, बहुत सारे दर्शन है, बहुत सारे दार्शनिक हमारी दुनिया में पैदा हुए, हम इस विस्तार में नहीं जाते हैं, हम यही से शुरुआत करते हैं कि दर्शन दो प्रकार के है
01. भाववादी दर्शन
02. भौतिकवादी दर्शन

हम अपनी चर्चा को इसी सीधे सवाल पर ही केन्द्रित करेगे । ये भाववादी दर्शन क्या है इसको समझते है, इस दर्शन में एक सुपर पावर की परिकल्पना की गई है जो इस पूरी दुनिया को चला रहा है, सब कुछ उसी के हाथ में है, हम तो केवल पुतले है, इसी के साथ में नसीब किस्मत, पुराने जन्मो के फल और स्वर्ग नरक की कहानी, ये सब सोच भाववादी दर्शन देता है, इस दर्शन में तर्क करने की पूरी तरह से मनाही है, विश्वास करना है, आप किसी भी विषय पर तर्क नहीं कर सकते । इसलिए तर्क करने वाले को मौत की सजा मिलती रही है, आज भी इस विषय पर बात करना मुश्किल होता है, इसमे यह भी ध्यान रखना हैं कि ये दर्शन हमेशा से बलशाली और सत्ताधारी लोगों का रहा है, इसका असल मक़सद आम जनता को दिमागी रूप से कन्ट्रोल करना था, गुलाम बनाये रखना था, जिसमे ये पूँजीपति वर्ग सफल हुए, दिमागी रूप से यह समझाने में सफल हुए । ये कुछ ये कुछ मुख्य बाते है भाववादी दर्शन की ।
इस दर्शन में धर्म के साथ जोड़कर ही सब कुछ थोपा गया है, धर्म पर चर्चा अलग से करेगे । धर्म ही सुपर पावर की परिकल्पना है ।

भौतिकवादी दर्शन क्या है ?

भौतिकवादी दर्शन विज्ञान पर आधारित है, इसमे सब कुछ तर्क के सिद्धांत से तय किया जाता है, इसमे कोई सुपर पावर नहीं है, ये दुनिया प्राकृतिक नियम एवं सिद्धांत से चल रही है, यह दर्शन समानता देता है, आर्थिक असमानता को खत्म कर देता है, यह दर्शन आम जनता का दर्शन है, जिसकी राजनैतिक विचारधारा को समाजवादी व्यवस्था कहते हैं ।

एक बात और समझना है कि पूरी विकास की प्रक्रिया को समझते है तो पाते हैं कि सभी युग में एक व्यवस्था एक जैसी ही रही है । वो है सम्पति और संसाधनों पर कब्जा, कुछ लोगों के द्वारा, ये हर समय में रहा और आज भी है, यही है वर्गीय राजनैतिक हित, अपने वर्ग के लिए फायदा करना जिसके लिए ये लोग, राजनीति पर कब्जा करके रखते हैं, ये जानते हैं कि इस सोच को बनाये रखे और दिमादी रूप से गुलाम बनाये रखें बिना हम, सुरक्षित नहीं रह सकते, हमारा सम्पति और संसाधनों पर कब्जा नहीं रह सकता, इसलिए ये लोग आर एस एस जैसे संगठनों को पालते है फंड देते और प्रचारक पैदा करवाते है जिससे वो इस धर्म के नाम पर बनाई गई दिमागी गुलामी से आम जनता को बाहर नहीं निकलने देते है । आम जनता को सम्पति और संसाधनों के अधिकारों से भटका देते है, उसके दिमाग को शून्य कर देते है, वो अपनी दुर्दशा पर खुद ही कोसता है और सरकार को भी जिम्मेदार नहीं मानता, इसलिए सरकार से सवाल नहीं करता, उसका समाधान धर्म और सुपर पावर में तलाशता है, जिससे कोई समाधान नहीं निकलता है, राजनीति को समझने की भी कोशिश नहीं करता, राजनीति को गंदी गलत कहता है और इससे दूर रहने को कहता है । यही भाववादी दर्शन का असल लक्ष्य है । यही पूँजीपति और पूँजीवादी राजनैतिक व्यवस्था चाहती है कि आम जनता, मेहनतकश वर्ग इस राजनीति और राजसत्ता को न समझे और न इसमे आये । क्योंकि जैसे ही वो जागरुक होगा वो सवाल करेगा, जिसका जबाब पूँजीवादी राजनैतिक व्यवस्था के पास नहीं है ।

