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जानिए, कैसे लूटते है, देश के किसानों को ।

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Ashish

जब से कृषि क्षेत्र में कोपरेट जगत, बड़े पूँजीपतियो को छूट दी गई, तब से सरकारो ने इन पूँजीपतियो के पक्ष में नीतियाँ बनाई और इन्हौने किसानों से मुनाफ़ा कमाया, यह जब से शुरू हुआ, जब से ये नई आर्थिक नीतियाँ निजीकरण, उदारीकरण, भूमंडलीकरण की नई पूँजीवादी सरकारो ने इन नीतियों को अपनाया ।
पहले, किसानों को मिलने वाली, खाद बीज कृषि यंत्रो पर सब्सिटी खत्म करवाई, जिससे ये सब बहुत मंहगे हुए, इसी समय में इन पूँजीपतियो ने इन सब चीजों को बनाने के लिए कारखाने लगाए, सरकारो ने इसका मुल्य तय करने का अधिकार इन पूँजीपतियो को दे दिया, जिसके बाद इन्होंने अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए, इन सब चीजों के दाम बढ़ाने धीरे धीरे शुरू किये, लगभग पॉच सालो में सबके दाम दुगने से भी ज्यादा कर दिए, सरकारे उनके साथ थी, इसलिए किसान कुछ नहीं कर पाये, मजबूरी में उसी कीमत पर खाद बीज कृषि यंत्र खरीदे, इससे कृषि उत्पादन लागत बड़ी, और दूसरी तरफ इन पूँजीपतियो के मुनाफा बड़े, इन्होंने इन पूँजीवादी राजनैतिक पार्टी, भाजपा कांग्रेस को खूब बड़ा चंदा दिया, इससे इन्हौने चुनावो में खूब, मुर्गा शराब पैसे बॉटे, और चुनाव जीते, किसानों को कुछ समझ नहीं पड़ा, किसानों की यह लूट सरकारो और पूँजीपतियो ने मिलकर की ।
दूसरा, इन्होंने कहा कि हम किसानों को उसकी फसलों से उत्पादन होने वाली फसलों को पूँजीपति कारखाने लगाएगे, और इस हिसाब से किसान की फसलों को खरीदेगे, इससे बिचौलिये किसानों को लूट नहीं पायेगे, मगर हुआ इसका उल्टा कारखाने कितने लगे ये तो जॉच का विषय है, मगर इन पूँजीपतियो को इस बहाने खरीदी करने की छूट मिल गई, परंपरागत व्यापारी की जगह सीधी कंपनियां आ गई, सरकार पीछे हट गई, इससे क्या हुआ की किसान की फसलों की कीमत ये कंपनियां तय करने लगी, इनके पास पैसा बहुत है, इन्होंने फसले जब आती है, उस समय किसान को अपना कर्ज़ चुकाना होता है तो वो अपनी फसल तुरंत बेचता है, कितने ही दाम में बिके, इस समय सरकार भाग गई, खरीदी नहीं करती, इसी मजबूरी का फायदा ये पूँजीपति उठाते है और न्यूनतम समर्थन मुल्य से नीचे के दाम पर, खुलेआम किसान की फसल बहुत कम दामो में खरीदते है, इसके बाद यही पूँजीपति देश की आम जनता को दुगुना और तिगुना और दस गुना तक के दामो पर बेचती है, और बेताहासा मुनाफा कमाते है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण धान है । धान की फसल के समय धान बहुत ही कम दामो में किसान बेचता है, मगर बाजार में जो चावल आता है वो कभी सस्ता नही होता, एक और नया उदाहरण हैं कि चावल को बनाते समय टूटे चावल निकलते है, आज अधिकतर गरीब और मध्यम वर्गीय आदमी इस टुकड़ी को खाने के लिए खरीदता है, और अच्छे चावल विदेशों में दसो गुना ज्यादा दामो पर बेचे जाते है ।
हम फसल उगाते, हम टुकड़ी खाने को मजबूर वो भी धान के तिगुने चौगुने दामो पर, ये हाल हमारे देश के किसानों का हो गया है, बेताहासा लूट, बेताहासा मुनाफा कमाते पूँजीपति, बेताहासा बर्बाद होते किसान, सरकारे पूँजीपतियो के पैरों के नीचे पड़ी है, इसलिए किसानों की ये हालत हो गई, इन गलत नीतियों को पलटना होगा तभी किसान को राहत मिलेगी ।

