कॉल मार्क्स के जीवन की महत्वपूर्ण यादे, 200 वॉ जन्मदिन की बधाई, ऐतिहासिक यादे

#कार्ल_मार्क्स_200_नॉट_आउट
गजब का बन्दा है । इतिहास में कम ही होते हैं ऐसे जो 200 वीं सालगिरह पर भी उतने जीवन्त और प्रासंगिक बने रहें जितने कार्ल मार्क्स हैं ।
● 1818 की 5 मई को जन्मे मार्क्स की 5 मई 2018 दो सौं 200वीं हैप्पी बर्थ डे है और बन्दा अंगरेजी में बोले तो ….. स्टिल अलाइव एंड किकिंग.. है । बल्कि गुजरे 25 साल में उसकी लिखी “भविष्यवाणियों” को हूबहू सही ठहराते हुये दुनिया पर जो गुजरी है उसे देखकर अलाइव एंड किकिंग के साथ लाफिंग और ‘आई टोल्ड यू सो’ भी है ।
● जितनी बार जितनी जोर से उसके मरने के एलान हुये, खुशी से झूमते कबरबिज्जू उसे जितना गहरा दफना कर वापस लौटे : बन्दा उनके किसी स्टॉक एक्सचेंज की बार में बैठकर शैम्पेन का काग खोलकर जश्न मनाने की पहली चीयर्स बोलने से पहले ही उतने ही ज्यादा जोर से फिर “आया, निहारा और छा गया” !! Shakespearean …Came, Saw And Conquered ..
● ऐसा क्यों हैं ? कैसे है ? कब तक रहेगा ? अब इन सवालों के जवाब देने मार्क्स खुद तो आने से रहे । कुछ काम तो खुदई कन्नै होते हैं भैय्ये (भैना भी) ।
● चलिये यूँही सतह सतह मटरगश्ती करते हुये अब 5 मई तक मार्क्स की संगत में रहते हैं । उनके बारे में फैले सारे भ्रमों के सांड़ को सींग से पकड़ते – मार्क्स के एक इंसान, एक दोस्त, एक पिता और एक पति के रूप को तलाशते । एंगेल्स के मनीऑर्डर के इन्तजार में दो दिन से तकरीबन भूखे बैठे “पूँजी” के प्रूफ जांचते कार्ल मार्क्स की भूमिका में खुद को बिठाकर अपनी “न भूतो न भविष्यतः कुबानियों” की गलतफहमियां दूर करते । मार्क्स से थैंक्यू बोलते ।
★ कल मई दिवस की यादों को पढ़कर एक मित्र ने मेसेंजर में आकर धमकाया कि इतने सारे अलंकारो, रूपक-विम्बों-उपमाओं-विशेषणों के साथ लिखना रोमांटिसिज्म -रुमानियत- माना जाता है । इस तरह मत लिखा करो – सब्जेक्ट रूप बदल लेते हैं और ऑब्जेक्टिविटी पीछे रह जाती है ।
★ साहित्य संरचना के इस अद्भुत ज्ञान के लिए उनका आभार – मगर अगर यह रूमानियत है तो ऐसा ही सही । इंसान के रूप में विकसित होते होते मनुष्य ने, अन्य प्राणियों से भिन्न, जो ख़ास गुण अर्जित किया वह रूमानियत ही तो है । इंसान बने रहने दो यार । फिर खुद मार्क्स भी तो बाल्ज़ाक और डिकेन्स जैसे रूमानी लेखको को उतने ही चाव से पढ़ते थे जितने ध्यान से एडम स्मिथ, रिकॉर्डो, माल्थस या फायरबाख को ।
किसकी मानें ? इनकी या बब्बा की ? 🤔🤔
बाकी सब भी बब्बा की मानी है, इस मामले में भी उन्ही की मान लेते हैं ।😉😉

#युवा_कार्लमार्क्स :
पेशे, गौरव, महानता और मानवता के बारे में : तब जब वे मार्क्सवादी नहीं हुये थे ।

