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नरेंद्र मोदी जी, रोजगार कहॉ है ? आपने रोजगार पैदा नहीं किये, उल्टे खत्म किये । देश के नौजवानों को जबाब दो ।

Admin

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रोजगार कहॉ पर है? 

बीजेपी, जिसके प्रधानमंत्री का उम्मीदवार श्री नरेन्द्र मोदी थे, का मुख्य वादा था कि हर साल 1 करोड़ नौकरियां उपलब्ध करवाएंगे। पिछले 10 सालों से यूपीए के शासनकाल में रोजगार विहीन विकास के कारण जनता ने इसका दिल से स्वागत किया। इसके 4 साल बाद यह पाया कि मोदी अपने वायदे पर खरे नहीं उतरे। (उसने पहले की सरकार की तर्ज पर नीतियां लागू की इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं हुई कि वो वादा पूरा नहीं कर सके।

असलियत में हालात पहले से भी गंभीर हुए हंै क्योंकि लोगों ने रोजगार खोये हैं। अब यहाँ विकास हुआ है लेकिन रोजगार में कटौती हुई है। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार मोदी के पहले दो साल के शासन में 10 लाख रोजगार घटे हैं। 2014-15 में देश में काम करने वालों की संख्या 7.7 लाख कम हुई और 2015-16 में 3.8 लाख और कम हो गई। इसके बाद चीजें बद से बदतर हो गईं, पिछले 15 सालों या उसके ऊपर 2016 में लगभग 43 प्रतिशत लोग ही रोजगार पर थे। सी एम आई ई के अनुसार 2018 में हालात और बिगड़ गए और यह हिस्सा 40 प्रतिशत तक गिर गया। जिसका मतलब है कि 1.43 करोड़ कामगार नौकरियां खो चुके हंै। लेवर ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार 2016 में महिलाओं के रोजगार की स्थिति कमजोर बनी हुई है। यह 15 साल या उससे ऊपर की महिलाओं के 22 प्रतिशत को ही रोजगार मिल पाया है। यह पूरे विश्व में सबसे कम है।
लेवर ब्यूरो के आठ महत्वपूर्ण उद्योगों का त्रैमासिक सर्वे अप्रैल 2016 से अक्टूबर 2017 दर्शाता है कि 8 महीनों में मात्र 5.56 लाख रोजगार ही बढ़ पाए। इससे निष्कर्ष निकलता है कि श्रम शक्ति का केवल 1.8 प्रतिशत सालाना 4 लाख रोजगार ही बढ़ पाए। अगर दूसरे श्रेणी में रोजगार घटे हैं तो यह और भी घट जाएगा। सी एम आई ई के अनुभवों के अनुसार बेरोजगारी 5 प्रतिशत हो गई है। इसका मतलब है कि 2 करोड़ लोग लेवर ब्यूरो की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 35 प्रतिशत श्रम शक्ति को पूरे साल काम नहीं मिलता या उन्हें बहुत कम रोजगार पर काम करने पर मजबूर किया जाता है। यह संख्या लगभग 13 करोड़ है।
इसी कारण से हमें चौंकाने वाली रिपोर्ट मिलती है कि रेलवे में 1 लाख रिक्त स्थानों के लिए 2.5 करोड़ लोग आवेदन पत्र देते हैं या उत्तर प्रदेश में 368 चपरासी के लिए 23 लाख अर्जियां (आवेदन) आते हंै, हरियाणा की कोर्ट में 9 पदों की भर्ती के लिए 18000 आवेदन आते हंै, राजस्थान के सचिवालय में 18 पदों के लिए 12000 आवेदन आते है।
रोजगार को समाप्त करने वाली सरकार
