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नरेंद्र मोदी जी की, केन्द्र की सरकार, ऐसा क्यों नहीं करती है ? – के. हेमलता जी

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स्थायी पदों में भारी कटौती, सरकारी खर्चे में कमी, नव-उदारवादी नीतियों के महत्वपूर्ण पहलू है। नव-उदारवादी अर्थनीतियों के विश्व पूंजीवादी व्यवस्था के अन्तर्गत कार्यरत सरकारें, मजदूरियों एवं जनकल्याणकारी कार्यों में खर्चों की कटौती के जरिये वे अपने मालिकों, बड़े कारपोरेट संगठनों,  व्यवसाइयों और जनता के पैसे का उपयोग करते हुए उन्हें बड़ी-बड़ी छूट देते, इस नीति के अन्तर्गत करोड़ों मजदूर जो अपने खून-पसीने से इस देश में समृद्धि का सृजन करते हैं,  उन्हें बलि का बकरा बनाया जाता है। उन्हें बंचित रखकर मुट्ठी भर कम्पनी मालिकों एवं व्यवसायिक घरानों को लाभ पहुँचाते हैं। जो दल इन बड़ी कम्पनियां एवं व्यवसायिक घरानों से पैसे पाते हैं वे सत्ता में आने के बाद ऐसी नीतियों पर अमल करते हैं जिससे बड़े कम्पनी मालिकों एवं व्यवसायिक घरानों को मालामाल होने में मदद मिलती है। इसलिये पद नहीं भरे जाते हैं। लाखों पदों को समाप्त कर दिया जाता है। बाहर की एजेंसियों एवं ठेके के माध्यम से काम करवाये जाते हैं जिससे वेतन, सामाजिक सुरक्षा एवं अन्य लाभों के लिये खर्चो में कटौती की जा सके। यही रिक्तियाँ सभी केन्द्रीय, राज्य सरकारों के विभागों एवं सार्वजनिक क्षेत्रों में पायी जाती है।
योजना के कार्यों, बाहर की एजेंसी द्वारा किये जानेवाले एवं ठेके पर होने वाले कार्यों से जुड़े मजदूरों की विशाल संख्या, समाज के गरीब एवं सामाजिक रूप से उत्पीड़ित समुदाय से आनेवाले लोगों की है। इसमें महिलाएँ, दलित एवं अत्यन्त पिछड़ी जातियों से आनेवाले लोग हैं। देश के करोड़ों खासकर ग्रामीण इलाकों की महिलाओं, बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य एवं पोषण से जुड़ी मूलभूत सेवाएँ, योजना कामगार करते हैं वे देश के करोड़ों कुपोषित एवं अशिक्षित महिलाओं को सेवाएँ प्रदान कर वे देश के मानव सूचकांक एवं मानव संसाधन में सुधार कर रहे हैं। देश में माँ बनने के समय महिलाओं के मृत्युदर तथा बाल मृत्युदर में कमी आई है। मलाला की तरह दशकां से कार्य करने के बावजूद उन्हें कामगार के रूप में भी पहचान नहीं मिली है। उन्हें सामाजिक कार्यकर्त्ता, स्वयं सेवक या कार्यकर्त्ता के रूप में पुकारा जाता है। अपने को तीसरी सबसे तेज आर्थिक विकास की डींग हाकने वाली सरकार द्वारा इन कामगारों को होनरेरियम के  रूप में भुखमरी वाला वेतन दिया जाता है, जो सरकार के लिये अत्यन्त शर्मनाक बात है। यहां यह भी रेखांकित किया जाना चाहिये कि शिक्षा,  स्वास्थ्य, पोषण जैसी आवश्यक सेवाएँ योजना के माध्यम से प्रदान की जाती है। यह गरीब बच्चों एवं महिलाओं को अधिकार के रूप में प्राप्त नहीं है। इन योजनाओं को कभी भी वापस लिया जा सकता है। वस्तुतः कल्याणकारी योजनाओं एवं अनुदान में कटौतियों के जरिये सरकार अपना खर्च कम करना चाहती है। अतः हम इन योजनाओं के निजीकरण की कोशिशें देख रहे हैं। गैर सरकारी संगठनों को हाथों सौंपने के साथ-साथ अन्य कदमों जैसे नगदी का हस्तांतरण, लक्षित समूहों के लिये कार्य के जरिये इसे कमजोर करने की कोशिश को तेज कर दिया है। योजना आयोग को विखंडित कर नीतिय आयोग का गठन, इसी उद्देश्य को सामने रखकर किया गया है। इन तमाम योजनाओं को लागू करने में केन्द्र सरकार की जो हिस्सेदारी थी तथा शुरूआती दौर में यह केन्द्र सरकार द्वारा ही संचालित थी, अब उसमें बड़ी कटौती कर दी गई है।