…हमारी जीवन-परिस्थितियां यदि हमें अपने मन का पेशा चुनने का अवसर दें तो हम एक ऐसा पेशा अपने लिए चुनेंगे जिससे हमें अधिकतम गौरव प्राप्‍त हो सकेगा, ऐसा पेशा जिसके विचारों की सच्‍चाई के सम्‍बन्‍ध में हमें पूरा विश्‍वास है। तब हम ऐसा पेशा चुनेंगे जिसमें मानवजाति की सेवा करने का हमें अधिक से अधिक अवसर प्राप्‍त होगा और हम स्‍वयं भी सामान्‍य लक्ष्‍य के और निकट पहुँच सकेंगे जिससे अधिक से अधिक समीप पहुँचने का प्रत्‍येक पेशा मात्र एक साधन होता है।
● गौरव उसी चीज को कहते हैं जो मनुष्‍य को सबसे अधिक ऊँचा उठाये, जो उसके काम को और उसकी इच्‍छा-आकांक्षाओं को सर्वोच्‍च औदार्य प्रदान करे, उसे भीड़ से दृढ़तापूर्वक ऊपर उठने और उसके विस्‍मय को जागृत करने का सुअवसर प्रदान करे।
● किन्‍तु गौरव हमें केवल वही पेशा प्रदान कर सकता है जिसमें हम गुलामों की तरह मात्र औज़ार नहीं होते, बल्कि अपने कार्यक्षेत्र के अन्‍दर स्‍वतन्‍त्र रूप से स्‍वयं सर्जन करते हैं; केवल वही पेशा हमें गौरव प्रदान कर सकता है जो हमसे गर्हित कार्य करने की मांग नहीं करता-फिर चाहे वे बाहरी तौर से ही गर्हित क्‍यों न हों और जो ऐसा होता है जिसका श्रेष्‍ठतम व्‍यक्ति भी उदात्‍त अभिमान के साथ अनुशीलन कर सकते हैं। जिस पेशे में इन समस्‍त चीजों की उच्‍चतम मात्रा में गुंजाइश रहती है वह सदा उच्‍चतम ही नहीं होता, किन्‍तु श्रेयस्‍कर सदा उसी को समझा जाना चाहिए।
● कोई व्‍यक्ति यदि केवल अपने लिए काम करता है तो हो सकता है कि, वह एक प्रसिद्ध विज्ञान-वेत्‍ता बन जाय, एक महान सिद्ध पुरूष बन जाय, एक उत्तम कवि बन जाय, किन्‍तु वह ऐसा मानव कभी नहीं बन सकता जो वास्‍तव में पूर्ण और महान है।
● इतिहास उन्‍हें ही महान मनुष्‍य मानता है जो सामान्‍य लक्ष्‍य के लिए काम करके स्‍वयं उदात्‍त बन जाते हैं: अनुभव सर्वाधिक सुखी मनुष्‍य के रूप में उसी व्‍यक्त्‍ि की स्‍तुति करता है जिसने लोगों को अधिक से अधिक संख्‍या के लिए सुख की सृष्टि की है।
● हमने यदि ऐसा पेशा चुना है जिसके माध्यम से मानवता की हम अधिक सेवा कर सकते हैं तो उसके नीचे हम दबेंगे नहीं-क्योंकि यह ऐसा होता है जो सबके हित में किया जाता है । ऐसी स्थिति में हमें किसी तुच्छ, सीमित अहम्वादी उल्लास की अनुभूति नहीं होगी, वरन तब हमारा व्यक्तिगत सुख जनगण का भी सुख होगा, हमारे कार्य तब एक शान्तिमय किन्तु सतत् रूप से सक्रिय जीवन का रूप धारण कर लेंगे, और जिस दिन हमारी अर्थी उठेगी, उस दिन भले लोगों की आँखों में हमारे लिए गर्म आँसू होंगे।
★ “पेशे का चुनाव करने के सम्‍बन्‍ध में एक नौजवान के विचार” नामक लेख से

