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जातिवादी व्यवस्था, भाग -04, मेहनतकश वर्ग की एकता खत्म करती है ।

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जातिवादी व्यवस्था (भाग -04)

यह बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है यह छह भागो में लिखा जायेगा
01. पुराना इतिहास
02. आर्थिक पक्ष
03. राजनैतिक पक्ष
04. मेहनतकश वर्ग की वर्गीय एकता खत्म करती है।
05. उच्च जाति के लोगों को समझना होगा ।
06. समाधान

इन छह हिस्सो में इस विषय को कम से कम शब्दों में समझने की कोशिश करेगे, इस पर विडियो भी बनाया जाएेगा, जो इसी के साथ पोस्ट किया जाएगा ।

04. मेहनतकश लोगों की वर्गीय एकता खत्म करती है।

जातिवाद, क्षेत्रवाद, व्यक्तिवाद यह मेहनतकश वर्ग की एकता को तोड़ने के सबसे बड़े हथियार है , इसमे हम जाति क्षेत्र के नाम पर बंटवारे को समझते है, आजकल हर जाति को एक समाज कहा जाता है और समाज में, समाज के नेता हमेशा वही बनते है, जिनके पास पैसा होता है यानि आर्थिक रूप से अमीर होते हैं और दूसरा यह पक्का रहता है कि ये किसी न किसी पूँजीवादी पार्टी से जुड़े होते हैं, ये दो गुण तो पक्के है । तीसरा हर समाज में जितने भी समाज की भले की बातें कही जायेगी, उसमे कोई भी आर्थिक स्थिति सुधार के कोई विषय नहीं होते, शिक्षा स्वास्थ्य रोज़गार, वेतन बढ़ाने, जमीन देने, जैसे विषयों पर कोई चर्चा नही होती, यह सब उनकी क़िस्मत पर छोड़ा जाता है, इसके बाद भी समाज के हितो की घोषणाऐ होती है । इसमे केवल समाज के लिए धर्मशाला, शादी के लिए हाल, समाज के भगवान के लिए मंदिर, इनमे भी सहयोग करने की बात करते है, इसी के दम पर पूरे समाज के वोट ले जाते हैं और हर बार यही होता है, यह आज के हर समाज, हर जाति का सच है । ये हर चुनाव पर होता है, चुनाव आते ही जातियो के सम्मेलन और महा सम्मेलन शुरू हो जाते हैं । जिसमें मुख्य अतिथि किसी भी पूँजीवादी पार्टी के बड़े नेता होते हैं, जिनको बाद में सबको अपने वोट देने होते है ।

ये पूँजीवादी व्यवस्था हमारी राजनैतिक ताकत कैसे खत्म करते हैं, इसको समझते हैं, इसका कारण है, सदियों से हमारे दिमाग मे चढ़ा, जातिवाद का जहर, आज हमारे दिमाग में, जातिवाद की चेतना सबसे ऊपर है, मेहनतकश वर्ग की बड़ी संख्या इस जातिवाद को सम्मान के रूप में मानते है, इस चेतना के कारण, जातिवाद के साथ दिमागी रूप से जुड़ जाते हैं, इसलिए जाति समाज के स्तर पर किया गया वादा ईमानदारी से निभाते है, इसी कमजोरी का फायदा, दिमागदार लोग उठाते है, क्योंकि पूँजीवादी विचारधारा के नेताओ को इसको कैश करने के लिए स्पेशल ग्यान दिया जाता है । ये लोग सदियों से इस काम को करते आ रहे है, उनको इसका बहुत ही अच्छा अनुभव है । हमेशा की तरह हम इनके जाल में फंस जाते है ।

इसलिए हमारे मेहनतकश वर्ग के लोगों को, समाज के आधार पर, शहरों में जाति, क्षेत्र के आधार से जोड़ा जाता है, इसमे भी वही स्तिथि होती है कि समाज के नेता, बड़े बड़े ठेकेदार, या पैसे वाले लोग होते हैं जिनके पास धन होता है । यही मेहनतकश लोगों की एकता नहीं बनने देते, ये कारखानो के अंदर भी, जाति धर्म और क्षेत्र के नाम से गुरुप बनावा देते हैं, जिससे आपस में ही एक दूसरे से इतनी नफरत घृणा पैदा कराई जाती है, जिससे उनमें कभी एकता नहीं बनती, तो ये स्वतः कमजोर हो जाते हैं, आज के समय में नशा भी एकता तोड़ने में बहुत बड़ा रोल अदा कर रहा है और इस प्रकार ये समाज के ठेकेदार इनका मालिकों से लड़ने से रोकते है और संघर्ष करते समय, उनको अलग अलग गुट में बॉटकर, किसी भी आन्दोलन की विफल करा देते हैं, बाद में नेताओ पर अत्याचार करवाते है फिर उनको दिखाकर बाकी लोगों को डराते है, यह पूरे देश में पूंजीपतियो के शोषण के खिलाफ चल रहे संघर्ष की स्तिथि है । जहॉ भी बड़ा मजदूर आन्दोलन चल रहा होगा, उसको तोड़ने में यही विधि होती है, यह पक्का है आखिर में वो अपने हक अधिकार की लड़ाई हार जाता है ।

इसमे यह समझना है कि मेहनतकश वर्ग आर्थिक रूप से कब मजबूत होगा जब वह पूंजीपति वर्ग से अपने श्रम की कीमत की दर को बढ़वायेगा, दूसरा राजनैतिक सत्ता में ऐसी राजनैतिक विचारधारा की पार्टी को लाये जो मेहनतकश वर्ग के लिए ऐसे कानून बनाये, जिससे उनको परमानेंट नौकरी मिले और अच्छा वेतन मिले, ठेकेदारी संविदा, फिक्स टर्म जैसे कानून हटाये । यह काम केवल वामपंथी दल ही कर सकते हैं जो समाजवाद लाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं ।

