जातिवादी व्यवस्था, भाग -05, उच्च जाति के लोगों को समझना होगा ।

जातिवादी व्यवस्था (भाग -05)

यह बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है यह छह भागो में लिखा जायेगा
01. इस व्यवस्था का इतिहास
02. आर्थिक पक्ष
03. राजनैतिक पक्ष
04. मेहनतकश वर्ग की वर्गीय एकता खत्म करती है।
05. उच्च जाति के लोगों को समझना होगा ।
06. समाधान

इन छह हिस्सो में इस विषय को कम से कम शब्दों में समझने की कोशिश करेगे, इस पर विडियो भी बनाया जाएेगा, जो इसी के साथ पोस्ट किया जाएगा ।

05. उच्च जाति के लोगों को समझना होगा ।

यह ऐतिहासिक सत्य है कि उच्च जाति के लोगों को, सदियों से इस व्यवस्था के कारण, सामाजिक आर्थिक स्तर पर उच्च स्थान रहा, जिसमें ब्राह्मण और क्षत्रिय है, मगर आजादी के बाद जब हमारे देश में लोकतंत्र आया, जिसके बाद जमीनो के अधिकार मिले, समाज के इस बदले परिदृश्य में, जिसमें पीढ़ीयो में हुए बटवारे के बजह से जमीने बड़ी संख्या में उच्च जातियो के परिवारो के पास भी, काफी कम हो गई, जिसके कारण परिवार का पालन पोषण करना मुश्किल हो गया इसके कारण शहरों की तरफ पलायन हुआ जिससे वे पूँजीवादी विकास से जुड़े इस पूँजीवादी विकास ने कारखानो में बड़ी संख्या में, इन उच्च जातियो को में मजदूर बना दिया, आज का ये भी एक कटु सत्य है और आने वाले समय में, ये संख्या और ज्यादा बढ़ने वाली है, यह भी सुनिश्चित है । एक पक्ष ये है ।

दूसरा, आरक्षण पर विरोध का बड़ा कारण आर्थिक असमानता ही है, इसको समझने की ज़रुरत है, 70 साल से आरक्षण रहने के बाद भी, जो ऑकड़े है, वो ये बताते है कि आरक्षण की बजह से कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है । जैसा की उस आरक्षण लगाने वाले विद्ववानो ने सोचा था, आज भी समाज में असमानता हर स्तर पर तेजी से बढ़ रही है, आरक्षण असमानता को कम करने के लिए लाया गया था, यह राजसत्ता में रहे मनुवादी सोच के कारण नहीं हो सका, इसलिए देश के विकास के लिए यह ज़रूरी है कि पूरी आबादी आगे आये, जिसके लिए आरक्षण ही विकल्प है, इसमे एक क्षेत्र जिसमे शिक्षा सहायता को आर्थिक आधार पर करने की ज़रुरत है ताकि पैसे नहीं होने के कारण किसी भी वर्ग के बच्चे अशिक्षित नही रहना चाहिए, इसमे यह भी समझने की ज़रुरत है ।

आर्थिक सम्पन्नता के लिए आर्थिक मोर्चे पर पूरे मेहनतकश वर्ग के साथ मिलकर लड़ना होगा, तभी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा, जब आज उच्च जाति के लोग हम मेहनतकश वर्ग बन गए है तो हमे बहुत खुशी से स्वीकार करना चाहिए कि अब हमारा वर्गीय चरित्र बदल गया है इसलिए हमें अपनी पुरानी, सामंती और उच्च जाति जिसका मतलब ही अमीर होता है, वाली सोच से बाहर निकल आना चाहिए, हमें निम्न शोषित वर्ग के साथ खड़ा होना चाहिए, इनको एक साथ करके फिर वर्गीय चरित्र को समझकर, पूँजीवादी विचारधारा की व्यवस्था के लूट के खिलाफ मोर्चा खोलना चाहिए, जब वर्गीय स्तिथि बदल गई तो हमको अपनी राजनैतिक समझ को भी बदलना होगा, यह अति अावश्यक है, इसके बिना कोई बदलाव नहीं होगे, इसी तरह से हमें विचारधारा में अपने दर्शन को भी बदलना होगा, जो भाववादी दर्शन है, उसकी जगह भौतिकवादी दर्शन की तरफ जाना होगा । इस जातिवादी पोंगापंथी व्यवस्था को खत्म करने के लिए संकल्प लेना होगा, यही से आर्थिक आजादी का संघर्ष शुरू होता है, जातिवादी ऊच नीच, छुआछूत, जातीय उत्पीड़न जैसे जहर को निकालना होगा, इंसानियत को उच्च विचार मानना होगा, इसको समझना बहुत जरुरी है ।

यह भी सत्य है कि मनुस्मृति में भी एक सुनियोजित आरक्षण व्यवस्था है, जिसमे एक पक्ष के फायदे के लिए और दूसरे पक्ष को गुलाम बनाने के लिए आरक्षण किया गया । इसका विस्तारित विवरण विडियो के अंदर है । जिसको अच्छी तरह से समझना आवश्यक है ।

यही सच है, सत्य है और अटल सत्य है, बस समझकर दिलो दिमाग में उतारने की जरूरत है, यही से हम अपने जीवन को आगे बढ़ा सकते हैं, गरीबी और आर्थिक असमानता के खिलाफ लड़ सकते हैं, यह जातिवादी व्यवस्था से ही उत्पन्न स्थिति है, इसलिए इसको इसी के साथ समझना आवश्यक है ।
यही कारण है कि उच्च जातियो के मेहनतकश वर्ग के लोग बड़ी संख्या में पूँजीवादी पार्टियों के साथ जाते हैं, क्योंकि उनको वहॉ सामाजिक रूप से उच्च स्थान मिलता है, वहॉ पर आर्थिक स्थिति की चर्चा करने की मनाही होती है, उसको ऊपर वाले के भरोसे छोड़ा जाता है ।

इसका एक दूसरा पक्ष है कि पिछड़ी जातियो के कुछ वर्ग, आर्थिक फायदे के लिए अपने आप को दलित बनाकर, आरक्षण की मॉग कर रहे है, जबकि आरक्षण से अब कोई बड़ा बदलाव नहीं होने वाला है ।
जबकि असल सवाल से दूर भाग रहे हैं, जो सही और स्थाई समाधान है । इसको समझने की ज़रुरत है । इसका असल समाधान वर्गीय आर्थिक संघर्ष से निकलेगा, जिसको राजनैतिक, विचारधारा, के साथ सभी दिशाओं में बदलाव करने होंगे । यह सच है इस सच को उच्च जाति के लोगों को समझना होगा ।

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