Articles, Workers | कर्मचारी

नरेंद्र मोदी जी, सालाना दो करोड़ नौकरी कहॉ है ?

Admin

Admin

नौकरियाँ (रोजगार) कहॉ है? 
हम सभी आज अपने रोजगार के लिये चिन्तित हैं। अपने रोजगार एवं बच्चों के रोजगार के लिये। अगर हम अपनी नौकरी की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं तो, हमें अपने बच्चों की नौकरियों की चिन्ता हैं। क्या उनहें एक सम्मानजनक एवं सुरक्षित नौकरी मिलेगी? भारत के बारे में कहा जाता है कि इसे जनसंख्यात्मक लाभ मिलेगा। हमारी जनसंख्या का आधा से ज्यादा हिस्सा युवा हैं, जिसकी उम्र 25 वर्ष है और इसका 65 प्रतिशत हिस्सा 35 वर्ष से नीचे हैं। इन युवाओं को अच्छी नौकरियाँ देकर, विभिन्न क्षेत्रों में उनकी सेवाओं का उपयोग कर देश बहुत ज्यादा प्रगति कर सकता है। लेकिन क्या हम प्रभावी ढंग से इनका लाभ उठा रहे हैं ?
भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाली संस्था के अनुसार भारतीय श्रमशक्ति की हिस्सेदारी अपने निम्नतम स्तर 40 प्रतिशत पर पहुँच गई है। दो वर्ष पहले ये 43 प्रतिशत थी। इसका अर्थ है कि 1.3 करोड़ लोगों को जिन्हें नौकरी थी, अब उनकी नौकरी खत्म हो गई है। श्रम ब्यूरों के चौथे वार्षिक बेरोजगारी सर्वेक्षण के मुताबिक 40 प्रतिशत श्रमशक्ति को पूरे वर्ष काम नहीं मिलता है। वर्ष 2015-16 में 36 प्रतिशत मजदूर अस्थाई या ठेका मजदूरों के रूप में बहुत कम मजदूरी पर कार्य कर रहे थे। ऐसे मजदूरों की कुल संख्या 13 करोड़ हैं। महिलाओं के रोजगार में लगातार कमी हो रही है। इनकी भागीदारी 22 प्रतिशत है जो विश्व भर में सबसे नीचे स्तर पर है। 
देश में 1.15 करोड़ रोजगार क्षेत्र में आनेवाले नये मजदूर, प्रत्येक वर्ष नौकरी की तलाश में रहते हैं। मजदूर आधारित क्षेत्रों की वर्ष के चौथाई हिस्से के सर्वेक्षण से पता चला कि 2017 के अक्टूबर की समाप्ति तक मात्र 5.56 लाख नई नौकरियाँ जोड़ी गई। उसी समय रिजर्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार भाजपा सरकार के दो वर्ष की सत्ता की अवधि में 10 लाख नौकरियाँ समाप्त हो गई। सूचना तकनीक, वस्त्र उद्योग, चमकीले पत्थर एवं आभूषणों के निर्माण उद्योगों में हजारों लोगों की नौकरियाँ चली गई।
संचार माध्यमों में नीचे उद्धृत समस्याओं के प्रकाशन से बेरोजगारी की भयानकता का पता चलता है।
रेलवे में 1 लाख खाली पदों पर चयन के लिए आमंत्रित आवेदन में 2 करोड़ लोगों ने आवेदन पत्र भरा। उत्तर प्रदेश में चपरासी के 368 पदों की रिक्तियों को भरने के लिये 23 लाख लोगों ने आवेदन दिये। हरियाणा के न्यायालय में 9 पदों की रिक्तियों के लिये 18000 आवेदन पत्र आए। राजस्थान सचिवालय के 18 पदों की रिक्तियों के लिय 12 हजार आवेदन पत्र भरे गये। इन तमाम आवेदन कर्त्ताओं में स्नातकों, स्नातकोत्तर, शोधार्थियों, अभियन्ताओं एवं एमबीए करने वाले लोग भी शामिल थे।
