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न्यूनतम वेतन, 18000 रुपये महीना, क्यों होना चाहिए ? इसका फार्मूला क्या है ?

Admin

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न्यूनतम वेतन कम से कम 18,000 रुपये हो!
योजना मजदूरों समेत सभी मजदूरों को न्यूनतम वेतन दो!
न्यूनतम वेतन को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जोड़ो !
कीमतों के लगातार बढ़ते जाने के कारण समूचे देश में, सभी सैक्टरों में मजदूरों के परिवारों के बजट सिकुड़ रहे हैं। अपने संघर्षों के बल पर जो थोड़ी -बहुत वृद्धि वे हासिल करते हैं, मूल्य वृद्धि उसे बराबर कर देती है। वास्तविकता में तो मूल्य वृद्धि का अर्थ है कि आज मजदूर पहले की तुलना में उतने ही पैसे में कम मात्रा में सामान खरीद पाता है।
वैधानिक न्यूनतम वेतन नहीं पाने वाले लाखों ठेका, कैजुअल और दिहाड़ी मजदूरों के लिए तो स्थिति और भी विकट हो गयी है। उनका वेतन तो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से भी जुड़ा हुआ नहीं है। कई स्थानों पर तो मजदूर इतने हताश हैं कि वे दो-दो रोजगार करने पर बाध्य हैं। वे, दो जून की रोटी जुटाने के लिए 10-12 घंटे बिना किसी वैधानिक ओवरटाइम की डबल वेज के सामान्य वेतन पर कार्य करने को मजबूर हैं। ऐसे कड़े शोषण, ने देश में बहुत से मजदूरों के लिए आठ घंटे के कार्य दिवस को हवा में उड़ा दिया है।
दूसरी ओर, देसी-विदेशी बड़े कारपोरेट घराने लगातार मुनाफे बटोर रहे हैं। वे मजदूरों की संख्या में कमी कर, उनका वर्कलोड बढ़ाकर वेतन को कम या जाम करके तथा ठेकाकरण के माध्यम से श्रम की ‘लागतÓ को कम कर अपने मुनाफों को बनाये रखना चाहते हैं। सरकार मजदूरों को राहत देने की बजाय अंबानी अडानियों, टाटाओं व बिरलाओं आदि जैसे एकाधिकारी व कारपोरेट घरानों के इशारों पर नाच रही है। वह कंफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज (सी आइ आइ), फिक्की व एसोचेम जैसी औद्योगिक संस्थानों से निर्देश प्राप्त करती हैं और मजदूरों के प्रतिनिधियों से मिलने तक के लिए तैयार नहीं होती।
वर्ष 2016 से संयुक्त टे्रड यूनियन आंदोलन रुपये 18000 प्रतिमाह के न्यूनतम वेतन की माँग कर रहा है। सभी टे्रड यूनियनें न्यूनतम वेतन को उपभोक्ता सूचकांक से जोड़े जाने की भी मांग कर रही हैं।
यह कैसे न्यायोचित है? भाजपा द्वारा केन्द्र सरकार के कर्मचारियों के लिए नियुक्त सातवें वेतन आयोग ने 18,000 रुपये न्यूनतम वेतन की सिफारिश की है। सातवें वेतन आयोग के अनुसार, यह 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन तथा रेप्टाकोस ब्रेट मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश के आधार पर सर्वसम्मति पारित फामूर्ले पर आधारित है, जिसे 2012 में 44 वें श्रम सम्मेलन तथा 2015 में 46 वें आइ एल सी द्वारा एक बार फिर से दोहराया गया है।
न्यूनतम वेतन के निर्धारण के लिए 15 वें भारतीय श्रम सम्मेलन तथा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर आधारित फार्मूला इस  प्रकार है :
1)  तीन इकाईयों ( 2 वयस्कों व 2 बच्चों वाले मजदूर के एक परिवार के लिए प्रतिव्यक्ति कम से कम 2700 कैलरीज प्रदान करने वाला भोजन।
2)  प्रतिवर्ष, प्रतिव्यक्ति कम से कम 18 गज कपड़ा।
3)  निम्न आय वर्ग के लिए सरकारी औद्योगिक आवास योजना में लिये वाले किराये के आधार पर आवास का प्रावधान।
4)  ईंधन, बिजली, विविध (अन्य प्रकार के) खर्चों के मद में कुल न्यनतम वेतन का 20 प्रतिशत ।
5)  सुप्रीम कोर्ट के फैसले (1992) में, शिक्षा, चिकित्सकीय खर्च, मनोरंजन व वृद्वावस्था तथा शादी के खर्च के मद में अतिरिक्त 25 प्रतिशत का प्रावधान भी न्यूनतम वेतन के निर्धारण में किया जाना है।
केन्द्र सरकार के कर्मचारियों व मजदूरों के महासंघ ने आई एल सी की सिफारिशों व सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप 2015 के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर सातवें वेतन आयोग के द्वारा तय न्यूनतम वेतन को चुनौती देते हुए कहा है कि इसे 26,000 रुपये प्रतिमाह होना चाहिये।
तथापि, भाजपा सरकार ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिश को मंजूर कर केन्द्र सरकार के कर्मचारियों को 18,000 रुपये न्यूनतम वेतन ही देने का निर्णय किया है।
न्यूनतम वेतन के संदर्भ में भारतीय श्रम सम्मेलन की सिफारिशें व सुप्रीम कोर्ट के निर्देश सभी मजदूरों व कर्मचारियों के लिए एक जैसे हैं। मूल्य भी सभी के लिए समान हैं। वास्तव में, सभी आवश्यक वस्तुओं व सेवाओं, विशेषरूप से भोजन, कपड़ा, परिवहन व दवाओं के दाम 2015 के बाद से काफी बढ़ गये हैं।
इसलिए, 18,000 रुपये प्रतिमाह न्यूनतम वेतन की मांग पूरी तरह से न्यायोचित है। सरकार को तुरन्त ही इस मांग को मान लेना चाहिये।
लेकिन सरकार क्या कर रही है?