हलांकि अपने दृढ़ संघर्षों के बल पर योजना कर्मियों ने बहुत से राज्यों में अपनी मजदूरियों एवं कुछ लाभों को हासिल किया है। भारतीय  श्रम आयोग के सर्वसम्मत अनुशंसाओं एवं दशकों से कार्यरत रहने के बावजूद, मजदूर के रूप में उनकी मान्यता, न्यूनतम मजदूरी एवं सामाजिक सुरक्षा लाभ जैसे मूलभूत मांग अभी तक पूरी नहीं की गई है।
उनकी योजनाओं पर निजीकरण उसे विखंडित करने तथा योजना को वापस लेने की तलवार उनके माथे पर लगातार लटकी हुई है।
सरकार ने बड़े जोर-शोर से प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना की शुरूआत की है। इसके पीछे  मंशा है कि उद्योगों के लिये जरूरी कौशल से युवाओं को रोजगार मिलेगा और नियोजकों को कुशल कामगार मिलेंगे। वर्ष 2015 से शुरू किये गये इस कार्यक्रम के अन्तर्गत 41.3 लाख युवाओं को प्रशिक्षित किया गया है। लेकिन सिर्फ इसमें से 15 प्रतिशत, 6.15 लाख युवकों को ही रोजगार मिला है, वह भी अच्छा और अच्छी मजदूरी वाला रोजगार नहीं है। इस योजना की जांच के लिये जिस शारदा प्रसाद कमिटी का गठन किया गया था, उसने अपनी रिर्पोट में कहा है कि निजी कम्पनियों के हितों को ध्यान में रखकर सार्वजनिक कोष के 2500 करोड़ रूपये इस कार्यक्रम पर खर्च किये गये। लेकिन उद्योगों को जिस कौशल की जरूरत थी और युवाओं को जिस अच्छी पगार के साथ अच्छी नौकरी की जरूरत थी, दोनों उद्देश्य पूरे नहीं हुए।
जब भी सरकार के सामने बाहर की एजेंसियों से काम करवाने, ठेका के माध्यम से काम करवाने पर रोक, रिक्तियों को भरने एवं योजना कर्मियों के स्थाईकरण की मांग उठाई जाती है, तो सरकार वित्त की कमी को रोना रोती है, जो पूरी तरह गलत है। अर्थव्यवस्था के अन्दर संसाधनों की कोई कमी नहीं है। उद्योगों, कृषि क्षेत्रों एवं सेवा क्षेत्रों में कार्यरत श्रमजीवी जनता पूरे देश की जनता की आवश्यकताओं की पूर्त्ति के लिये पर्याप्त संसाधनों का सृजन करती है। यह धोखाधड़ीपूर्ण तर्क सिर्फ बड़ी कम्पनियों एवं व्यवसायिक घरानों द्वारा जनता के संसाधनों की लूट पर पर्दा डालने के लिये दिया जाता है। यह लूट नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के अन्तर्गत सरकार द्वारा आगे बढ़ाया जाता है। अगर बजट के कागजातों की जांच की जाय तो पता चलता है कि वर्ष 2008 के पूर्व से ही प्रत्येक वर्ष औसतन बड़े कारपोरेट कम्पनियों को 5 लाख करोड़ रूपये की कर में छूट दी जाती रही है। पिछले बजट के वक्तव्य के आधार पर बडे़ घरानों द्वारा नहीं दिये जाने वाले जमा टैक्स का आंकड़ा 7 लाख करोड़ रूपये हैं। संसद में प्रस्तूत रिजर्व बैंक से प्राप्त आंकड़े के अनुसार 2014-15 और सितम्बर 2017 तक सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों द्वारा दिये गये 2.42 करोड़ ऋण को बट्टे खाते में डाल दिया गया। पूरे ऋण का 77 प्रतिशत बडे़ कारपोरेट घरानों के पास है। गैर कार्यरत आस्तियाँ 9 लाख करोड़ की राशि तक पहुँच गई हैं यह किसका रूपया है? यह 9 लाख करोड़  रूपया उन आम लोगों का है जिन्होंने अपना पेट काटकर बुरे दिनों के लिये पैसा बैंक में जमा करके रखा था। यह उन्हीं लोगों के बचत का रूपया है, जो बैंक के क्रियाशील पूंजी का बड़ा हिस्सा है। नीरव मोदी, विजय माल्या जैसे लोग सार्वजनिक बैंकों से पैसे लूटकर देश छोड़कर भाग जाते है। स्वघोषित चौकीदार ने बड़े शान से घोषणा करते हुए कहा था कि किसी को भी सार्वजनिक कोषागार पर हाथ डालने की इजाजत नहीं दी जायेगी, क्या वह सो रहा है ? देश से भागकर नीरव मोदी विश्व आर्थिक मंच पर जाकर प्रधानमंत्री के साथ फोटो खिंचाने के लिए पहुँच गया। यह कैसे सम्भव हुआ ? सरकार जनता की सम्पत्ति लूटने वालों पर इस तरह रहम क्यों दिखा रही है ?
