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आम जनता की पहुंच से बाहर निकलती, स्वास्थ्य व्यवस्था, सरकार की गलत नीतियों का परिणाम

Admin

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स्वास्थ्य योजना 
स्वास्थ्य हमारा अधिकार है। नरेंद्र मोदी नीत वर्तमान भाजपा सरकार दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने का दावा करती है, लेकिन हमारे देश में, स्वास्थ्य सेवाएं केवल उन लोगों के लिए हैं जो इसकी कीमत का भुगतान कर सकते हैं। आज 195 देशों में हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का स्थान काफी निचले सिरे पर, अर्थात् 154वें स्थान पर है। बुनियादी स्वास्थ्य संकेतक वैश्विक औसत से काफी नीचे हैं। पूरी दुनियां में मातृ मृत्युओं का 20 प्रतिशत और बच्चों की मौतों का 25 प्रतिशत भारत में होता है। संक्रमणीय बीमारियों से देश में सभी मौतों का हिस्सा 53 प्रतिशत है।
क्या यह बताना जरूरी है कि वे गरीब ही हैं, जो इन मौतों का बड़ा हिस्सा है? क्या इसे टाला नहीं जा सकता है? लाखों लोग, जिनमें अधिकतर गरीब, और विशेष रूप से महिलाएं और बच्चे होते हैं, जो देश में टी.बी., दस्त, एनीमिया और कई गर्भावस्था से संबंधित कारणों से, जो रोकथाम योग्य और आसानी से इलाज योग्य बीमारियों से क्यों मरते हैं? जबकि देश में कुछ बेहतरीन डॉक्टर और विश्व स्तरीय चिकित्सा सुविधाएं मौजूद हैं; और जो ‘चिकित्सा पर्यटनÓ को बढ़ावा देने की बातें करता है?
ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के तंत्र को लंबे समय से उपेक्षित कर दिया गया है। यह अपेक्षित धन, बुनियादी ढाँचे और कर्मियों की कमी से पीडि़त है; प्रशासनिक असफलताओं से पीडि़त है।  
2016 की एक संसदीय समिति की रिपोर्ट से पता चलता है कि सरकारी अस्पतालों में कम से कम 5 लाख डॉक्टरों की कमी है; आवश्यक कुशल प्रसूति सहायकों में से केवल 74 प्रतिशत ही काम पर हैं। स्वास्थ्य उप केंद्रों में एएनएम (सहायक नर्स व मिडवाइफ) के 18,000 पद खाली हैं। कम्युनिटी हेल्थ सेंटर (सीएचसी) स्तर पर, सर्जन, प्रसूति विशेषज्ञ और स्त्री रोग विशेषज्ञ, चिकित्सक और बाल रोग विशेषज्ञों सहित 82 प्रतिशत की कमी है। उप-केंद्रों में से कई, पीएचसी और सीएचसी में बिजली या पानी नहीं है; उनमें से अधिकांश जीर्ण-शीर्ण इमारतों में चल रहे हैं; उन तक पहुँचने के लिए उचित सड़कें भी नहीं हैं।
नतीजतन, जनता को निजी अस्पतालों से स्वास्थ्य देखभाल की तलाश करने के लिए मजबूर किया जाता है। शहरों में 70 प्रतिशत परिवार और ग्रामीण इलाकों में 63 प्रतिशत निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं और स्वास्थ्य पर अपनी आय के बड़े हिस्से को खर्च करते हैं। स्वास्थ्य पर खर्च जेब पर भारी होने के कारण जनता को ‘विनाशकारी स्वास्थ्य खर्चÓ झेलना पड़ता है जो गरीबी बढ़ाने के प्रमुख कारकों में से एक है, जिसे सरकार की अपनी स्वास्थ्य नीति 2017 मानती भी है। गरीबों को इससे बाहर निकलना असंभव लगता है।
नवउदारवादी नीतियों का जोर सरकार द्वारा कल्याण व्यय को कम करने पर रहता है। इसके परिणामस्वरूप सरकारें लगातार, सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) के नाम पर स्वास्थ्य पर खर्च और स्वास्थ्य देखभाल का निजीकरण करती आ रही हैं। नवउदारवाद के प्रति अपनी मजबूत प्रतिबद्धता के साथ, मोदीनीत भाजपा सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली को पूरी तरह से खत्म कर रही है। गरीबों के लिए स्वास्थ्य देखभाल तेजी से पहुँच से बाहर जा रही है।