सरकार व सार्वजनिक क्षेत्र भारत में पूरे रोजगार का बहुत कम हिस्सा उत्पन्न करते हंै। लेकिन सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में अनवरत रोजगार गिरावट दर्शाते हंै कि मोदी सरकार रोजगार पैदा करने वाली नहीं है यह तो रोजगार बर्बादी करने वाली है। जब से यह सरकार 2014 में आई है, सभी सरकारी महकमों (मंत्रालयों, रेलवे, पोस्टल, विभाग, पुलिस इत्यादि) में नौकरियों में लगतार गिरावट आई है। 2014 में केन्द्र सरकार के कर्मचारियों कि संख्या 33.28 लाख थी 2015 में घटकर 33.06 रह गई, 2016 में 32.85 लाख और 2017 में इसमें और गिरावट की गई, और यह 32.53 लाख रह गई। यह सारी स्थितियां केन्द्र के बजट दस्तावेजों में दर्शायी गयी हैं। 2017 में लगभग 75000 सरकारी नौकरियां लुप्त हो गई और यही स्थिति अभी भी जारी है।
इसके अतिरिक्त 330 सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान जिनमें 2014 में 16.91 लाख लोग काम करते थे। इनके मुख्य उद्योग हैं मानव वाणिज्य, स्टील, तेल तथा भारी और मध्यम इंजीनियरिंग उद्योग व उर्वरक इत्यादि। 2017 में यह सिकुड़कर 15.24 लाख रह गय जिसका अर्थ है कि 3 सालों में लगभग 1 लाख 67 हजार रोजगार खोना।
सबसे बड़ी कमी गैर-आधिकारिक क्षेत्रों में हुई है जहां कुशल कारीगरों में 1.11 लाख की कमी और अकुशल कारीगरों में 77000 की कमी हुई। इनमें के कुछ (पद) स्थान केजुअल और ठेका मजदूरों से भरे गए जिनकी संख्या 2014 में 3.4 लाख से बढ़कर 2017 में 3.93 लाख हो गई (यह सरकारी आंकड़े हैं)। सार्वजनिक क्षेत्र में कम रोजगार व अनियमित रोजगार मोदी सरकार का देश के लिए तोहफा है।
सरकारी बैंकों में शुरुआत में रोजगार वृद्धि हुई जो 2014 में 7.25 लाख से 2015 में 9.47 लाख हुई। इसके बाद मोदी सरकार ने बैंकों के पेंच कसे और अगले दो सालों में 35000 रोजगार की कटौती कर सरकारी बैंकों में कुल संख्या के 9.12 लाख कर दिया गया (आरबीआई डाटा)। क्लर्कों और निचले स्तर की नौकरियों में कटौती की गई।
उद्योग और निर्माण क्षेत्र में संकट
उद्योग व निर्माण क्षेत्र रोजगार हानि से बुरी तरह प्रभावित हुए। 21वीं सदी के पहले दशक में निर्माण क्षेत्र में हर वर्ष 10 प्रतिशत वृद्धि हुई। बीजेपी सरकार के 4 साल के कार्यकाल में यह औसत 4 प्रतिशत हर वर्ष से नीचे रही। इसके परिणाम स्वरूप इस क्षेत्र में गांव से उजड़े हुए खेतीहर मजदूर रोजगार पाते थे, इसमें भारी हानि हुई है।
इस दशक में औद्योगिक विकास बहुत ही कमजोर रहा लेकिन बीजेपी सरकार भी इस स्थिति में कोई भी बदलाव लाने में सफल नहीं रही। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक जो कि औद्योगिक उत्पादन में ऊँची व नीची रहकर 2014-15 में 3.8 प्रतिशत थी। 2015-16 में 2.8 प्रतिशत तक गिर गई, यह 2017-18 में 4.5 प्रतिशत हुई। इस सरकार के दो साल में कुल फैक्ट्री रोजगार 7.61 लाख बढ़ा जो कि 2011-12 में 7.36 लाख था।
नोटबंदी और जीएसटी के कारण अर्थव्यवस्था आने वाले दो साल तक अस्त-व्यस्त हो गई। पहले से बुरी हालात में असंगठित क्षेत्र का उत्पादन इससे बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। यह क्षेत्र पहले से ही रोजगार सृजन नहीं कर पा रहा था।
सरकार की योजनाएं जैसे कि स्किल इंडिया (प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना) पूरी तरह से फेल हुई है इससे कोई हैरानी नहीं होती, तो 3 साल में 41.3 लाख लोगों के प्रशिक्षण दिया और उनमें से मात्र 6.15 लाख को रोजगार मिल पाया क्योंकि रोजगार है ही नहीं। भारत सरकार ने 4.6 लाख करोड़ लगभग 10.38 करोड़ रुपये का लोगों को मुद्रा कर्ज दिया इसके आधार पर सरकार कह रही है कि लोग स्वरोजगार में लगे हैं। यह कर्जा लगभग 44000 प्रति व्यक्ति पड़ता है शायद मोदी जी के कथन अनुसार इससे पकौड़े बेचे जा सकते है ।
