*जानिए, परमानेन्ट नौकरी कैसे खत्म की, हर नौजवान इस आर्टिकल को पढ़े।*

 

श्रम कानूनो में पहले केवल दो श्रेणी भी, एक परमानेन्ट और दूसरा केजुअल, इसके अलावा स्टाफ और मैनेजर अलग कैटागिरी थी ।
परमानेन्ट श्रमिक, आज भी है, जिसको नौकरी से बिना कारण के निकाल नहीं सकते, हर वर्ष वेतन वृद्धि करना है । केजुअल केवल सीजनल कंपनियों के लिए थे, जहॉ काम कम ज्यादा होता रहता है, केजुअल में उन्हीं श्रमिक को पहले लेना है, जो पहले से काम करता आया है । केवल यही दो केटागिरी थी, *इसमे 90 प्रतिशत श्रमिक परमानेन्ट होते थे ।*

1971 में ठेका मजदूर अधिनियम बना, यह इसीलिए बनाया गया कि कारखाने में कुछ काम ऐसे होते हैं, जो रोजाना नही होते, उसमे ठेका मजदूरों को लगाया जाए, ऐसी कारखाना मालिको ने मॉग की, जैसे कोई मटेरियल शिफ्ट करना है, लोडिग अन लोडिंग, हाउस कीपिंग, पुताई, सिविल कार्य, ऐसे काम के लिए ठेका अधिनियम बना, आज भी लाईसेंस में केटागिरी लिखी जाती है ।

*इसमे यह भी लिखा है कि यदि कोई ठेका मजदूर, परमानेन्ट कर्मचारी के जैसा काम कर रहा है तो उस ठेका मजदूर को परमानेन्ट कर्मचारी के बराबर वेतन और सारी सुविधाएं मिलना चाहिए । इस कानून को आज तक किसी ने नहीं माना, केवल कागज में लिखा है, क्योंकि हम सब मौन है, ठेका मजदूर नौकरी के भगाने के डर से मुंह नहीं खोलता।*

*_इससे पूँजीपतियो ने परमानेन्ट श्रमिकों को बदलना शुरू किया, पोडक्सन में लगाना शुरू किया, धीरे धीरे, उल्लंघन किया, इसमे कास्ट कम हुई, जिससे मालिकों को फायदा हुआ । इसमे एक परेशानी थी कि जो ट्रेनिंग की अवधि थी वो छह माह थी, इससे ज्यादा समय होने पर वो ठेका मजदूर भी परमानेन्ट हो जाता था इसलिए छह महीने में ब्रेक देने लगे । सारे पोडक्सन में ठेका मजदूर काम करने लगे। इसमे मालिक को एक और परेशानी हो गई थी कि छह महीने में जब तक वह काम सीखता था, तब तक उसका ब्रेक हो जाता था । यह कानूनी रूप से गलत था मगर सरकारो ने गलत करने दिया, कानून के आधार पर क्योंकि उत्पादन में ठेका मजदूर नहीं लगा सकते है, आज भी ये कानून है, मगर कोई मालिक नही मानता, *कांग्रेस और भाजपा दोनों पूँजीवादी पार्टियॉ है, इसलिए इन्हौने कोई कार्यवाही नहीं की और अप्रत्यक्ष रूप से काम करने दिया, उसकी मौन स्वीकृति दे दी ।*

इसके बाद म. प्र. में बाबू लाल गौर जी मुख्य मंत्री थे, तब उन्हौने *”फिक्स टर्म”* एक नई कैटागिरी को जोड़ा जिससे अब छह महीने वाला चक्कर खत्म हो गया, अब कंपनी ठेका मजदूरों की जगह फिक्स टर्म में भर्ती करने लगी, इससे ट्रेन्ड मेन पावर मिलने लगा और परमानेन्ट करने की ज़रुरत से बच गए । इससे कंपनियों का मेन पावर कास्ट कम हुई और परमानेन्ट करने की ज़रुरत खत्म हो गई ।