नवउदारवाद के तहत, स्वास्थ्य देखभाल को अब एक आवश्यक सेवा, देश के नागरिकों का मूल अधिकार माना नहीं जा रहा है। इसके बजाय, इसे ‘उद्योगÓ के रूप में माना जा रहा है। मोदी नीत भाजपा सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 से स्वास्थ्य देखभाल उद्योग मजबूती से उभर रहा है, जिसकी दो अंकों वाली बढ़त का अनुमान हैÓ और नीतिगत दिशा ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों के साथ निजी स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र के विकास को एक कतार में लाना है। यह और कुछ भी नहीं है, बल्कि सरकार की सभी नागरिकों को स्वास्थ्य सुनिश्चित करने की अपनी मूल जिम्मेदारी से वापसी है। जो लोग खर्च बर्दाश्त कर सकते हैं वे निजी अस्पतालों में जा सकते हैं, जो नहीं कर सकते हैं, पीडि़त या मर सकते हैं।
‘मोदी केयरÓ के रूप में प्रचारित ”आयुष्मान भारत कार्यक्रमÓÓ स्वास्थ्य देखभाल का निजीकरण करने और पूरे स्वास्थ्य देखभाल को बीमा संचालित प्रणाली में बदलने के लिए योजनाऐं हैं।
भाजपा सरकार ने पहले ही सार्वजनिक क्षेत्र की दवा निर्माण कंपनियों के निजीकरण या पूरी बिक्री की घोषणा की है। आवश्यक दवाएं और निदान खरीदने के लिए आवंटित 1200 करोड़ रुपये निजी दवा कंपनियों के पास जाएंगे।
राजस्थान में भाजपा सरकार ने पहले ही 42 ग्रामीण और 43 शहरी पीएचसी का निजीकरण किया है और 50 और ग्रामीण पीएचसी के लिए निविदाएं माँगी गयी हैं। इस पीपीपी मॉडल के तहत, राज्य सरकार प्रति पीएचसी 30 लाख रुपये का भुगतान करेगी और निजी इकाई प्रबंधन और पीएचसी के सभी संचालन को संभालेगी। छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार ने पीपीपी मोड के तहत भिलाई स्टील सिटी में 2, और राज्य की राजधानी रायपुर में 4 सीएचसी सहित 9 सीएचसी चलाने का फैसला किया। फिर, उत्तर प्रदेश में योगी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने घोषणा की कि राज्य सरकार आयुष्मान भारत कार्यक्रम के हिस्से के रूप में पीपीपी मोड में 1000 अस्पतालों की स्थापना करेगी। इसने परियोजना रिपोर्ट तैयार करने के लिए पहले ही विदेशी परामर्श संस्थान अर्नेस्ट एंड यंग से कहा है। पीपीपी मॉडल पर विचार किया गया है कि सरकार सीएचसी क्षेत्र में 3 एकड़ भूमि प्रदान करेगी और निजी संस्था स्वास्थ्य देखभाल व्यवसाय को चलाने के लिए अस्पताल का निर्माण करेगी। मौजूदा अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी के लिए, डॉक्टरों को निजी फर्मों द्वारा ठेके के आधार पर भर्ती किया जाएगा। केंद्र में सत्ता संभालने के तुरंत बाद भाजपा सरकार द्वारा स्थापित नीति आयोग ने गैर संक्रमणीय बीमारियों के लिए जिला अस्पताल में पीपीपी मॉडल के लिए दिशा निर्देश जारी किए, यह कहा गया है कि अगर राज्य सरकारें,अपने निजी भागीदारों का भुगतान करने में चूक करती है तो उन्हें दंड का भुगतान करना पड़ेगा।