तीसरी, मुर्खता वायदा व्यापार, हमारे देश के 99 प्रतिशत किसानों को ये पता नहीं है, कि ये वायदा व्यापार क्या होता है, ये हमारे देश की सरकारो ने पूँजीपतियो को मुनाफा बनाने के लिए, लाया । वायदा व्यापार के बारे में अच्छे बड़े बड़े नेताओ और पड़े लिखें लोगों को भी इसकी जानकारी नही है, केवल इन सटोरियो पूँजीपतियो को इसकी जानकारी है, जो बिना कुछ करें, करोड़ो करोड़ रुपये कमाते है, कुछ उच्च मध्यम लोग हैं जो इसमें कुछ कंपनियों के साथ अपना कुछ पैसा लगाते है और वो थोड़ा बहुत मुनाफा कमाते, कभी अपनी पूरी कमाई भी गवॉ देते, ऐसे लोगों को भी इस वायदा व्यापार की जानकारी है, यह इतना बड़ा खेल है जिसमें सरकारो के मंत्री, मिडिया, कुछ विशेषज्ञों को भी मैनेज किया जाता है, ये सब इन कंपनियों के लिए माहौल बनाने में विधिवत काम करते है, बाद में इनको कुछ न कुछ बड़ा ईनाम मिलता होगा ।
अब हम पहले ये वायदा व्यापार होता क्या है, इसके बारे में समझते हैं, इसमें क्या होता है कि किसी भी जींस, या सब्जी पर किसी एक पूँजीपति ने एक दूसरे पूँजीपति से कहा कि मुझे अगली खरीब की फसल पर चना एक लाख कुन्टल चाहिए, आप किस भाव दोगे, ये जब कि बात होती है, जब फसल की बुबाई भी नहीं हुई, दूसरे पूँजीपति ने कहा कि हम आपको ये चना, 40 रुपये किलो दे सकते हैं, उसके लिए दोनों का सौदा पक्का हो गया, इसके बाद जिसने चना खरीदा उसने किसी दूसरे कंपनी से बात की, कि मेरे पास एक लाख कुन्टल चना है, आपको चाहिए तो बताओ, उसने कहा कि ये चना आपको 50 रुपये किलो मिलेगा, इन दोनों में सौदा हो गया, फिर इस पूँजीपति ने किसी विदेशी कंपनियों को 60 रुपये में बेच दिया, उस कंपनी ने 70 रुपये में बेच दिया, ऐसे करके फसल बुबने के पहले ही फसल बिक गई ।
इसमें होता ये है कि ये सब मिलकर पहले, उस चने की खरीदी पूरे देश में करेगे, जब फसल आयेगी, उस समय कम दाम यानि 30 रुपये किलो में खरीदी करेगे, उसके बाद जब फसल का बड़ा हिस्सा गोदामो में भर लिया तो फिर उसकी शार्टेज पैदा करेगे, इसमें मिडिया को मैनेज करेगे, जो बार बार ये कहेगे कि बाजार में चना कम पैदा हुआ है, चने की खपत बड़ गई है, कुछ नेता और मंत्री भी कहेगे, हम चना बाहर से बुलाएगे, कुछ मिलाकर ऐसा माहौल बना देंगे कि बाजार में थोडा बहुत चना है वो भी लोग छिपा लेगे, जब बाजार में चना कम होगा तो वो मंहगा हो जाएगा, इस चने को वो सौ रुपये किलो तक ले जाएंगे, फिर बाजार में रखा हुआ चना बिकेगा, समझ लिजिए, कितना मुनाफा कमायेगे, आप सोच भी नहीं सकते । इसलिए हर बर्ष कोई दो तीन जींस रिकार्ड तोड़ महंगी होती है, उसके पीछे, इस प्रकार का खेल होता है, ये है वायदा व्यापार, इन कंपनियों के शेयर बड़ते है, इसमें भी कुछ लोग पैसा लगाते है, और थोड़ा बहुत मुनाफा बनाते हैं, इस प्रकार से ये बहुत बड़ा जाल है, इतना समझने के लिए काफी है, ये बहुत बड़ा विषय है । ये भी किसानों की लूट का एक बहुत बड़ा कारण है, ऐसे कानूनो को तुरंत खत्म किया जाना चाहिए ।

चौथा, टेक्स है, हर सरकार कहती है कि किसानों पर कोई टेक्स नहीं है, हमारे अन्न दाता से हम कोई टेक्स नहीं लेते, कृषि से सम्बन्धित उपकरणों पर कोई टेक्स नहीं लेते, किसानों से कोई टेक्स नहीं लेते, टेक्स तो पूँजीपति भरते है, कारखाना मालिकों को सरकार पुरुषकार भी देती है, ये पूरी झूठी कहानी है, इतना बड़ा झूठ है, मगर हम इससे अनभिज्ञ है ।
सच ये है कि कोई भी पूँजीपति टेक्स नहीं देता, टेक्स का कलेक्सन करते है, क्योंकि जो टेक्स सरकार को देते है, वो उस पोडक्ट की कीमत में जोड़ देते है, जिसको आखिरी कस्टमर देता है, इसलिए टेक्स आम जनता ही देती है, एक उदाहरण से समझते है जैसे टैक्टर है, जिसको सरकार कहती है कि हम टेक्स नहीं लेते, जबकि अभी भी टैक्टर के कम्पोनेंट जो अलग अलग कंपनियों से खरीदे जाते है, उन पर 18 प्रतिशत जी एस टी है, पहले भी 16 प्रतिशत एक्साइज डियूटी थी, जो हर टैक्टर पर यदि वो चार लाख का है तो 72000 रुपये टेक्स दे दिया और कीमत में जोड़ दिया, ये सीधा किसानों के साथ धोखा है और बड़ी लूट है, किसान डीजल, पेट्रोल, खाने के सामान, मोबाइल, वाहन, किराना, कपड़े, होजरी, गुटका, बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, शिक्षा, स्वास्थ्य, दवाइयां, हर चीज़ पर टेक्स देता है, सरकार के खजाने में जमा 80 प्रतिशत धन किसानों का है, आम जनता की कमाई का है । इस व्यवस्था को बदला जाना चाहिए और टेक्स सीधे मुनाफे पर लगाया जाना चाहिए, आम जनता पर अप्रत्यक्ष टेक्स खत्म किए जाने चाहिए । ये किसानों की सीधी लूट है ।

ये चार तत्थ काफी है, ऐसे कई उदाहरण और है, समझने के लिए इतना काफी है, किसानों को इन गलत नीतियों को बदलने के लिए लड़ना पड़ेगा, तभी कोई राहत मिलेगी ।

इसी कड़ी में 20 नवम्बर को 180 किसान संगठन दिल्ली में संसद पर महापड़ाव कर रहे है, ये इस संघर्ष की एक कड़ी है, इसमें बड़ी संख्या में शामिल हों ।

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