अगर सरकार के पास रूपये नहीं हैं तो इन बड़ी कम्पनियों पर इतनी उदारता क्यों बरती जा रही है ? इस रूपयों का उपयोग आमजनता की भलाई के लिये क्यां नहीं हो सकता है ? प्रत्यक्ष कर में लाभ के रूप में 12 लाख करोड़ रूपयों की छूट तथा टैक्स बकाये के रूप में 9 लाख करोड़ रूपये, सब मिलाकर 21 करोड़ रूपयों से देश की तमाम जनता को सार्वजनिक खाद्य सुरक्षा स्वास्थ्य सेवा तथा अन्य कल्याणकारी लाभ दिया जा सकता है।
अतः वित्तीय संसाधनों की कमी का मामला नहीं है। बात है कि सरकार जनता का पैसा बड़े कम्पनियों को प्रोत्साहन राशि के नाम पर देना चाहती है और आम जनता पर खर्च करनेवाले पैसे को मजाक के तौर पर अनुदान की राशि कही जाती है। सरकार इसे खजाने पर भार के रूप में समझती है। यह सरकार सिर्फ बड़ी कम्पनियों के हितों के लिये ही काम कर रही है।
क्या यह न्यायपूर्ण व्यवस्था है ? करीब 50 बड़ी कारपोरेट कम्पनियाँ जिनके पास गैर क्रियाशील आस्तियाँ 9 लाख करोड़ रूपयों की हैं, उन्होंने बैंकिंग प्रणाली को गिरवी रख लिया है। कम्पनियों के उस समुदाय को सरकार लाखो करोड़ रूपये की छूट दे रही है और सार्वजनिक क्षेत्रों के निजीकरण, व्यापार के उदारीकरण एवं सट्टाबाजारी व्यापार के रूप में राष्ट्रीय सम्पत्ति का हस्तांतरण कर रही है। यह काम तब किया जा रहा है जबकि हमारे देश की विशाल बहुसंख्यक जनता को नौकरी, शिक्षा,  स्वास्थ्य, परिवहन, आवास जैसी मूलभूत आवश्यकताआें से बंचित रखा जा रहा है। जनतंत्र में किसी भी सरकार द्वारा ये सारी चीजे मुहैय्या करना उसका कर्त्तव्य है। यह हमारे संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांत में नीहित है। नव-उदारवादी सत्ता के अधीन तमाम नीतियाँ कारपोरेट घरानों को और ज्यादा समृद्ध बनाने के लिये तैयार की जाती है और यह काम श्रमजीवी जनता की कीमत पर किया जाता है। देश में जिस तरह की आर्थिक विपस्यता बढ़ी है, उससे इसे स्पष्ट रूप से देखा जाता सकता है। वर्ष 2017 में श्रमजीवी जनता द्वारा पैदा किये गये धन का 73 प्रतिशत, 1 प्रतिशत द्वारा हथिया लिया गया है। एशिया के सबसे दूसरे बड़े तथा भारत के सबसे बड़े धनी आदमी मुकेश अम्बानी के धन में 72.4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। यह अब 2,60,622 करोड़ रूपये है।
प्रधानमंत्री युवाओं को लगातार सलाह देते हैं कि नौकरी की तालाश मत करें बल्कि स्वरोजगार के जरिये व्यवसायी बने तथा दूसरों को रोजगार प्रदान करें। आज हमार देश में स्वरोजगार ज्यादा मजबूरी का रोजगार बन गया है। श्रम ब्यूरों के अनुसार हमारे देश के 46.5 प्रतिशत मजदूर स्वरोजगार कर रहे थे। उनकी आय कितनी है ? उसी रिपोर्ट में कहा गया है कि उनमें से 67.5 प्रतिशत लोग मात्र 7500 रूपये आय करते हैं। सिर्फ 0.1 प्रतिशत स्वरोजगार में जुड़े लोग ही एक महीने में 1 लाख की आय प्राप्त करते हैं। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के जरिये युवाओं को व्यवसायी बनाने की बात की जा रही है। इस योजना के जरिये कितने युवा व्यवसायी बने? 