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जाति का जहर, जहर का असर, मुक्ति का रास्ता

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Ashish

जाति व्यवस्था, समाज को दिमागी रूप से गुलाम बनाने की साजिश थी, आज भी ये साजिश है, जिसको एक शोषण अत्याचारी व्यवस्था के रूप में जाना जाता है, यह समाज को बॉटने और उनका पीढ़ी दर, पीढ़ी शोषण के करना, सामाजिक, मानसिक रूप से अत्याचार करना, इसके सहने के लिए, उनको तैयार करना, यह साजिश की गई थी, जो उस समय के पूँजीपति करना चाहते थे, उसमें वो सफल रहे, यह सदियों पुरानी व्यवस्था है, इतने सारे सामाजिक परिवर्तन हुए, मगर ये व्यवस्था नहीं बदली, उल्टी और मजबूत हुई ,जो भी लोग भारत आये, उन्होंने इस व्यवस्था को स्वीकार किया, उसको बदला नही, इसी कारण आज इस्लाम मे भी जातियां है, ईसाई धर्म, सिक्ख धर्म, सभी धर्मो में जातियां बनी, जातियो के अंदर भी उप जातियां बनी, जिसमें ऊच नीच का फर्क किया गया । हमारी व्यवस्था ने इसको इतना मजबूत कर दिया कि हमारे नाम के साथ, लिखना शुरू करवा दिया । आज हम इसको सीधे तौर पर खत्म करने की बात करना, बड़ी आबादी की आस्था को ठेस पहुचाना होगा मगर सच यही है कि ये एक साजिश थी और आज भी है । ये हमारे जन्म मरण के साथ जोड़ दिया गया है, हमारे दिमाग में भर दिया गया है, इसके विरोध के बारे में बात भी न करे, इसके लिए, इसका जहर कूट कूट के भर दिया गया है । हमें मानसिक रूप से गुलाम कर दिया, हमने इस गुलामी को स्वीकार कर लिया ।

अब इसका वर्गीय चरित्र देखते हैं ।
ये जाति व्यवस्था, जब पैदा हुई जब राजा शाही पैदा हो गई थी, जिसको कहा जाता है कि ये मनुस्मृति में है, जिसको वर्ण व्यवस्था कहते है, ये हिन्दू धर्म के वेदो में मिलती है । जिसमें मनु महाराज ने अपना दिमाग लगाकर, इस वर्गीय समाज का नक्शा तैयार किया था, जिसमें उन्होंने इस जाति व्यवस्था में, धन संपत्ति का भी बटवारा कर दिया था, इसलिए इस वर्ण व्यवस्था में केवल जातिगत बटवारा नही किया गया था, इसमें आर्थिक बटवारा भी किया गया था, जिसमें कहा गया था कि वैश्य और शूद्र को सम्पति रखने का अधिकार नही है । यदि इनके सम्पति है तो उसको छीनने का अधिकार ब्राह्मण और क्षत्रिय को है, इसमें बिल्कुल प्लानिंग से दो वर्गीय बटवारा किया गया था जिसमें, ब्राह्मण, क्षत्री एक तरफ, जो पूँजीपति थे, वैश्य और शूद्र, जो मेहनत करके आपना जीवन यापन करने वाले थे, इनमें मजदूर, किसान, दुकानदार, मुख्य रूप से थे, यानि इसके अंदर भी दो वर्ग थे, एक पूँजीपति और दूसरा मजदूर किसान ।
ब्राह्मण और क्षत्रिय, एक राजा और एक ग्यानी, दोनों समाज के चतुर लोग, पहले दिमाग लगाकर नियम बनाओ, राजा से कहो और इसको मनवाओ, जो न माने उसे दंड दो, इसके साथ ही उनको लगा कि इसके बाद भी विरोध हो सकता है, उसको धर्म के साथ जोड़ दिया, कहा गया कि ये ब्रम्हा जी से ये वर्ण पैदा हो गए ।
अब जो इसे नहीं मानेगा वो अधर्मी हो जाएगा, जिसमें नियम बनाए गए कि दलितो को, वेद सुनने का भी अधिकार नही है, यदि कोई सुन ले, उसके कान में गरम लाख भर दो, कोई वेद के श्लोक बोल दें तो जीभ काट दो, कोई इसको जबरन पढ़े और माने नही, उसका दंड था कि उसकी हत्या कर दो । ये मनुस्मृति में लिखा है, ये जरूर पड़ना चाहिए ।
ये हमारे भाजपा और आर एस एस के लोग इसी मनुस्मृति की आज भी पूजा करते है और उसको हिंदू राष्ट्र का संविधान कहते है । इससे इनकी मानसिक स्तिथि समझ में आती है, कि ये मनुस्मृति जैसा समाज आज बनाना चाहते हैं, यही इनकी राजनैतिक चेतना है, इसी से ये आम जनता को गुलाम बनाकर रखने में सफल रहेगें, ऐसा इन लोगों का मानना है, इसलिए ये जातिवाद और धर्म के जहर को और ज्यादा जहरीला करेगे, ताकि आम जनता अपने शोषण का एहसास न कर सकें, इस फालतू बहस में अपने को लगा कर रखें, यही आज भाजपा और आर एस एस कर रही है, इसको समझना भी बहुत जरूरी है । ये पूँजीपति वर्ग के प्रतिनिधि है ।