दूसरी ओर भारत सरकार के विभागों में लाखों पद रिक्त पड़े हुए हैं। 10 लाख शिक्षकों के पद खाली है। रेलवे में 3 लाख पद रिक्त हैं, जिसमें सुरक्षा से जुड़े पद जैसे सिंग्नल मैन, चालकां आदि के पद शामिल हैं। डाक विभाग में 70 हजार पद खाली है। लेकिन सरकार इन पदों को भरने के लिये कोई कदम नहीं उठा रही है। उसके विपरीत पिछले 5 वर्षों से जान-बूझकर रिक्त रखे गये पदों को समाप्त करने का निर्णय लिया जा चुका है।
वर्त्तमान कर्मचारियों पर कार्य का बोझ वर्षों बढ़ गया है। इन कामों को करने वाले आवश्यक योग्यता रखने वाले लोग उपलब्ध है। लेकिन स्थाई मजदूरों को चयनित करने के बजाय, ये कार्य बाहर की एजेंसियों द्वारा ठेका मजदूरों के माध्यम से करवाया जा रहा है। वर्ष 2016 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये संवैधानिक दिशा-निर्देश के बावजूद समान काम, समान वेतन एवं लाभ देने की बात को क्यों लागू नहीं किया जा रहा है ?
सरकार ने भविष्यनिधि कोष एवं कर्मचारी स्वास्थ्य बीमा योजना के आंकड़ों से खिलवाड़ करते हुए 70 लाख नई नौकरियाँ देने का दावा किया है। लाखों ऐसे रोजगार वाले मजदूर हैं जिनका मालिकों ने भविष्यनिधि में निबंधन नहीं किया है और सरकार द्वारा दी गई छूट का लाभ उठाया है। उसी तरह वस्त्र एवं कपड़ा उद्योग में कार्यरत लाखों मजदूरों के भविष्यनिधि के लिये निबंधन हुआ है, जिसका मालिकों की ओर से प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना के अन्तर्गत कर्मचारी भविष्यनिधि में अंशदान किया जायगा। मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल में रोजगार में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। सम्पूर्णता में रोजगार सृजन नकारात्मक है। 70 लाख रोजगार सृजन और कुछ नहीं एक धोखाधड़ी है।
भाजपा सरकार सार्वजनिक पैसे का इश्तेमाल कर्मचारियां के भविष्यनिधि में मालिक की ओर से अंशदान के रूप में कर रही है। लेकिन इसके अपने विभागों के बहुत से कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने वाले 1 करोड़ कामगारों को भविष्यनिधि एवं कर्मचारी स्वास्थ्य बीमा का लाभ नहीं दे रही है। इन 1 करोड़ कामगारों में आंगनबाड़ी, आशा, मध्याह्न भोजन बनाने वाले रसोइयें शामिल हैं। अगर यह सरकार उन्हें मजदूर के रूप में स्वीकार करती, उन्हें न्यूनतम वेतन का भुगतान करती तथा उन्हें कर्मचारी भविष्यनिधि एवं कर्मचारी बीमा योजना का लाभ प्रदान करती तो अच्छी नौकरियों के सृजन का दावा कर सकती थी। अगर सरकार विभिन्न विभागों में कार्यरत सभी 10 लाख मजदूरों को कर्मचारी घोषित करती, उन्हें समान काम के लिये समान वेतन देती, तब यह रोजगार सृजन कहलाता। अगर नई नौकरियों का सृजन नहीं भी होता, तो भी इन उठाये गये कदमों से देश की करोड़ो जनता के लिये अच्छी सम्मानजनक काम करने की परिस्थितियाँ मिलती। इससे करोड़ों मजदूरों की स्थितियों में सुधार होता।
Tags: ,

Leave a Comment