#मार्क्स_एक_इंसान

दुनिया को जीवन और भौतिक जगत की सत्यता समझाने वाले मार्क्स अपनी पत्नी जेनी की मौत पर इतना विव्हल हुये थे कि जब जेनी को दफनाया गया तो वे उसकी कब्र में कूद गए थे ।
● शानदार क्रांतिकारी कार्ल मार्क्स जितने बड़े दार्शनिक थे उतने ही बड़े प्रेमी भी थे । जीवनसाथी के रूप में जेनी उनका पहला और आख़िरी प्यार थीं ।
● यह कोई संयोग नहीं है कि इतिहास (जाहिर है मानव इतिहास की बात हो रही है) में जितने भी क्रांतिकारी व्यक्तित्व हुये हैं, जितने भी प्यारे इंसान हुये हैं, उन सब में एक बात कॉमन है । वे सभी प्रेम करने वाले थे, प्यार में डूबे । इन्सानियत से इश्क़ करने वाला ही सच्चा इश्क़ कर सकता है : इसे उलट कर भी पढ़ा जा सकता है ।
● इसी तरह यह भी संयोग नहीं है कि जितने भी तानाशाह, अमानवीय, हिंसक, क्रूर और बर्बर बुरबक हुये हैं वे सभी – बिना किसी अपवाद के – प्रेम और उसे करने की क्षमता से वंचित अर्धविकसित मनुष्य होकर रह गए हैं ।
● जेनी से प्यार करते हुये मार्क्स ने ढेर सारी प्रेम कविताएं लिखी हैं । इतने डूब कर भीगे प्रेम खत लिखे हैं कि पढ़कर जेनी के प्रति लाड उमड़ता है । मन करता है कि दोनों को बुलाएं और कुछ दिन के लिए लाइब्रेरी से उठाकर पचमढ़ी या अमरकंटक की वादियों में छोड़ दें :, अपने खर्चे पर, क्योंकि मार्क्स की जेब में तो इतने भी पैसे नहीं होंगे । अपनी सुख सुविधाएं छोड़कर मार्क्स को चुनने वाली प्रशा सरकार के मंत्री की बेटी जेनी को कोई भौतिक सुख तो वे दे नही पाये थे । सिवाय यह कहने के कि : ‘प्यार जेनी है, प्यार का नाम जेनी है।’
● मार्क्स ने दो साल में जेनी के लिये कविताओं के तीन खंड लिखे जिनमें एक का शीर्षक था – ‘प्यार की किताब’ एक थी ‘गीतों की किताब’ ।
★★ पढ़िये जेनी के नाम लिखी मार्क्स की एक कविता;

जेनी !
दिक करने को तुम पूछ सकती हो
संबोधित करता हूँ गीत क्यों जेनी को
जबकि तुम्हारी ही ख़ातिर होती मेरी धड़कन तेज़
जबकि कलपते हैं बस तुम्हारे लिए मेरे गीत
जबकि तुम, बस तुम्हीं, उन्हें उड़ान दे पाती हो
जबकि हर अक्षर से फूटता हो तुम्हारा नाम
जबकि स्वर-स्वर को देती हो माधुर्य तुम्हीं
जबकि साँस-साँस निछावर हो अपनी देवी पर !
इसलिए कि अद्‌भुत मिठास से पगा है यह प्यारा नाम
और कहती है कितना-कुछ मुझसे उसकी लयकारियाँ
इतनी परिपूर्ण, इतनी सुरीली उसकी ध्वनियाँ
ठीक वैसे, जैसे कहीं दूर, आत्माओं की गूँजती स्वर-वलियाँ
मानो कोई विस्मयजनक अलौकिक सत्तानुभूति
मानो राग कोई स्वर्ण-तारों के सितार पर !