इसको गहराई से समझे तो ये शुद्ध रूप से एक वर्गीय व्यवस्था थी, जिसमें दो वर्ग पैदा किए गए, एक लूटने वाले, एक लुटने वाले, एक पूँजीपति (धनी लोग ), दूसरे आम जनता मजदूर किसान, (गरीब लोग, निर्धन ) इनके पास संपत्ति नही थी, मेहनत करके, उससे जो धन मिलेगा, उससे परिवार चलाना है, जैसे, पिछड़ा वर्ग के लोग हैं, यादव, कुम्हार, नाई, काछी, माली, पाल, ठीमर, जैसे बहुत सारी जातियां आज भी है, दलितो को तो कोई भी अधिकार, किसी भी रूप में नहीं थे ।
इसका आज से तुलना की जाए तो इसमें कोई भी परिवर्तन नही है, उस समय में पूँजीपति वर्ग को उच्च जातियो में रखा गया था, सत्ता इनके हाथ में थी, धन संपत्ति इन्ही के पास थी, आज भी पूँजीपति वर्ग, में बड़ी संख्या में उच्च जाति के लोग हैं और धन इन्ही के पास है, मगर आज कुछ ही लोगों के पास ज्यादा संपत्ति है, उच्च जातियो में आज बड़ी संख्या में मजदूर किसान हो गए है, आज ये चंद पूँजीपति लोग आज सत्ता चला रहे है । पहले की जो व्यवस्था थी, उसमें और आज की व्यवस्था में कोई फर्क नहीं है, पहले पूँजीपतियो के हाथ में सत्ता थी, आज भी पूंजीपतियो के हाथ में सत्ता है, इसी को विचारधारा कहते है, इसी को राजनीति कहते है, वर्गीय राजनैतिक हित कहते है कि सदियों से ये पूँजीवादी राजसत्ता वैसे ही चली, जैसी आज है ।

आज फिर हमको इस वर्गीय राजनीति को बहुत अच्छी तरीके से समझना होगा तभी हम इसके खिलाफ लड़ सकते हैं, पुरानी व्यवस्था में मुख्य टकराव संपत्ति और गैर संपत्ति का है, एक तरफ सारी संपत्ति पर चंद लोगों का कब्जा था, आज भी वही है, चन्द लोगों के पास देश की सारी संपत्ति है । संघर्ष दिखने में थोड़ा अलग दिखता है, मगर सीधे तौर पर संपत्ति पर काबिज रहने का ही संघर्ष है ।