मजदूरों की जायज माँग को स्वीकार करने तथा तदनुसार न्यूनतम वेतन अधिनियम को संशोधित करने के बजाय, भाजपा सरकार ने न्यूनतम वेतन अधिनियम, वेतन भुगतान अधिनियम, बोनस अधिनियम तथा समान पारिश्रमिक अधिनियम को घालमेल कर वेतन संहिता विधेयक (कोड ऑन वेज बिल) लोक सभा में पेश किया है। दरअसल, यह श्रम कानूनों के दायरे से वेतन निर्धारण को पूरी तरह से अलग कर देने की एक कोशिश है।
यह वेतन संहिता विधेयक, न्यूनतम वेतन के निर्धारण को सरकार- केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों की मर्जी पर छोड़ देता है। इसमें एक न्यूनतम वेतन सलाहकार बोर्ड के गठन का प्रावधान है। लेकिन इस बोर्ड की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं हैं।
वेतन संहिता विधेयक, न्यूनतम वेतन के निर्धारण के लिए आइ एल सी की सर्वसम्मत सिफारिशों तथा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार को पूरी तरह से नजरअंदाज करता है। इसमें, यदि हड़ताल अवैध घोषित हो जाती है तो एक दिन की हड़ताल के लिए आठ दिन का वेतन काट लिए जाने के अत्याचारी प्रावधान पर जोर दिया गया है। यदि श्रम कानूनों को संशोधित करने वाला एक अन्य अत्याचारी मसविदा- औद्योगिक संबंध संहिता विधेयक (इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड बिल) अधिनियम बन जाता है तो लगभग सभी हड़तालों के ‘गैरकानूनीÓ  घोषित किया जा सकता है।
वेतन के नियमित भुगतान सहित न्यूनतम वेतन को लागू कराने के संबंध में प्रावधानों को इतना कमजोर कर दिया गया है कि अन्य सभी प्रावधान निरर्थक हो जाते हैं। पूर्ववर्ती वेतन भुगतान अधिनियम न्यूनतम वेतन अधिनियम, समान पराश्रमिक अधिनियम, तथा बोनस भुगतान अधिनियम में जो भी शक्ति थी उसे इतना कमजोर कर दिया गया है कि कानून पर अमल का मामला ही समाप्त हो जायेगा। नियोक्ता इतने ताकतवर हो जायेंगे की अपनी मर्जी से कानून का उल्लंघन कर सकेंगे।
इस विशेष सवाल, कि न्यूनतम वेतन निर्धारण फार्मूले के बारे में भारतीय श्रम सम्मेलन की सर्वसम्मत सिफारिशों को वेतन संहिता विधेयक में क्यों शामिल नहीं किया गया पर मोदीनीत भाजपा सरकार के श्रम मंत्रालय का उत्तर तो और भी शर्मनाक है। उसमें कहा गया है कि ऐसा ‘लचीलापन, अनुकूलन प्रदान करने तथा विभिन्न घटकों की गतिशील जरूरतों को पूरा करने के लिए किया गया है। क्या यह समझने के लिए कि सरकार किसके हितों की सेवा करने की मंशा रखती है, नियोक्ताओं के हितों की या मजदूरों के, किसी और साक्ष्य की आवश्यकता है?
देसी-विदेशी बड़े कारपोरेटों की मदद करने वाली नीतियां बनाने, मजदूरों व मेहनतकश लोगों के शोषण को बढ़ाकर धन-संपदा बटोरना उस नवउदारवादी एजेंडे का प्रमुख हिस्सा है जिस पर पिछले 25 वर्षों में आयी सरकारों ने अमल किया है। मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने इस बिनाशकारी नीति को तेजी के साथ आगे बढ़ाने में महारत हासिल की है।
5 सितम्बर,2018 को संसद के सामने होने वाली ‘मजदूर-किसान रैली जो माँग करने के लिए होने जा रही है वह है :
सभी मजदूरों को न्यूनतम वेतन दो वे चाहे जहाँ भी कार्य करते हों- कारखानों में, दफ्तरों में, खदानों में खेत-खलिहानों में या जंगलों में। यह रैली बड़े कारपोरेट का पेट भरने के लिए मेहनतकश जनता को भूखों मारने की इन नीतियों को बदलने की माँग करने के लिए होगी।
आओ हम एकजुट हों, एकजुट होकर लड़ें।
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