(रचनाकाल : 1836 ; सोमदत्त द्वारा अनूदित)

#मजदूरों_को_शीर्ष_पर_लाने_वाले_मार्क्स
मानव सभ्यता के कोई 8-10 हजार वर्ष के लिखित इतिहास में कार्ल मार्क्स पहले दार्शनिक थे जिन्होंने मजदूरों को मान दिया, गरिमा दी, अभिमान दिया बल्कि और आगे जाकर उसे पूरी दुनिया का नायकत्व प्रदान किया । उसे भावी और बेहतर दुनिया का कर्णधार बताया । इसके लिए अपने दोस्त लासाल सहित तब तक के सभी स्थापित विचारों से पंगा लिया ।
● 1848 में एंगेल्स के साथ मिलकर लिखे कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र में ‘दुनिया के मजदूरो एक हो’ का नारा गुंजा कर उन्होंने सारी दुनिया को चौंका दिया था ।
● इसी घोषणापत्र में इसकी वजह स्पष्ट करते हुये उन्होंने कहा था कि “पूंजीपति वर्ग के मुकाबले में आज जितने भी वर्ग खड़े हैं उन सबमे सर्वहारा ही वास्तव में क्रांतिकारी वर्ग है । दूसरे वर्ग आधुनिक उद्योग के समक्ष ह्रासोन्मुख होकर अंततः विलुप्त हो जाते हैं ; सर्वहारा वर्ग ही उसकी मौलिक और विशिष्ट उपज है ।”
●मार्क्स अपने सिध्दांतों को गाइड टू एक्शन कहते थे । इसलिये वे सिर्फ विचार ही नहीं देते थे, उसे आकार देने के लिए स्वयं भी सक्रिय होते थे । मजदूरों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन – इंटरनेशनल वर्किंगमैन्स एसोसिएशन- को संगठित, पुनर्संगठित करने में उन्होंने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी ।
● इसी के चलते उन्हें अपने देश जर्मनी से देशनिकाला मिला। वे पेरिस, ब्रुसेल्स पहुँच कर काम करते रहे । वहां से भी निकलना पड़ा तो आखिर में लन्दन में रहकर संगठन का काम किया ।
● मजदूरों के फौरी मसलों को लेकर मार्क्स ने पर्चे लिखे, गेट मीटिंग्स में भाषण दिए ।
● वे कितने सही थे यह उनके निधन के मात्र 34 साल बाद मजदूर ने अपना राज कायम करके प्रमाणित भी कर दिखाया । एक ऐसा समाज रच दिखाया जिसका पहले कभी सपना ही देखा जाता था । दुनिया बदल कर रख दी ।
● मार्क्स मानते थे कि मजदूर ऑटोमेटिकली इस काम को अंजाम नहीं दे सकता । अपनी इस ऐतिहासिक भूमिका को निबाहने के लिए उसे पहले स्तर, ट्रेडयूनियन के नाते, कुछ काम करने होंगे । ये काम थे ;
1- मजदूरों के दैनिक हितों की रक्षा का काम ट्रेड यूनियनों को जारी रखना चाहिए, 2- लेकिन साथ ही उन्हें मजदूर वर्ग की मुक्ति लिए सचेत संगठन-केंद्र के रूप में भी कार्य करना चाहिए, 3- इस मक़सद से, इस दिशा में ‘प्रवृत्त’ हर सामाजिक व आर्थिक आंदोलन की मदद की जानी चाहिए, 4- ट्रेड यूनियनें पूरे वर्ग की पैरोकार हैं और इसलिये उनको मात्र अपने सदस्यों का बन्द समूह नहीं बनना चाहिए, जिसके दरवाजे गैर सदस्यों के लिए बन्द हों, 5- उनका कर्तव्य है कि जो स्वयं को आसानी से संगठित नहीं कर सकते उन्हें संगठित करें और सबसे कम मेहनताना पाने वालों, जैसे खेतिहर मजदूरों, के हितों की रक्षा करें, 6- अपने कार्यों द्वारा उन्हें दिखलाना चाहिए कि वे अपनी संगठित शक्ति का उपयोग मात्र अपने हितों की रक्षा के लिए नहीं करती बल्कि सभी कुचली हुयी करोड़ों जनता की मुक्ति के लिए कर रहे है ।
★ 5 मई 2018 को उनके कहे की कसौटी पर अपने काम की जांच कर लेना मार्क्स को 200वां हैपी बर्थडे बोलने की नैतिक ताकत प्रदान करेगा ।