गहराते रोजगार के संकट, कृषि संकट के कारण है :
भारत वर्ष में परम्परागत रूप से कृषि क्षेत्र सबसे ज्यादा रोजगार का स्रोत है। इसमें दोनों तरह के स्वरोजगार के वेतन भोगी श्रेणियां आती है । खेती की बढ़ती उपलब्धता नहीं होने के कारण जैसे-जैसे ज्यादातर किसान जमीन को खो रहे हैं, ज्यादा से ज्यादा लोग खेती से भगाए गए हैं और उन्हें दूसरा कोई काम ढूंढऩे पर विवश किया गया है। बीजेपी ने खेती की आय दोगुनी करने और कृषि क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने का वायदा किया था। असलियत में किसानों की आमदनी कम हुई है, ग्रामीण वेतन थम गए हंै तथा रोजगार कम होने के कारण लोगों को बेरोजगारी की ओर धकेला जा रहा है।
खेती के गहराते संकट का प्रभाव केवल खेती संबंधी रोजगार पर नहीं पड़ता। उसका असर खेती के बाहर भी पड़ता है। जैसे ही रोजगार ढूंढऩे वालों की संख्या बढ़ती है मालिक लोग कम से कम वेतन पर काम करवाते है।
कम वेतन तथा कृषि संकट का अर्थ है कि मेहनतकश आवाम की क्रय शक्ति कम होती है और मांग कम होने से पहले से खराब हालात में अर्थव्यवस्था में रोजगार कम होंगे। रोजगार छीनने से वेतन कम होने से क्रय शक्ति कम होती है। इससे उत्पादन कम होगा और कुछ लोग रोजगार खोएंगे। बीजेपी सरकार ने अर्थव्यवस्था को इस कुचक्र में धकेल दिया है।
सरकार ने शायद यह समझा था कि मेक इन इंडिया जैसी नीतियों से निर्यात बढ़ाने से उत्पादन बढ़ेगा। पिछले 4 सालों में गैर तेल को छोड़कर बाकी के मदों में निर्यात बिल्कुल गतिहीन (रुका पड़ा) है। जिसके कारण उत्पादन और रोजगार बिल्कुल नहीं बढ़ पाया। दूसरी तरफ हमारे घरेलू उत्पादन से मुकाबला करने वाले उत्पादों के आयात के कारण स्थानीय उद्योगों का नुकसान हुआ और लोगों को रोजगार खोना पड़ा।
बेरोजगारी समस्या क्यों?
मोदी सरकार कारपोरेट के विकास व उनके लाभ बढ़ाने के लिए दृढ़तापूर्वक प्रतिबद्ध है। इसी कारण वे सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ाना नहीं चाहती उल्टे इस क्षेत्र को मारने पर अमादा है। इस सरकार को अमीरों को कर नहीं लगाया और सरकारी खर्चा भी नहीं बढ़ाया। उसके विपरीत सरकार ने उम्मीद की कि निजी क्षेत्र रोजगार बढ़ायेगा और जिन्हें रोजगार नहीं मिलेगा वह स्वरोजगार ढूढेंगे। क्योंकि सरकार अतिरिक्त खर्चा करना नहीं चाहती थी इसलिए मांग नहीं बढ़ी। इसके स्थान पर सरकार की नीतियों से-
क)  कृषि संकट और गहराया।
ख)  स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी रोजगार बढऩे को रोका गया क्योंकि यह सरकार निजी क्षेत्र के मुनाफे को बढ़ाना चाहती है। इस सरकार ने जो थोड़ा बहुत खर्च किया भी है जिसे बीमा के किस्तों से निजी बीमा कम्पनियों की तिजोरी भरने के काम आया था। मेक इन इंडिया व स्किल इंडिया जैसी विनाशक योजनाओं में किया गया। यहां तक लाभप्रद रोजगार का प्रश्न है पिछले 4 साल पूरी बर्बादी के साल रहे हैं ।
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