वर्गीय राजनीति ही सदियों से मुख्य आधार रहा है, इस आधार को कब बदला जा सकता है, जब दूसरा वर्ग, मजदूर किसान, आम जनता की विचारधारा मजबूत हो, वो विचारधारा है, समाजवाद ।
इसके अंदर इस बीमारी के सभी इलाज है, इसके जीवन जीने से लेकर अंतिम यात्रा तक के सभी नियम मौजूद है, राजसत्ता से अमीरी गरीबी की खाई कम कैसे की जाएगी, उसके नियम इस व्यवस्था के अंदर है, इस विचारधारा को अपनाये बिना ये शोषणकारी व्यवस्था को कभी समाप्त नही किया जा सकता है । यह विचारधारा को, विचारधारा के रूप में कार्ल मार्क्स के पहले किसी ने संगठित रूप नही थी, इस विचारधारा को, पूरी विचारधारा के रूप में, दुनियां में जब से मार्क्स ने प्रस्तुत किया, पूरा दर्शन तैयार किया पूरी दुनिया में व्यवस्था में भारी बदलाव हुए, और पूरी दुनिया में दबे कुचले लोगों ने क्रांतियॉ की और समाजवादी विचारधारा की राजनैतिक व्यवस्था चलाकर दिखाई, इसी दबाव में, मजबूरी में दुनियां के पूँजीवादी राजसत्ता ने आम जनता को कुछ अधिकार दिए । इसके पहले भी दुनियां भर में इस व्यवस्था के खिलाफ विरोध हुए, मगर उन विरोधो को कुचल दिया गया ।

इस विचारधारा के हिसाब से जाति व्यवस्था, समाज में नहीं थी, इसको बनाया गया और जबरदस्ती लागू किया गया । यह शुद्ध रूप से शोषण कारी, आर्थिक बटवारा की बड़ी साजिश थी, आज यदि इस जाति वादी व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाए, तो एक बड़ी शोषण कारी, अत्याचारी, व्यवस्था का खात्मा हो सकता है, इसका मतलब यह हुआ कि आज हमको जातिवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिए, समाज में चेतना फैलाना होगी, इसके खिलाफ हर स्तर पर संघर्ष करने होगें, और इसको खत्म करने की मुहिम छेड़नी होगी । यह काम केवल वामपंथी विचारधारा ही कर सकती है और कोई नहीं कर सकता ।
इसमें एक तथ्य उच्च जाति के लोगों को भी समझना होगा कि आज इस व्यवस्था ने उच्च जाति में भी बड़ी संख्या में, मजदूर किसान पैदा कर दिए है, उनकी संपत्ति पहले की तुलना में कम हो गई है, जातिगत पूँजीपति कम हुए हैं, अब केवल कुछ ही लोग पूँजीपति बचे है, जिन्होंने देश की बड़ी संपत्ति पर कब्जा कर लिया है इसलिए आज बड़ी संख्या में मजदूर कारखानो, किसान, खेत मजदूर गॉव में उच्च जाति के लोग भी मिलेगे ।

वामपंथी विचारधारा के परिवार में कोई जातिवाद नही है, न कोई छूआछूत, न कोई ऊचनीच, न किसी भी प्रकार का भेदभाव है, अंतर जातीय विवाहो को बढ़ाना होगा, जाति धर्म की सभी हदो को तोड़ कर ,एक मानवता वादी समाज की संरचना का निर्माण करना होगा, इन जातिवादी गुलामी की जंजीरो को तोड़े बिना हम आर्थिक मोर्चे पर भी सफल नही हो सकते, क्योंकि ये दीवार हमारी एकता बनने से रोकती है, पहले इसको तोड़ना बेहद जरूरी है, इस वामपंथी विचारधारा के परिवार के साथ बड़ी संख्या में आम जनता को जोड़ना होगा, इस विचारधारा से जीवन जीने की पद्धति को अपनाना होगा ताकि इस जातिवाद के जाल से लोगों को निकाला जा सकें और साथ ही आर्थिक असमानता को रोकने और राजनैतिक बदलाव के मोर्चे पर संघर्ष किया जा सके ।

एक बात से और सावधान रहने की जरूरत है कि कुछ लोग आज जातियो पर राजनीति कर रहे हैं, जाति व्यवस्था के विरोध में नहीं है, वो केवल जातिगत शोषण के बारे में संघर्ष की बात कर रहे है, मगर उससे कोई राजनैतिक आर्थिक बदलाव नहीं होगा, बिना जातिगत व्यवस्था को खत्म किए, किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं हो सकता, इसलिए जातिगत राजनिति करने वाले दलो से भी सावधान रहना होगा ।

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