#बच्चों_के_कार्ल_मार्क्स
“भीषण समय था मगर फिर भी यह शानदार समय था ।” इस लोडेड वाक्य के साथ मार्क्स के दोस्त लीब्कनेख्त लिखते हैं कि ;
● “घर में सिर्फ दो कमरे थे । बाहरी कमरे में मार्क्स काम करते रहते थे और बच्चे उनके चारों तरफ खेलते रहते थे । उनका सबसे प्रिय खिलौना थे कार्ल मार्क्स । बच्चे कुर्सियों का ढेर लगाकर घोड़ा गाड़ी बनाते थे जिसमे मार्क्स को घोड़े की तरह बाँध कर ‘चाबुक मारे जाते थे’ और यह सब उस समय होता था जब वे अपनी मेज पर बैठकर लिख रहे होते थे ।”
● “जब उनके बच्चे बड़े हो गए तब भी सिर्फ सवार बदले बच्चों की जगह नाती पोतों ने ले ली , मार्क्स घोड़ा ही रहे । उनकी बड़ी बेटी जेनी का बड़ा बेटा जॉनी लोंग्वे अपने नाना का ख़ास लड़ैता था । वो जो चाहे सो कर सकता और जॉनी यह जानता था । एक बार उसे बड़ी घोड़ागाड़ी बनाने का “मौलिक” विचार आया । जिसके कोचवान की सीट मार्क्स की गर्दन थी और एंगेल्स तथा मुझे (लीब्कनेख्त) घोड़ा बनना था । जोत दिए जाने के बाद लम्बी दौड़ शुरू हुयी और मार्क्स को तब तक दौड़ना पड़ा जब तक कि उनके माथे से पसीना नहीं आ गया । जब भी एंगेल्स या मैं चाल धीमी करते बेरहम कोचवान का कोड़ा पड़ता ‘शैतान घोड़ो आगे बढ़ो’ और ऐसा तब तक चलता रहा जब तक कि मार्क्स बिल्कुल बेदम नहीं हो गए ।
● “वे सिर्फ एक सर्वाधिक ममत्वपूर्ण पिता ही नहीं थे जो घण्टों बच्चों के बीच बच्चा बने रह सकते थे : अपरिचित बच्चे भी उन्हें आकर्षित करते थे, विशेष रूप से दुःखी असहाय बच्चे जो उनके संपर्क में आते थे
● ……. बच्चों जैसी आदतें खुद उनमे भी थीं । बिलकुल पागलों जैसी बच्चों की शरारतें करने की उनकी क्षमता अपार थी । शतरंज में हारने के बाद वे बच्चों की तरह झुंझलाते भी थे । यही वजह थी कि उनकी पत्नी उनके सारे मित्रों से कहा करती थीं कि वे शाम को मूर के साथ शतरंज न खेला करें ।”
● बच्चों को इतना प्यार करने वाले मार्क्स अपने बच्चों को खोकर कितने विचलित हुये होंगे इसकी कल्पना की जा सकती है।उनका एक बच्ची और एक बेटा महज इसलिये मर गया क्योंकि सहस्राब्दी के इस सबसे महान दार्शनिक के पास उनके इलाज के लिए, यहां तक कि कफ़न-दफ़न के लिए भी पैसे न थे । उनकी आर्थिक तंगी के अनगिनत उदाहरण हैं ।
● मार्क्स, बच्चों के मार्क्स एक आम आदमी थे । आम आदमी के मार्क्स । प्यार करने वाले – खेलने कूदने वाले मार्क्स । उनकी समाधि पर लिखे उनकी बेटी एलिनोर मार्क्स द्वारा चुने गए शब्दों में कहें तो :
“……. सारे ही मूल तत्व
उसमे कुछ यों घुले मिले कि प्रकृति भी उठ खड़ी हो
और पूरे विश्व से कहे – ये था एक इंसान ।”
( काफी सामग्री Jelda Kahan kots की लिखी अमर नदीम द्वारा अनुदित पुस्तिका से साभार)

