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“मजदूर दिवस” और “विश्वकर्मा जयंती” से, राजनीति के वर्गीय चरित्र को समझे । बहुत ही रोचक ऑर्टीकल

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इसका शीर्षक पड़ते ही आपको लगता होगा कि इसमे क्या राजनीति है, ये दोनों तो मजदूरों के त्यौहार है, यह दोनों त्यौहार मेहनतकश वर्ग के ही है, फिर इसमे दो वर्गीय राजनीति कहॉ से आ गई । यह बात समझ नहीं आई, यही बात तो, आज तक समझ नहीं आई, न हमने कभी वर्गीय दृष्टि से समझने की कोशिश की है, इसलिए इसका वर्गीय चरित्र हमें नहीं दिखा । चलो इसी विषय को समझते है । आपसे एक निवेदन और है कि इस विश्लेषण के समय, थोड़ी देर के लिए अपने धर्म के चश्मे को उतार दिजिए, ताकि आप असल सच को समझ सके ।

पहले हम मजदूर दिवस के इतिहास को समझते है, मजदूर दिवस का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, ये अभी 1886 की दमन की घटना के बाद पूरे दुनियां में, मेहनतकश वर्ग के अधिकारो और उन शहीदो को जिन्होंने ने इस आन्दोलन में अपनी कुर्बानी दी, उनको याद किया जाता है, मेहनतकश वर्ग इस दिन अपने अधिकारों को याद करता है और गुलामी से मुक्त होकर समाजवादी समाज बनाना चाहता है जिससे ये शोषण कारी व्यवस्था खत्म हो, इस व्यवस्था को लाने के लिए इंकलाब करता है, इंकलाब बोलने का अर्थ की होता है कि हम इस मौजूदा व्यवस्था को बदलना चाहते हैं, इसलिए भगत सिंह और उनके साथियों ने भी इंकलाब जिन्दाबाद का नारा लगाया । यही नारा कामरेड लेनिन ने लगाया था, आप देखेगे कि पूँजीवादी पार्टियों के लोग इंकलाब जिन्दाबाद का नारा नहीं लगाते, उनके मजदूर संगठन भी इंकलाब जिन्दाबाद का नारा लगाने से बचते है, क्योंकि ये लोग मौजूदा पूँजीवादी विचारधारा की राजनैतिक व्यवस्था को नहीं बदलना चाहते हैं । इसलिए इंकलाब नहीं करते, ये लोग भारत माता की जय और वन्दे मातरम् के नारे लगाते हैं, इन नारो में बदलाव की कोई आवाज़ नहीं होती, इन नारो का मतलब होता है कि ये लोग पूँजीवादी व्यवस्था को नहीं बदलना चाहते हैं, न ये समाजवादी समाज की ओर जाना चाहते हैं, पूँजीवादी राजनैतिक व्यवस्था ही चलाना चाहते हैं । इसलिए इंकलाब नही करते । मई दिवस हमेशा मेहनतकश वर्ग को उसके हक अधिकारो की याद दिलाते है और इस शोषण कारी व्यवस्था को खत्म करने की बात करते है । यह बात याद रखना हैं । यही वर्गीय चरित्र है ।

दूसरे हमारे देश में मेहनतकश वर्ग के लोगों का त्यौहार विश्वकर्मा जयंती है, जो हमारे हिंदू धर्म के आधार पर मनुस्मृति में ये कहा गया कि ये दुनिया भगवान विश्वकर्मा जी ने बनाई, बह्मा जी के कहने पर, इसी कारण विश्वकर्मा समाज के ये पूर्वज है और इन्हौने ही दुनिया बनाई । इसलिए हर वर्ष विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती है, जिससे हर कारखाने में, भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है और श्रमिक अपने टूल की पूजा करते हैं, जिनको वो इस्तेमाल करते है।
इसमे पूरी चर्चा भगवान के साथ जुड़ी है, यह केवल आस्था से जोड़ते है इसलिए कोई सवाल नहीं कर सकते, दूसरा इसमे मेहनतकश वर्ग के हक अधिकार की कोई बात नहीं करते, उल्टा जो मिल रहा है वह हमें भगवान ने दिया है, फिर वही नसीब किस्मत आ जाती है, कुल मिलाकर आप कोई भी तर्क सहित कोई बात नहीं कर सकते । इसमे न कोई इंकलाब जिंदाबाद होता है, न इस शोषण कारी व्यवस्था को खत्म करने की कोई बात होती है, न सरकार की गलत नीतियों की कोई बात होती हैं, न आम आदमी के जीवन को बेहतर करने की कोई बात होती है । इसका मतलब है कि ये इसी पूँजीवादी विचारधारा की राजनैतिक व्यवस्था को स्वीकार करते हैं और इसी को भगवान का नाम लेकर सही साबित करने की बात करते है । यह त्यौहार केवल हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार है, अन्य धर्म में ऐसी परिकल्पना नहीं है, यह केवल हमारे देश में मनाया जाता है ।

अब हम ये समझते है कि किसको कहॉ कहॉ मनाया जाता है और कौन कौन सी विचारधारा के लोग कौन सा त्यौहार मनाते है ।