इसके बाद भी इनका मन नहीं भरा, तो इन्हौने ट्रेनिंग के नाम पर नौजवान बच्चों को भर्ती करना चालू किया, इसमे जो कौशल उन्नयन योजना के तहत बच्चों को ट्रेनिंग के नाम पर बच्चों को लिया, और नरेन्द्र मोदी जी ने, अप्रेन्टिश एक्ट में संशोधन किया कि अब कितने ही बच्चों को अप्रेन्टिश करवा सकते हैं, इन दोनों में न्यूनतम वेतन की जगह स्टाई फंड देना होता है जो काफी कम है, इससे मेन पावर कास्ट और कम हो गई । *परमानेन्ट करने की ज़रुरत बिल्कुल खत्म हो गई, इसमे एक साल अप्रेन्टिश, एक साल ट्रेनिंग और दो साल फिक्र टर्म, कुल मिलाकर चार साल एक नौजवान बच्चे का शोषण करने की छूट मिल गई । इसके बाद उसको नौकरी से निकाल दिया जाता है।*

अभी सरकार लगी हुई है कि सरकार इन ट्रैनिग और अप्रेन्टिश का वेतन सरकार दे, ताकि और ज्यादा पूँजीपतियो के मुनाफा बढ़ सके और इन पार्टियों को बड़ा चंदा भी दे सके । *जिससे शराब मुर्गा की पार्टी करके, पैसे बॉटकर बार बार चुनाव जीत सके ।*

इसके अलावा सरकार पी एफ की जमा राशि में मैनेजमेंट के द्वारा जमा राशि को, श्रमिक स्वयं जमा करे या सरकारी खजाने से जमा करे, या इसकी कटौती घटाई जाए, इन तीनों कामों को सरकार ने करना शुरू कर दिया है । इन बजट में नये महिला कर्मचारी के लिए कटौती कम की है और सरकार ने प्रबंधन के जमा राशि को सरकारी खजाने से भरने की घोषणा की है ।

आउटसोर्सिंग ने नाम पर भारी लूट जारी है, बड़ी बड़ी कंपनियां मेन पावर सप्लाई में आ गई है, जिसमें सब प्रकार मैनेजर, स्टाफ और वर्कर्स, सब सप्लाई कर रहे है । आज सब कुछ ठेकेदारी में चला गया है ।

आप देखेगे, किस प्रकार से धीरे धीरे सब कुछ खत्म कर दिया । अभी *मोदी सरकार सारे श्रम कानून को खत्म कर, केवल चार सहिता बना रही है जिसमें काम के घंटे की सीमा बढ़ाने, ओवरटाइम को खत्म करने, न्यूनतम वेतन की बाद्धता जैसे कानून खत्म कर रही है ।* *श्रमिक अपने हक के लिए संघर्ष न करे, उसके लिए नौकरी से भगाने का छूट के साथ वेतन काटने और जेल में डालने जैसे प्रावधान कर रहे है ताकि इन शोषण दमन अत्याचार के खिलाफ मेहनतकश आवाम, आवाज़ न उठा सके,* यही कारण है कि आज ट्रेड यूनियन आन्दोलन कमजोर हो गया है, नौकरी से भगाने के डर से लोग आन्दोलनो में आने से डर रहे है ।

साथियों, यह राजनीति स्वनियोजित तरीके से की जा रही है और हम राजनीति को न समझना चाहते हैं और न ही अपने इन असल सवालो पर अपना वोट करना चाहते हैं, यही साजिश है जो पूँजीपति और पूँजीवादी पार्टियॉ कर रही है, जिसके जाल में हम सब फस गए हैं, इसलिए आज हम लुट रहे है, हमारे परिवार का जीना मुश्किल हो रहा है और इन पूँजीपतियो की सम्पति बेताहासा बढ़ रही है ।

*जागो, नौजवानो, कर्मचारियों, मजदूरों, मेहनतकश लोगों, अपनी राजनैतिक समझ को बढ़ाओ, अपने विचारधारा की राजनैतिक पार्टी को मजबूत करो, स्वयं को समाजवादी व्यवस्था के लिए समर्पित करो, यही सही रास्ता है, जहॉ से सारी समस्याओं के समाधान मिलेंगे ।*

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