 

#धरा_की_सारी_बेटियों_के_मार्क्स
मार्क्स सिर्फ अपनी प्यारी बेटियों के लाडले पिता तो थे ही वे धरा की सारी बेटियों – स्त्रियों – की मुक्ति के फिक्रमन्द अभिभावक भी थे ।
● जिस मार्क्स ने शीर्षासन करते हीगेल को पाँव के बल खड़ा कर दिया, आसमानी अलाओं-बलाओं की सदियों पुरानी धूल-कीच में सने दर्शन को वैज्ञानिक यथार्थ की बौछारों से साफ़ और स्निग्ध बना दिया उस मार्क्स ने महिला प्रश्न को एक बिलकुल ही नया आयाम भी दिया ।
● महिला के “कमजोर” होने की धारणा को सरासर बेहूदा साबित करने के बाद उन्होंने मॉर्गन से होते हुये “पवित्र परिवारों” के फलसफ़ों की उन्ही के उदाहरणों से खबर ली ।
● उनका सबसे बड़ा काम उस गुणान्तरकारी पल-क्षण का, उस असली कारण का पता लगाना था जिसने मानव समाज में महिला को उसकी तबकी वर्चस्वकारी या बराबरी की स्थिति से नीचे गिराकर दोयम दर्जे पर ला खड़ा किया । यह काम वे ही कर सकते थे, उन्होंने किया ।
● बकौल मार्क्स, दुनिया की पहली गुलाम महिला थी । पहला वर्गीय विभाजन महिला पुरुष के बीच का था । इसकी शुरुआत कार्य विभाजन से हुयी, जिसे निजी संपत्ति के उदय के साथ बड़ी चतुराई के साथ वर्गीय शोषण का औजार बना दिया गया । (एंगेल्स ने “परिवार निजी संपत्ति और राज्य सत्ता की उत्पत्ति” नामकी अपनी किताब में काफी सहजता से समझाया भी है ।)
● मानव समाज के अस्तित्व के अलग अलग चरणों के विश्लेषण के साथ उन्होंने वर्गीय समाज और स्त्री की गुलामी के नाभि-नाल सम्बन्ध को प्रमाणित किया ।
● उन्होंने जिसे अपने फ़लसफ़े को जमीन पर उतारने और इतिहास को बदलते हुये आगे बढ़ाने का जिम्मा दिया था, उस मजदूरवर्ग को दो टूक शब्दों में बताया भी कि खुद उसकी मुक्ति तब तक नहीं हो सकती जब तक कि दासता के सारे रूप समाप्त नहीं हो जाते । इस तरह उन्होंने मजदूरवर्ग के कामों में स्त्री मुक्ति के सवालों और सर्वहारा वर्ग के राजनीतिक क्रांति के एजेंडे में महिलाओं की आजादी के सवाल को ऊपर रखवाया ।
● उन्होंने क्रांतिकारी सर्वहारा को सावधान किया कि (अ) जो ज़रा सा भी इतिहास समझता है वह जानता है कि कोई भी सामाजिक बदलाव स्त्रियों के बिना असंभव है (ब) सारे काम एक क्रान्ति (उत्पादन के साधनो पर कब्जे) से पूरे नहीं हो जायेंगे । एक शैतान परिवार की संरचना में वास करता है । क्रान्ति के कामो में उसे भी ध्यान में रखना होगा ।
● उन्होंने जोर देकर कहा कि “किसी भी समाज की प्रगति का पैमाना उस समाज में महिला की स्थिति” है । दूसरे शब्दों में किसी भी समाज में महिला की स्थिति को देखकर समझा जा सकता है कि वह विकास के किस चरण में ।
● ब्रिटेन की महिला कामगार की मौत को लेकर “पूँजी” में किया गया उनका विश्लेषण और घरेलू श्रम को लेकर उनकी जोड़ बाकी उस बुनियाद पर हमला करती हैं जिस पर सामाजिक गुलामी के इस सबसे आमफ़हम प्रकार की इमारतें तनी हैं ।
● नारी उत्पीड़न और घरेलू हिंसा को लेकर मार्क्स कितने सजग और उग्र थे इसका सिर्फ एक उदाहरण ही काफी है । (उनके मित्र लीब्कनेख्त लिखते हैं कि) “अपनी पत्नी को पीटने वाले व्यक्ति के लिए तो वे पीट पीट कर ही मृत्युदण्ड देने का आदेश भी दे सकते थे ।”

