मैं एक युवा हूँ !

मैं एक युवा हूँ !
आधजगी रात,अधूरे सपनों को लिए, अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के बस्ते को टांगे चलती बस में सर्कस के बंदर की तरह लपक का चढ़ता हूं| इस बस की तुलना अगर हमारे देश से की जाए तो गलत नहीं होगा| जिस की सवारी जरूरत से ज्यादा बढ़ती जा रही है| यहां तो पैर रखने की भी जगह नहीं है| हमारे इस देश की बस मैं लगे अर्थव्यवस्था के डंडे को कई लोगों ने हाथ से पकड़ा हुआ है| उनमें से एक हाथ मेरा भी है| कुछ समय पहले एक नए बस चालक आए हैं| ना जाने कब ब्रेक लगा दे और कब खुले सांड की तरह बस को भगा दें| कुछ दिनों से तो ऐसे ब्रेक लगाते हैं कि हम सब झटके से औंधे मुंह गिरने को हो जाते हैं | यह डंडा भी बस सहारा मात्र है | टूट कर गिरने की ही देर है, स्क्रू तो पहले ही ढीले हो चुके हैं|

मैं वह हूं जो कारखानों और दफ्तरों के सामने लंबी लाइनों में खड़ा रहता हूॉ| इन सड़कों पर चल रही भीड़ में से हर चौथा इंसान मैं ही हूं| जोरो से नारे लगाता हुआ,हाथों में पोस्टर उठाए उस तस्वीर में खोलते हुए इरादे, जोश से भरी आंखें लिए मैं हूँ और खामोशी के अंधेरे में डूबा, नशे का धुआं उड़ाता हुआ, बेहोशी से भरी आंखें लिए भी मैं ही हूं| मैं रोशनी भी हूं मैं अंधेरा भी| सड़क के किनारों को अड्डा बना कर खड़ा हुआ और सड़क पर पड़े बेसहारों को सहारा देता हुआ मैं ही हूं|
नई तकनीकों का अविष्कार करके उनका गुलाम भी खुद ही बना हूं| सोशल मीडिया की काल्पनिक दुनिया मेरी जरूरत बन चुकी है और असल जिंदगी के रिश्ते एक कल्पना | मैं जागरुक हूं, तेज हूं, पर सच से वंचित भी| आजकल बोलता ज्यादा हूं , सुनता कम | देखता ज्यादा हूं , पढ़ता कम | पुस्तकालयों की किताबें मुझे पुकार रही हैं , तक्षशिला की दीवारें मुझे इतिहास दोहराने को कह रही हैं | भगत सिंह एक बार फिर ‘युवा’ की परिभाषा दोहरा रहा है| पर अफसोस ! मैं तो कानो में इयर फोन लगाकर मग्न हूं अपनी काल्पनिक दुनिया में| क्या कोई आकर मेरी पीठ थपथपाकर याद दिला सकता है मुझे कि –
मैं एक युवा हूं| एक युवा हूँ !

आधजगी रात,अधूरे सपनों को लिए, अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के बस्ते को टांगे चलती बस में सर्कस के बंदर की तरह लपक का चढ़ता हूं| इस बस की तुलना अगर हमारे देश से की जाए तो गलत नहीं होगा| जिस की सवारी जरूरत से ज्यादा बढ़ती जा रही है| यहां तो पैर रखने की भी जगह नहीं है| हमारे इस देश की बस मैं लगे अर्थव्यवस्था के डंडे को कई लोगों ने हाथ से पकड़ा हुआ है| उनमें से एक हाथ मेरा भी है| कुछ समय पहले एक नए बस चालक आए हैं| ना जाने कब ब्रेक लगा दे और कब खुले सांड की तरह बस को भगा दें| कुछ दिनों से तो ऐसे ब्रेक लगाते हैं कि हम सब झटके से औंधे मुंह गिरने को हो जाते हैं | यह डंडा भी बस सहारा मात्र है | टूट कर गिरने की ही देर है, स्क्रू तो पहले ही ढीले हो चुके हैं|

मैं वह हूं जो कारखानों और दफ्तरों के सामने लंबी लाइनों में खड़ा रहता हूॉ| इन सड़कों पर चल रही भीड़ में से हर चौथा इंसान मैं ही हूं| जोरो से नारे लगाता हुआ,हाथों में पोस्टर उठाए उस तस्वीर में खोलते हुए इरादे, जोश से भरी आंखें लिए मैं हूँ और खामोशी के अंधेरे में डूबा, नशे का धुआं उड़ाता हुआ, बेहोशी से भरी आंखें लिए भी मैं ही हूं| मैं रोशनी भी हूं मैं अंधेरा भी| सड़क के किनारों को अड्डा बना कर खड़ा हुआ और सड़क पर पड़े बेसहारों को सहारा देता हुआ मैं ही हूं|
नई तकनीकों का अविष्कार करके उनका गुलाम भी खुद ही बना हूं| सोशल मीडिया की काल्पनिक दुनिया मेरी जरूरत बन चुकी है और असल जिंदगी के रिश्ते एक कल्पना | मैं जागरुक हूं, तेज हूं, पर सच से वंचित भी| आजकल बोलता ज्यादा हूं , सुनता कम | देखता ज्यादा हूं , पढ़ता कम | पुस्तकालयों की किताबें मुझे पुकार रही हैं , तक्षशिला की दीवारें मुझे इतिहास दोहराने को कह रही हैं | भगत सिंह एक बार फिर ‘युवा’ की परिभाषा दोहरा रहा है| पर अफसोस ! मैं तो कानो में इयर फोन लगाकर मग्न हूं अपनी काल्पनिक दुनिया में| क्या कोई आकर मेरी पीठ थपथपाकर याद दिला सकता है मुझे कि –
मैं एक युवा हूं|

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