सरकार ने 2017 के बजट में 10.74 करोड़ गरीब और कमजोर परिवारों, लगभग 50 करोड़ लोगों को ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना के तहत प्रति परिवार 5 लाख रुपये के बीमा कवरेज प्रदान करने की भव्य घोषणा की है। यह पिछली ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई), वरिष्ठ नागरिक स्वास्थ्य बीमा योजना और राज्य प्रायोजित स्वास्थ्य देखभाल योजनाओं को भी सम्मिलित कर लेगा। आरएसबीवाई समेत बीमा आधारित स्वास्थ्य देखभाल का अनुभव दर्शाता है कि इन योजनाओं से गरीब जनता नहीं केवल, बड़ी बीमा कंपनियां और बड़े निजी अस्पताल ही वास्तव में लाभान्वित हुए हैं। किसानों के लिए फसल बीमा योजना, ‘प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना का अनुभव भी दिखाता है कि बीमा कंपनियों ने प्रीमियम के माध्यम से भारी मुनाफा कमाया, जबकि किसानों की आत्महत्याऐं जारी हैं क्योंकि फसल के नुकसान के लिए उनके दावों को स्वीकृत ही नहीं किया गया।
इस प्रकार सरकार का पूरा उद्देश्य स्वास्थ्य, बीमा और दवा निर्माण में – कॉरपोरेट्स की ‘त्रिमूर्ति को लाभ पहुँचाना है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना इसी मकसद के वास्ते है। यह सरकार जो बात-बेबात ‘राष्ट्रवाद का गाना गाती है वह एफडीआई के रास्ते से स्वास्थ्य देखभाल में बहुराष्ट्रीय निगमों को बढ़ावा दे रही है। कॉरपोरेट अस्पतालों और चिकित्सा केंद्रों में 483 करोड़ डालर एफडीआई का निवेश किया गया है। सरकार ने स्वचालित मार्ग के माध्यम से, बीमा क्षेत्र में 49 प्रतिशत एफडीआई और फार्मास्यूटिकल्स में नए उद्यमों में 100 प्रतिशत एफडीआई और स्वचालित मार्ग के माध्यम से अधिग्रहण के मामले में 74 प्रतिशत तक की अनुमति दे दी है।
इन सबके बावजूद, बजट में स्वास्थ्य के लिए आवंटन पिछले वर्ष के 2.4 प्रतिशत से घटकर इस वर्ष 2.1 प्रतिशत हो गया है। यह कम होकर जीडीपी का 1.1 प्रतिशत, जो दुनियां के सबसे निचले दस में से हो गया है।
नवउदारवाद के प्रति वचनबद्ध भाजपानीत सरकार की कॉरपोरेट हितों की सेवा के प्रति उत्सुकता, यहीं पर नहीं रुक रही है। इसने अमेजॉन और वॉलमार्ट जैसे खुदरा विक्रेताओं को लगभग 20 लाख लोगों को रोजगार देने वाले 7.5 लाख दवाओं के खुदरा विक्रेताओं की जगह, दवा आपूर्ति बाजार में प्रवेश करने की इजाजत दी है।
भाजपा सरकार ने चिकित्सा शिक्षा भी नहीं छोड़ी। इसने मेडिकल काउंसिल ऑफ इण्डिया को हटाकर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) की स्थापना का प्रस्ताव दिया है। एनएमसी की कल्पना, मेडिकल कॉलेज शुरू करने के नियमों को हटाने और स्व-अनुमोदन मार्ग की अनुमति देने के लिए की गई है। यह निजी चिकित्सा कॉलेजों में प्रबंधन कोटा को वर्तमान 15 प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक बढ़ाएगा; फीस प्रबंधन के विवेक  पर छोड दी जाएगी। इससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और एससी/एसटी के लिए सीटों में कटौती हो जाएगी।
सरकार दवाईयों की अत्यधिक कीमतों के माध्यम से जनता को निचोडऩे के लिए देशी-विदेशी बड़ी दवा कंपनियों को खुला अवसर दे रही है। यह भ्रष्ट प्रथाओं में शामिल होने वाली दवा कंपनियों को, दण्डित करने के वास्ते विशिष्ट कानून में शामिल करके रिश्वत देने वाली दवा कंपनियों को छूने के लिए भी तैयार नहीं है।
दवाओं की बढ़ती कीमतें :