#सर_पर_चढ़कर_बोले_मार्क्स
यह मार्क्सवाद की प्रामाणिकता साबित होने का -अब तक का- सर्वश्रेष्ठ कालखण्ड है । प्रासंगिकता नाम की कोई चीज होती है तो इससे अधिक प्रासंगिक मार्क्स कभी नहीं रहे : न अपने जीवन काल में, न दूसरे विश्वयुध्द के बाद के समाजवादी व्यवस्था की मजबूती के समय में ।
इसी संदर्भ में, पहले सुनाई जा चुकी एक कहानी एक बार फिर;
● अर्थशास्त्र के नोबल पुरुस्कार विजेता स्टिग्लिट्ज़ अमरीका के दो-दो राष्ट्रपतियों के आर्थिक सलाहकार रहे और नवउदार आर्थिक दर्शन के ब्रह्मा माने जाते हैं । जबकि तब 90 पार कर चुके एरिक होब्सवाम दुनिया के उस वक़्त जीवित इतिहासकारों में सबसे बड़े नाम और इतने पक्के मार्क्सवादी थे कि नियम से अपनी पार्टी सदस्यता का नवीनीकरण कराया करते थे ।
●एक समारोह में जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ अपने हाथ में जाम लिए अचानक से आकर एरिक होब्सवाम के सामने आ खड़े हुये ।
इन दोनों को आमने सामने देखकर उस समारोह में आये सभी का ध्यान इन दोनों पर केंद्रित हो गया ।
● स्टिग्लिट्ज़ बोले: यार ये तुम्हारा बड़बब्बा (ग्रैंड ओल्ड मैन) कितना दूरदर्शी था । उसने सवा सौ साल से भी पहले ही बता दिया था कि हम लोग क्या क्या पाप करेंगे !! कैसी कैसी बीमारियां फैलाएंगे ।
होब्सवाम ने पूछा : कौन ? मार्क्स ।
स्टिग्लिट्ज़ : हाँ, अभी फिर से पूंजी (दास कैपिटल) पढ़ी । क्या सचित्र नक्शा खींचा है मार्क्स ने, लगता है जैसे हमारी कारगुजारियां देख कर लिख रहा है ।
होब्सवाम : क्या बात है जोसेफ़, आज मार्क्स की तारीफ़ कर रहे हो !! ज्यादा चढ़ गयी है क्या !!
स्टिग्लिट्ज़ : अरे अभी तो चखी तक नहीं है । देखो वैसे का वैसा ही है जाम । मार्क्स ने सचमुच में अभिभूत कर दिया । यहाँ, तुम सबसे बड़े दिखे तो लगा कि कह दूं ।
● दुआ सलाम और खैरियते पूछने की रस्म के बाद जोसेफ स्टिगलिट्ज़ अपनी प्रशंसक और सजातीय बिरादरी की तरफ बढे ।
● थोड़ा चले थे कि जाते जाते अचानक फिर लौटे और बोले : सुनो एरिक, अगर बीमारी वही हैं जो कार्ल मार्क्स ने बताई थीं तो दवा भी वही लगेगी जो वो बता कर गया ।
● हाल के दौर में हूबहू वही घटा है, घट रहा है जिसे 169 साल पहले कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में और 150 साल पहले पूँजी में लिख गए हैं मार्क्स ।
#बीमारी_वही_है_दवा_भी_वही_होगी