काल मार्क्स ने, भौतिकवादी दर्शन की थ्योरी को लिखा और पूरे तर्क सहित सामाजिक विकास का अध्ययन किया और एक समाजवादी राजनैतिक व्यवस्था का रूप दिया, जिसमे उन्हौने बताया कि किस प्रकार से मेहनतकश वर्ग की राजसत्ता कायम की जा सकती है और कैसे फिर उसी साम्यवादी समाज पर जाया जा सकता है ।
इसी विचार का परिणाम 1917 की रूस की क्रांति थी, जो दुनियां की पहली मेहनतकश वर्ग की राजसत्ता थी ।
इसी सामाजिक विकास में पूँजीवादी राजनैतिक व्यवस्था ने एक नया रूप लेकर आये, जिसको लोकतंत्र कहा गया, जिसमे श्रमिकों को भी कुछ अधिकार मिले, वेलफेयर स्टेट कहा गया, आम जनता राजा होगी, जनता खुद अपनी नीतियां बनायेगी, वोट का अधिकार मिला । ये एक नया युग थी, जो इस रूस की समाजवादी व्यवस्था का विकल्प कहा गया था, जिसमे फिर वही दो वर्ग, दो राजनैतिक पक्ष, दो विकल्प देश को चलाने के लिए थे।
इस समय में तकनीकी विकास बहुत तेज गति से चल रहा था, इसलिए बदलाव बहुत तेजी से हुए । इस व्यवस्था के आने के बाद राजा शाही व्यवस्था का लगभग पूरी दुनिया में अंत हो गया । नया लोकतंत्र आ गया । इसमे सबकुछ बदल गया, मगर बुनियादी विचारधारा नही बदली, भाववादी दर्शन और पूँजीवादी राजनैतिक व्यवस्था, उसी रूप में रही, केवल राजाओ की जगह पूँजीपतियो ने ले ली । पूंजीपतियो ने राजसत्ताओ पर अपने राजनैतिक पार्टी की सरकारे बनाई, जिससे वो खुद के फायदे, मुनाफे और सम्पत्ति संसाधनों पर कब्जा करने में सफल रहे, इतना काफी बाकी आगे समझेगे ।
यही इतिहास है, इसी प्रकार की व्यवस्था सदियों से चल रही है ।

02. धर्म से सम्बन्ध

दर्शन को धर्म से ही लागू किया गया, धर्म के बिना दर्शन नहीं होगा, दर्शन के बिना विचारधारा नही बनेगी इसलिए ये अच्छी तरह से समझना है कि धर्म राजनीति का ही अहम हिस्सा हैं, जिसके पीछे पूंजीपति वर्ग का राजनैतिक फायदा छिपा होता है, मनुष्य को दिमागी रूप से कन्ट्रोल किया जाता है, इसलिए हमको इस बात को अच्छी तरह से ध्यान रखना हैं । ये सिर्फ हिन्दू धर्म का मामला नहीं है, दुनियां के सभी धर्मो का यही चरित्र है । पूरी दुनिया में एक ही तरह की परिकल्पना है, मगर हिन्दू धर्म के अंदर बहुत ही सिस्टम से मनुष्य के जीवन पर कन्ट्रोल किया गया है, पैदा होने से मृत्यु तक सभी तरह के कर्मकांड मौजूद है । धर्म का आधार डर और लालच है जो मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है, इसी कमजोरी ने सदियों से बड़ी आबादी को दिमागी रूप से गुलाम बनाने में सफलता प्राप्त करते रहे । इस बात को हमको धार्मिक भाव से बाहर निकलकर, वैज्ञानिक तरीके से सोचना है । क्योंकि मनुष्य का दिमाग एक खाली मेमोरी कार्ड की तरह होता है जो उसमे सेव है वही बजेगा, इस कार्ड को निकालकर जिंदगी के सवालो के लिए सवाल उठाने है ।

03. दोनों विचारधाराओं के वर्गीय चरित्र

अब शायद यह स्पष्ट हो गया होगा कि भाववादी दर्शन, पूँजीवादी राजनैतिक व्यवस्था का दर्शन है, पूँजीपति वर्ग ही इसको पालता पोषता है, इसमे बिल्कुल कन्फूज होने की जरुरत नहीं है ।

भौतिकवादी दर्शन, समाजवादी व्यवस्था का दर्शन है, जो आम जनता, मजदूर कर्मचारी किसान, पूरे मेहनतकश वर्ग का दर्शन है । जो समाजवादी राजनैतिक व्यवस्था लाना चाहते हैं ।

इसलिए ये पूरी दुनिया दो वर्गीय समाज है, सब कुछ दो वर्गीय है । यहॉ तक समझने के बाद आगे हम पूँजीवादी राजनैतिक व्यवस्था के इतिहास को समझेगे ।

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