इसमे दोनों बाते स्पष्ट है, कि यदि आप जाति समाज और क्षेत्र के साथ खड़े होगे, तो ये पक्का है कि आपको पूँजीवादी पार्टियों को ही अपने वोट देने पड़ेगे, इसमे यह तो पक्का है कि आपके जीवन का आर्थिक पक्ष कमजोर होना है और शोषण दमन अत्याचार बढ़ना है श्रम की कीमत घटनी है और आप यदि मेहनतकश वर्ग के साथ अपने हक अधिकार के लिए खड़े होगे, और अपना वोट मेहनतकश वर्ग की विचारधारा की राजनैतिक ताकत को वोट दोगे, तो आपके जाति और समाज के ठेकेदार आपके खिलाफ होगे, क्योंकि आप उन समाज, जाति के ठेकेदारों के खिलाफ खड़े होगे क्योंकि वो पूँजीपति वर्ग की ताकत है, इसमे टकराव होगा और हम मेहनतकश वर्ग एकजुट नहीं है, अपनी वर्गीय एकता को नहीं समझते, इसलिए इस टकराव में मेहनतकश वर्ग हार जाता है और राजनैतिक रूप से पूँजीपतियो की पार्टी को वोट करता है । इसलिए मेहनतकश वर्ग की राजनीति कमजोर हो जाती है, हम बहुत बार कहते हैं कि मेहनतकश वर्ग की राजनीतिक पार्टी कुछ कर नहीं पाती, उसके पीछे का असल सच ये है, क्योंकि हमारे लोग ही पूँजीवादी पार्टियों के साथ है, इस कमजोरी से हम मेहनतकश वर्ग हार जाते हैं ।
पूँजीपति वर्ग राजनीति की ताकत को बहुत अच्छी तरह से समझता है, उसको पता कि यही शक्ति हमें बचाकर रखी है इसलिए वो कोई गलती नही करता, समय समय पर पैसा भी लगाता है और समाज के नाम पर कई सारे आयोजन करवाता है और मेहनतकश वर्ग को इस जातिवादी क्षेत्रवादी जाल से बाहर नहीं निकलने देता है । यह मेहनतकश वर्ग के “शोषण के कारण” की वैग्यानिक थ्योरी है । जो अटल सत्य है । इस कमजोरी को ही सही करना है ।

अब हम थोड़ा विश्लेषण कर लेते हैं, मेहनतकश वर्ग के लोगों में, सरकारी कर्मचारियों में, 97 प्रतिशत लोग, इस बीमारी के शिकार है और पूँजीवादी पार्टियों के गुणगान करते हैं और उनको अपना वोट देते हैं, इसी प्रकार प्राइवेट कंपनियों के बड़ी संख्या में परमानेंट और स्टाफ, मैनेजर लोग, भी यही करते हैं, पूँजीवादी पार्टियों के गुणगान करते हैं और उनको अपना वोट देते हैं, छोटे, मजदूर, गरीब, इन मध्यम वर्गीय लोगों और जाति और समाज के दबाव में, पूँजीवादी पार्टियों को वोट देते हैं । यह आज का असल सच है । क्योंकि आम आदमी, आम जनता को ये राजनीति समझ नहीं आती, जो समझते हैं वो अपने निजि फायदे के लिए अपने आप को इनके सामने बेच देते हैं और फिर मेहनतकश वर्ग के ही लोगों को फसवाते है और उनको लड़ने और संघर्ष करने से रोकते है, ऐसे लोग हर कारखाने में काफी संख्या में मिलेंगे ।

इसका परिणाम क्या निकलेगा, मुझे लग रहा है कि आप स्वयं निष्कर्ष निकाल लेगे ।

इस परिस्थिति को समझने के बाद, यदि आपको लगता है कि हमारी इस हालत का जिम्मेदार कोई पूँजीपति या कोई भगवान, किस्मत नसीब है तो आप गलत सोच रहे हैं, अपनी सोच में सुधार करे और इस जाल से बाहर निकले । आप दिमागी रूप से गुलाम हो गए हैं, आप पूँजीवादी व्यवस्था के जाल में फंस गए हैं । इससे बाहर निकल सकते हैं, इसके लिए खुद को समझना होगा और पूरी राजनीति को भी समझना होगा, वर्गीय चेतना भी पैदा करनी होगी और इस जातिवाद और क्षेत्रवाद के जहर को भी समझना होगा, इस समझ से हम आसानी से इस गुलामी के जाल को काट सकते हैं ।

जातिवाद, क्षेत्रवाद के नाम पर बनाये गये, संगठनों को कमजोर होने से ही मेहनतकश वर्ग की एकता, ताकतवर तरीके से बन सकती है, जितने ये संगठन मजबूत होगे, उतनी मेहनतकश वर्ग की एकता कमजोर होगी, आपके ऊपर छोड़ा, आप क्या करना चाहते हैं, जब आप जागेगे, तभी से सवेरा होगा, हमारे हित में जातिवादी व्यवस्था का खात्मा है, जिसके लिए समाजवादी, साम्यवादी व्यवस्था की सोच की तरफ़ जाना होगा, जो व्यवस्था मनुस्मृति लिखने से पहले थी । यही अंतिम समाधान होगा । सोचे, बहुत बड़ा विषय है, दिमागी गुलामी की हथकड़ी, बेड़ियां तोड़ने का साहस पैदा करना होगा, जो सदियों से हमारे दिमागो पर डली हुई है, तभी कुछ हो सकता है, तभी हम सही दिशा में जाएंगे ।

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