#कवि_कार्ल_मार्क्स
हर क्रांतिकारी की तरह कार्ल मार्क्स भी एक कवि थे ।
हमारे हिसाब से दास कैपिटल जिसे हिंदी भाषा में “पूँजी” के नाम से छापा गया वह जितनी काव्यात्मक भाषा में लिखी गयी है, उतनी रोचक और काव्यात्मक (कविता की किताब को छोड़कर) कोई और किताब नहीं है ।
कविताएँ उन्होंने अनेक लिखीं । तीन किताबें तो उनकी कविताओं की ही छपीं । उनके बारे में कुछ चर्चा बाद में अभी पढ़िए युवा कार्ल मार्क्स की दो कवितायेँ, उनके अनुवादकों के प्रति आभार के साथ :

#नवयुवक_और_नवयुवतियों_से

इतनी चमक दमक
के बावजूद
तुम्हारे दिन तुम्हारे जीवन
को सजीव बना देने के इतने सवालो
के बावजूद
तुम इतने अकेले क्यों हो
मेरे दोस्त

जिस नौजवान को
कविताएं लिखने और
बहसों में शामिल रहना था
वो आज सडको पर लोगो से एक सवाल
पूछता फिर रहा है
कि महाशय आपके पास क्या मेरे लिए कोई
कोई काम है

वो नवयुवती जिसके हक में
जिंदगी की सारी खुशिया होनी चाहिए थी
वो इतनी सहमी सहमी
और नाराज क्यों है

अदम्य रौशनी के
बाकी विचार भी
जब अँधेरे बादलों
से आच्छादित है
जवाब मेरे दोस्त
हवाओ में तैर रहे है

जैसे
हर किसी को
रोज खाना चाहिए
नारी को चाहिए
अपना अधिकार
कलाकार को चाहिए
रंग और तुलिका
उसी तरह
हमारे समय के संकट को चाहिए
एक विचार और आह्वान

अंतहीन संघर्षो, अनंत उत्तेजनाओं
सपनो में बंधे
मत ढालो यथास्थिति के अनुसार
मोडो दुनिया को अपनी ओर
समा लो अपने भीतर
समस्त ज्ञान

घुटनों के बल मत रैंगो
उठो
गीत, कला और सच्चाई की
तमाम गहराइयों की थाह लो.

#असली_इन्सान_की_तरह_जियेंगे!
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कठिनाइयों से रीता जीवन
मेरे लिए नहीं

नहीं, मेरे तूफानी मन को यह नहीं स्वीकार
मुझे तो चाहिए एक महान ऊँचा लक्ष्य
और उसके लिए
उम्र भर संघर्षों का अटूट क्रम

ओ कला! तू खोल मानवता की धरोहर,
अपने अमूल्य कोशों के द्वार मेरे लिए खोल
अपने प्रज्ञा और संवेगों के आलिंगन में
अखिल विश्व को बाँध लूँगा मैं

आओ
हम बीहड़ और सुदूर यात्रा पर चलें
आओ, क्योंकि हमें स्वीकार नहीं
छिछला निरुदेश्य और लक्ष्यहीन जीवन

हम ऊँघते, कलम घिसते
उत्पीडन और लाचारी में नहीं जिएंगे
हम आकांक्षा आक्रोश, आवेग और
अभिमान से जिएंगे!

असली इन्सान की तरह जिएंगे!

( ये सारे आर्टिकल का. बादल सरोज की वाल से लिये है) 

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