पहला ड्रग प्राईस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ), 1979 दवाईयों की विनिर्माण लागत पर आधारित था और सभी दवाओं को कीमत नियंत्रण में लाया था। बाद के डीपीसीओ द्वारा दवाओं का मूल्य नियंत्रण धीरे-धीरे कमजोर होता गया। नवउदारवाद की शुरुआत के बाद 1995 में, आवश्यक दवाओं को छोड़कर सभी दवाओं को डीपीसीओ द्वारा मूल्य नियंत्रण से हटा दिया गया था, तब थोक आवश्यक दवाओं की सूची 140 से घटाकर 76 तक कर दी गई थी; और चिन्हित किया, यानी आवश्यक दवाओं की विनिर्माण लागत पर दवा की कीमत में अतिरिक्त अधिकतम स्वीकार्य जोड़, 100 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया था। नई डीपीसीओ 2013 ने आवश्यक दवाओं की नई राष्ट्रीय सूची में 348 दवाओं को छोड़कर सभी दवाओं को मूल्य नियंत्रण से हटा दिया। ध्यान दें, यह सूची ‘दवाओंÓ की है, यानी अंतिम उत्पाद, जिनमें से हजारों को, ‘थोक दवाओंÓ के विभिन्न संयोजनों के माध्यम से उत्पादित किया जाता है, न कि अकेले ‘थोक दवाऐंÓ; इन दवाइयों की कीमतें उत्पादन की लागत पर आधारित नहीं बल्कि बाजार की कीमतों पर आधारित हैं। इसने दवा कंपनियों को हर साल सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना अपनी कीमतें बढ़ाने की इजाजत दी है। नतीजतन, दवा कंपनियाँ उत्पादन की लागत से 1000 प्रतिशत तक की कीमतों पर दवाएं बेचकर भारी मुनाफा कमा रही हैं।
जीएसटी के तहत दवाओं पर टैक्स का बोझ :
भाजपा सरकार की जीएसटी संरचना के कारण भी दवाईयों की कीमतों में वृद्धि हुई है। सरकार ने 5 प्रतिशत जीएसटी चार्ज करने वाली आवश्यक दवाइयों की सूची से 376 आवश्यक दवाओं में से अधिकांश को छोड़कर और आवश्यक दवाओं की नई राष्ट्रीय सूची में अधिकांश आवश्यक दवाओं पर 12 प्रतिशत और 18 प्रतिशत लगाए जाने की धोखाधड़ी का प्रयास किया है। इसके परिणामस्वरूप सभी आवश्यक दवाओं की कीमतों में वृद्धि हुई है।
आज, हमारे पास सभी संसाधन हैं जो सभी के लिए स्वास्थ्य सुनिश्चित कर सकते हैं। हमारे पास तकनीकी रूप से योग्य और कुशल डॉक्टर, नर्स और अन्य पैरा मेडिकल कर्मी हैं; हमारे पास अनेक प्रशिक्षण योग्य संसाधन हैं और हमारे पास युवा लड़के और लड़कियां हैं जिन्हें प्रशिक्षित करके, हमारी पूरी जनता को प्रभावी स्वास्थ्य देखभाल प्रदान की जा सकती है। हमारे पास वित्तीय संसाधन हैं। पिछले दशक के दौरान सरकारें बड़े राष्ट्रीय और विदेशी कॉरपोरेट्स को प्रति वर्ष 10-12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कर और अन्य रियायतें देती आ रही हैं। उन्हें बैंकों में जमा हमारे बचाए पैसे की ठगी करने और देश से भागने की इजाजत दी है।
यदि इन संसाधनों का उचित उपयोग कॉरपोरेट्स के मुनाफों के बजाय जनता के हित में किया जाए तो हमारे देश के सभी लोगों को जीवन, स्वास्थ्य की बुनियादी आवश्यकता प्रदान की जा सकती है। नीति की दिशा बदलना जरूरी है।
संसद पर 5 सितंबर 2018 ‘मजदूर किसान संघर्ष रैलीÓ इसी माँग के लिए है। सरकार से जोरदार तरीके से माँग है :
— सभी के लिए स्वास्थ्य सुनिश्चित करें; 
—  स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के निजीकरण को रोकें; स्वास्थ्य, चिकित्सा और मातृत्व सेवाओं को मुफ्त में उपलब्ध कराने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को मजबूत और विस्तारित करें; 
—  स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के 5 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए; 
—  सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों को पुनर्जीवित करें; 
—  निजी स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों का विनियमन करें; 
—  लागत आधारित मूल्य निर्धारण फॉर्मूला अपनाकर आवश्यक दवाओं की कीमतों का नियंत्रण करें।
आईए एकजुट हों! संघर्ष करें!
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