2015 में इसके शुरू होने स ेअब तक 4.68 लाख करोड़ रूपयों का ऋण दिया गया है। इसका अर्थ है कि प्रति व्यक्ति की दर से सिर्फ 47249 रूपये का ऋण ही दिया गया है। क्या इस राशि से कोई व्यवसाय शुरू करके उसे चलाया जा सकता है ? हाँ रोड के किनारे पकौड़ा बेचा जा सकता है। प्रधानमंत्री के अनुसार पकोड़ा बेचकर 200 रू0 प्रतिदिन की कमाई भी रोजगार है। प्रधानमंत्री के इस विचार का भाजपा अध्यक्ष ने भी जोरदार ढंग से समर्थन किया और त्रिपुरा के भाजपा मुख्यमंत्री ने पान दुकान खोलने एवं गाय का पालन-पोषण करके रोजगार करने का आह्वान किया है। क्या भाजपा का रोजगार सृजन के बारे में यही विचार है ?
व्यवसाय करने में आसानी
वर्ष 2017 के भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र में शामिल ‘‘व्यवसाय करने के आसानी’’ के सवाल को इस सरकार ने बहुत गंभीरता से लिया है। मजदूरों द्वारा लम्बे संघर्षों के बाद जो अधिकार हासिल किये गये हैं उसे उनसे छीनकर उनके उपर गुलामों जैसे हालातों को लादकर मालिकों को और ज्यादा शोषण करने तथा मुनाफा बढ़ाने की परिस्थितियाँ पैदा की गई है।
सत्ताशीन होने के तुरंतबाद प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर निकल गये और वहाँ से  पूंजी निवेश के लिये निवेशकों को सभी तरह की सहुलियते देने तथा श्रम कानूनों में बदलाव का वादा करने लगे। वे निवेशकों को भारत के सस्ते मजदूर का लालच दिखाकर उन्हें ज्यादा मुनाफा कमाने की बात करके भारत आने का न्योता देने लगे। इसके जरिये युवाओं के लिए रोजगार सृजन का ख्वाब दिखाया जाने लगा। ‘‘भारत में उत्पादन का नारा वस्तुतः असली इरादों को छिपाने की कोशिश थी।
‘‘भारत में उत्पादन करो’’ के पर्दे के पीछे, सभी क्षेत्रों को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिये खोल दिया गया है। यहाँ तक कि रणनीतिक महत्व के रक्षा, बीमा आदि क्षेत्रों में भी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को आने का न्योता दे दिया गया है। रोजगार सृजन, नया निवेश तथा सही अर्थों में ‘‘भारत में उत्पादन’’ के बदले बडे विदेशी कम्पनियों का देशी कम्पनियों पर नियंत्रण ज्यादा बढ़ा है या ऐसी कम्पनियों ने देशी कम्पनी को खरीद लिया है जैसा कि वालमार्ट एवं फ्लिपकार्ट के समझौते से पता चलता है।
नये रोजगार सृजन के बदले कम्पनियों के विलय एवं एक के द्वारा दूसरे को खरीदे जाने से हजारों नौकरियाँ समाप्त हुई है। वालमार्ट, फ्लिपकार्ट के बीच हुए समझौते का भी यही असर हुआ है। लाखों किराना दूकानों के मालिकों की आमदनी घटी है। हलांकि कुछ हजार लोगों को सामान पहुँचाने वाले मजदूर जैसे कम मजदूरी वाली नौकरियाँ हासिल हो सकती है। आम लोगों का रोजगार एवं रोजी-रोटी समाप्त होगी। सरकार द्वारा संरक्षित बहुराष्ट्रीय निगमें देश की अर्थव्यवस्था एवं जनता को लूटेगी, यह व्यवसाय करने की आसानी’’ करने का अर्थ और कुछ नहीं बल्कि हमारी जनता एवं देश के प्राकृतिक संसाधनों के लूट की छूट है। क्या हम इसे जारी रहने दे सकते हैं?
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