मजदूर दिवस तो पूरी दुनिया में मनाया जाता है, ये हम पहले भी बता चुके हैं और ये समाजवादी विचारधारा की राजनैतिक व्यवस्था को लाना चाहते हैं, अपने हक अधिकारों के लिए याद करते हैं और सारे दुनियॉ के मजदूर संगठन इसको मनाते है, हम अपने देश की बात करे तो साउथ में छुट्टी रहती है, जिसमे केरल, तमिलनाडु, अांध प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा इन राज्यों में वामपंथी विचारधारा रही और मजदूर आन्दोलन भी मजबूत रहे, जिसके कारण सरकानो ने मई दिवस पर छुट्टी घोषित कराई और बड़े बड़े आयोजन हुए जो आज भी हो रहे है, दूसरी तरफ हिन्दी भाषी राज्यों में जहॉ पहले कांग्रेस और अब भाजपा का राज रहा वहॉ पर मई दिवस को सही तरीके से मनाया ही नहीं जाता है, पूँजीवादी पार्टियों से जुड़े मजदूर संगठन ने भी हिन्दी भाषी राज्यों में मजदूर दिवस को सही तरीके से नहीं मनाया, इन राज्यों में विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती है, जिसमे म. प्र. जैसे राज्य मे तो विश्वकर्मा जयंती पर सरकारी अवकाश घोषित किया है। मजदूर दिवस पर कोई भी सरकारी आयोजन नही करते । यही हाल लगभग सभी हिन्दी भाषी राज्यों का है ।

इसमे एक और महत्वपूर्ण बात को समझना है कि मजदूर दिवस पर कारखानो के प्रबंधन इस कार्यक्रम में सहयोग नहीं करते, गेट पर झंडा लगाने की भी स्तिथि नहीं बनती, मगर विश्वकर्मा जयंती पर बड़े बड़े आयोजन कारखाना मालिक खुद करते हैं और करवाते है, जिसमे पूँजीवादी विचारधारा की पार्टी भी शामिल होती है। इसका मतलब निकल आया है कि पूँजीवादी विचारधारा की राजनैतिक व्यवस्था और पूंजीपति, विश्वकर्मा जयंती जैसे आयोजन को प्रोत्साहित कर रही है, जिसमे मजदूर को एक सुपर पावर के भरोसे छोड़ा जाता है, न उसके हक अधिकार की कोई बात होती है । ये पूँजीवादी विचारधारा की राजनैतिक व्यवस्था का खेमा है ।

दूसरी तरफ मजदूर दिवस मनाने वाले लोग समाजवादी राजनैतिक विचारधारा की व्यवस्था का खेमा है जो मजदूर कर्मचारियों के हक अधिकार की बात करते है, तर्क के आधार पर सवाल उठाते है और इसी आधार पर समाधान की बात करते है । ये दूसरा खेमा हो गया ।

साथियों, इसमे ये भी देखना है कि पूँजीवादी पार्टियों से जुड़े मजदूर संगठन, मजदूर दिवस की जगह विश्वकर्मा जयंती बड़े जोर शोर से मनाते है । इसका निष्कर्ष यह है कि ये जो दो वर्गीय दुनियां है, और दो वर्गीय राजनीति है, दो वर्गीय विचारधारा है, यह पूरा दो वर्गीय समाज है, जिसमे दोनों वर्ग की अपनी अपनी विचारधारा है, जो अपने विचार को आगे बढ़ाना चाहते हैं, इसी के बीच में मेहनतकश वर्ग की एकता को तोड़ने के लिए न जाने कितने सारे मजदूर संगठन अलग अलग रंग के झंडे देकर, खड़े कर दिए, ये नकली मजदूर संगठन है, जिनको पूंजीपतियो ने खड़ा किया है। जो मेहनतकश वर्ग को उसके असल सवालो से भटकाते है और उनको एक अंधी समझ की तरफ ले जाते हैं और उनको दिमागी रूप से गुलाम बना देते हैं उनके दिमाग को शून्य कर देते हैं, सब कुछ एक ऐसे शक्ति के भरोसे छोड़वा देते हैं, जिससे मेहनतकश वर्ग दिमागी रूप से गुलामी से बाहर कभी नहीं निकल पाता । ऐसे मजदूर संगठन, असल में, ये मजदूरों के हित के लिए नहीं है, मजदूर वर्ग की एकता को तोड़ने और उनको गुमराह करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं । इस बात को अच्छी तरह से समझना है । ये पूंजीपतियो का एक सुनियोजित षडयंत्र है और जो मेहनतकश वर्ग इनके साथ खड़ा होता है उनको ये कुछ समझने नहीं देते सिर्फ धर्म का नशा उनके ऊपर चढ़ा कर रखते हैं ताकि वो कभी असल सवालो को न समझ पाये, इसके अलावा उनको निजि फायदे का लालच देते है, निजि फायदा करवाते है और मजदूरों के खिलाफ इस्तेमाल करते रहते हैं, इस कारण इन संगठनो के अधिकतर लोग करप्ट होते हैं बेइमान होते हैं, हमेशा मालिकों के साथ सेटिंग करते हैं । यह समझना है कि ये सब इस पूँजीवादी विचारधारा के कारण करते हैं क्योंकि इसके बिना ये मेहनतकश वर्ग को नहीं लूट सकते हैं ।

ये फर्क है, मजदूर दिवस और विश्वकर्मा जयंती में, ये राजनीति है भाइयों जिसको हमारा मेहनतकश वर्ग नहीं समझता है, हर जगह वर्गीय राजनीति है, वह उसके अपने वर्ग के हित के लिए है, इसलिए मेहनतकश वर्ग को मजदूर दिवस मनाना है, अपनी ऊपर से धार्मिक दिमागी गुलामी से बाहर निकलना है। वर्गीय समझ को अच्छी तरह से समझना है और अपने वर्ग के साथ खड़ा होना है । हमारा केवल लाल रंग है जो मजदूर का खून है ।

मजदूर दिवस अमर रहे, अमर शहीदो को लाल सलाम, इंकलाब जिन्दाबाद, समाजवाद जिन्दाबाद, दुनियां के मेहनत करने वाले एक हो, अपनी विचारधारा को मजबूत करो, पूँजीवादी शोषण कारी व्यवस्था को खत्म करो ।

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